शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

कॉरपोरेट बालाएं, कॉरपोरेट बॉस, मामला बिंदास

बाला के लक्षण कैसे भी हों। अगर बॉस के इर्दगिर्द घूमना सीख लिया। तो समझिए बॉस भी खुश और लड़की भी। तरक्की पसंद बालाए, और बाला पसंद बॉस कॉरपोरेट युग के आदर्श हैं। बाला काम और कपड़ों के प्रति संजीदा न हों, तो कोई फर्क नहीं पड़ता। अगर बॉस के इर्दगिर्द लट्टू सी घूमना जानती हैं, तो उनमें न कोई कमी न कोई खामी। इसी उद्योग में कुछ दूसरी बालाएं भी हैं। पर कम। जो स्वभाव से उग्र हैं। उनमें ज़िम्मेदारियां निभाने की आग है। कपड़े भी शालीन हैं। ज़ुबान से काम की तेजी झलकती है। लेकिन बॉस के केबिन से दूर ही रहती हैं। तो ऐसी लड़कियां न अपने बॉस के लिए खुशी का कारण बनती हैं। और न ही उनकी भूख मिटाने वाला निवाला। कॉरपोरेट में काम करते हुए भी ये कॉरपोरेट की काली नीतियों से दूर ही रहती हैं। चमचा नहीं बन सकतीं, लट्टू होकर नहीं घूम सकतीं। ज़िम्मेदारी निभाने से मतलब है। ड्यूटी पर आती हैं। ड्यूटी पर जाती हैं। और न ही किसी से फालतू बात। बालाओं को आज के युग में तरक्की बेहद पसंद है। रास्ता आसान हो तो कुछ भी कर गुज़रने को तैयार, बॉस की बीवी नहीं तो घर पर बर्तन भी मांझ सकती हैं। और आवश्यकता पड़ने पर बीवी की हक़ अदायगी भी कर सकती हैं। सहमति जब स्वतंत्र हो, तो हर रिश्ता वाजिब। दोष न बाला का है, न ही बॉस का है। वक्त की जरुरतों ने गैरतमंदों को भी बेगैरत बना दिया। अब आइना देख कर भी उन्हें लज्जा नहीं आती । क्योंकि लज्जा रुपी विचार को वो कॉरपोरेट की काली दुनिया में गुमा चुके हैं। बाला के लिए बॉस जरुरी, और बॉस के लिए कई बालाएं। चलिए अगर इस नीति से जगत का भला हो तो कुछ ठीक लग भी सकता है। लेकिन जब रिश्ते निजी हितों के लिए ही बने हों, तो प्रबंधन के साथ तो ये धोखे जैसा ही है। बॉस अपने ओहदे और योग्यता का फायदा उठाता है। और बालाएं अपनी अदाओं का । ये बात अलग है कि मटकने वाली बालाओं से बॉस हुनर की तमन्ना कभी नहीं पालता। न ही कभी काम में बरती गई कोताही पर उंगलियां उठाता। उसके सामने कौन काम कर रही है, और कौन काम नहीं कर रही, ये सिर्फ इस पर निर्भर है, कि बाला ने बॉस को कितनी लिफ्ट दी। बॉस तय करते हैं, फलानी हुनरमंदर है, फलानी काम में सच्ची है, फलामी तुमसे बेहतर है और तुम ये क्या करती हो। तुम्हें काम नहीं आता । जाहिल कहीं की (ये उनसे जो समझौतावादी नहीं)। सारी बातें दरकिनार कि जो जाहिल है असल में वही उद्योग को लाभ पहुंचा रही है। नज़र अपनी हो और चश्मा दूसरों का तो सिर्फ बुराई ही नज़र आती है। इठलाने की अदा हर बाला में नहीं होती। समझौते की अदा हर किसी के खून में नहीं होती। कुछ तो ईमानदार भी हैं, जिन्हें देखकर बॉस काला चश्मा चढ़ा लेते हैं। ये बात अलग है कि इठलाने और बलखाने वालियों के सामने वो पूरे नंगे हो जाते हैं। कॉरपोरेट बालाएं, कॉरपोरेट बॉस, मामला बिंदास। इसी युग में हमें जीना है। धिक्कार है ऐसी नीतियों पर । धिक्कार है ऐसी आदतों पर । कब तक इस कॉपोरेट की चकाचौंध में बालाएं अपना शोषण कराती रहेंगीं। कब तक बॉस मजबूरियों का फायदा उठाएंगे। क्यों नहीं योग्यता का सही आंकलन उनके लिए है, जो काम करना जानते हैं। क्या सिर्फ ठिठोलियों से काम चलता है। क्या सिर्फ अदाएं दिखाने से संस्थान चलता है। अपने चश्मे से भी तो आंकिये समाज को । फिर देखिए दुनिया में कितने दीन दुखी हैं। कितने हुनरमंद हैं। कितने लोग सच्चे हैं। कितने ऐसे लोग हैं जिनसे आप खुद प्रेरणा ले सकते हैं।

गुरुवार, 14 जून 2012

कभी हम, कभी तुम...

कभी टकराना मुसीबतों से, तो पता चलेगी सच्चाई ज़िंदगी की ।। कभी खरीदना किसी के ग़म, तो पता चलेगा खुशी का वहम ।। कभी तोड़ देना बंदिशों को, तो पता चलेगा आज़ादी का भरम।। कभी सोचना गहराइयों से, तो पता चलेगा हर झूठ का हरम।। कभी सोचना किसी चोट के बारे में, तो पता चलेगा असर-ए-मरहम ।। कभी हम कभी तुम पर सोचना, क्या आसान है ज़िंदगी ।। कभी टटोलना वादों का गड्ढा, तो पता चलेगा वादाखिलाफी का मीटर।। कभी महसूस करना कर्म के असल को, तो पता चलेगा ज़िंदगी का मुनाफा ।। कभी खेलना किसी मज़लूम ज़िंदगी से, तो पता चलेगी किसी जान की कीमत।। कभी कूच करना पहाड़ियों का, तो पता चलेंगी बुलंदियां सरहद की।। कभी जाना तिब्बत और सियाचीन में, तो पता चलेगा सियासत का फलसफा।। कभी गुज़र जाना आंधी तूफानों से, तो पता चलेगी उखड़ते कदमों की कुब्बत।। कभी गंदी बस्ती से गुज़र भी जाना, तो पता चलेगी हर दुर्गंध की कीमत ।। कभी हम कभी तुम पर सोचना, क्या आसान है ज़िंदगी ।। कभी मुस्कुराना गम-ए-महफिल, तो पता चलेगी सुखों की ताकत।। कभी करना ठिठोलियां रंजिश में, तो पता चलेगी हंसी की कीमत ।। कभी गुज़रना बदनाम गलियों से, तो पता चलेगी कौड़ी-ए-ईमान की कीमत।। कभी सिसक लेना अंधेरी रातों में, तो पता चलेगी एक साथ की कीमत।। कभी टूट जाना किसी कांच सी, तो पता चलेगी आईना होने की कीमत।। कभी हम कभी तुम पर सोचना, क्या आसान है ज़िंदगी ।।

गुरुवार, 31 मई 2012

कौड़ियों के भाव...

ज़िंदगी के सौदे में बिके हैं कई बार पर कौड़ियों के भाव पर कौड़ियों के भाव नीलाम हुनर भी हुआ पर कौड़ियों के भाव पर कौड़ियों के भाव तिजारतों में बिक गया रगों का खून भी पर कौड़ियों के भाव पर कौड़ियों के भाव लिखते मगर सच्चाइयां बचते हैं सचों से उनकी गली में हो गया इंसान कत्ल भी पर कौड़ियों के भाव पर कौड़ियों के भाव मजदूर कहीं वो बने श्रम बेचते रहे कीमत लगाई थी पर कौड़ियों के भाव पर कौड़ियों के भाव सजते रहे शरीरों पर बन किराए ए नगीना राशि मुश्त भी चुकाई पर कौड़ियों के भाव पर कौड़ियों के भाव दो जून की जुगाड़ों में कट गए दिन रात झुलसते रहे बदन पर छांव न मिली वेतन दिया उसे भी बड़ा सोच समझ कर पर कौड़ियों के भाव पर कौड़ियों के भाव न मोल था जज़्बात का बेमोल थी हंसी थोड़े रहम से बिक गया उनका शरीर भी पर कौड़ियों के भाव पर कौड़ियों के भाव

शनिवार, 19 मई 2012

अलग हैं वो लोग...

नाकाबिलों की बस्ती अलग है। बेगैरतों की दुनिया अलग है। अलग हैं वो लोग, जो हुनर को जानते हैं। अलग हैं वो लोग, जो मलिन बस्तियों को पहचानते हैं। अलग हैं वो लोग, जो ईर्ष्यालु हैं। अलग हैं वो लोग, जो किसी दीन के दयाल हैं। अलग अहंकार है, अलग अभिमान है। अलग हैं वो लोग जो कूटनीति करते हैं, अलग हैं वो लोग जो राजनीति करते हैं। अलग हैं वो लोग जो अहित किया करते हैं, अलग हैं वो लोग जो हित की बात करते हैं। अलग सच्चाई है, अलग वो झूठ है। अलग हैं वो लोग जो फिरकापरस्त हैं, अलग हैं वो लोग जो सीधे और सच्चे हैं। अलग हैं वो लोग जो साज़िशों को जानते हैं, अलग हैं वो लोग जो साज़िशें पहचानते हैं। अलग हैं वो लोग जो सीख दिया करते हैं, अलग हैं वो लोग जो सीख लिया करते हैं। अलग हैं ज़मीनें भी, अलग आसमान भी। अलग हैं वो लोग जो बेदर्द हुआ करते हैं, अलग हैं वो लोग जो दर्द सहा करते हैं। अलग हैं वो लोग जो मां बाप को ठुकराते हैं, अलग हैं वो लोग जो गैरों को अपनाते हैं। अलग हैं वो लोग जो सच से बचा करते हैं, अलग हैं वो लोग जो झूठों से बचा करते हैं। अलग अपनत्व है, अलग घृणत्व है। अलग हैं वो लोग, जो समाज को ठुकराते हैं। अलग हैं वो लोग, जो रंक को अपनाते हैं। अलग हैं वो लोग, जो मोहताज हैं सफलता के, अलग हैं वो लोग जो अपनी राहों को बनाते हैं। अलग हैं वो लोग, जो ज़िंदगी दिया करते हैं। अलग हैं वो लोग जो ज़िंदगी लिया करते हैं। अलग हैं वो लोग, जो रिश्तों को तोड़ा करते हैं। अलग हैं वो लोग जो रिश्तों को जोड़ा करते हैं। अलग हैं वो लोग जो बैर को समझाते हैं, अलग हैं वो लोग जो दुश्मनी निभाते हैं। अलग हैं वो लोग जो चाटुकार बना करते हैं, अलग हैं वो लोग जो ईमान हुआ करते हैं। अलग हैं वो लोग, जो संघर्ष को पहचानते हैं, अलग हैं वो लोग, जो संघर्ष नहीं करते हैं। अलग हैं वो लोग जो संदेश दिया करते हैं। अलग हैं वो लोग जो संदेश बना करते हैं। अलग हैं वो लोग, मर्म को पहचानते हैं। अलग हैं वो लोग, जो कर्म को जानते हैं। अलग हैं वो लोग, जो इंसानियत को जानते हैं। अलग हैं वो लोग, जो सिर्फ हैवानियत पहचानते हैं। अलग दिन है, अलग रात है। अलग हैं वो लोग, जो कुटिलता अपनाते हैं। अलग हैं वो लोग, जो सदाचार को अपनाते हैं। अलग हैं वो लोग, मुगालतों में रहते हैं। अलग हैं वो लोग जो ज़मी पर चला करते हैं। अलग हैं वो लोग जो गरीब को पहचानते हैं। अलग हैं वो लोग, जो गरीबी पर हंसा करते हैं। अलग हैं वो लोग, जो आईना दिखाते हैं। अलग हैं वो लोग, जो आईना बना करते हैं। अलग हैं वो लोग, जो दूर होकर भी पास हुआ करते हैं। अलग हैं वो लोग, जो पास होकर भी दूर होते हैं। अलग सुशासन है, अलग कुशासन है। अलग हैं वो लोग, जो वादों को किया करते हैं। अलग हैं वो लोग, जो वादे पूरा किया करते हैं। अलग वो लोग हैं, जो कांटों पर जिया करते हैं। अलग हैं वो लोग, जिन्हें मखमली पसंद है। अलग हैं वो लोग, जो आवाज़ को उठाते हैं। अलग हैं वो लोग जो आवाज़ को दबाते हैं। अलग विचार है। अलग व्यभिचार है। अलग हैं वो लोग, जो मुफलिसी के मारे हैं। अलग हैं वो लोग, जो रईसज़ादे हैं। अलग हैं वो लोग, जो शहर को बसाते हैं। अलग हैं वो लोग, जो श्मशान को बनाते हैं। अलग हैं वो लोग, जो सिस्टम से हुआ करते हैं। अलग हैं वो लोग जो सिस्टम से लड़ा करते हैं। अलग हैं वो लोग, जो सरकार को बदलते हैं। अलग हैं वो लोग, जो सरकार हुआ करते हैं। अलग है अलविदा, अलग है अल्लाह को विदा।

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

लौट आओ प्रियतमा लौट आओ

प्रिये तुम मायके क्या गईं। मेरी ज़िंदगी कालाहारी रेगिस्तान सी हो गई। एक दम वीरान। प्रिये तुम्हारी तस्वीर देखता हूं। तो उदासी की लाली छंट जाती है। हया से गाल लाल हो जाते हैं। घर की रसोई की तरफ देखता हूं तो बर्तन बजते से सुनाई और दिखाई देते हैं। मानों कह रहे हों, बनाते क्यों नहीं खाना आकर ? तुम्हारी चूड़ियों की खनक सुने एक सप्ताह हो गया। विरहा की अग्नि मुझे झुलसाने लगी है। प्रिये क्या तुमको नहीं लगता तुम्हारी नाराज़गी के ये सात दिन मेरे जीवन की अग्निपरीक्षा बन गए हैं। तुम तो आदत बन गईं इन चंद सालों में। ऐसे कोई नाराज़ होकर कहीं जाता है क्या ? मैं मानता हूं कि मेरा अभिमान कई बार तुम्हारी आन पर भारी पड़ जाता है। लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि मैं तुमसे प्रेम नहीं करता। मेरे कठोर ह्दय में भी एक ह्दय है जहां सिर्फ तुम्हारे लिए मैने दस मंजिला मकान बना रखा है। इन दसों मंजिलों पर तुम रहा करती हो। लेकिन अब दिल का यही अपार्टमेंट आज खाली सा लग रहा है। ऐसा लग रहा है कि अकेलेपन के अहसासों ने अब इस दिल के आशियाने को जबरन किराये पर ले लिया हो। कहीं ऐसा न हो ये निर्दयी अहसास मुझ पर कब्ज़ा कर लें, मुझे अपनी जंजीरों में बांध लें। इससे पहले तुम लौट आओ । मुझे पता है तुम ये पंक्तियां पढ़ कर अपने गुलाब सी पंखुड़ियों वाले होंठों से मुस्कुरा रही होगी। मुझे पता है तुम ये पत्र उस कमरे में पढ़ रही हो। जहां न बाबू जी हैं और न मां। आ जाओ शीघ्र आ जाओ। क्योंकि। हमारा रिश्ता अटूट है। मैं भ्रमर, तुम पुष्प हो। आंख तुम अश्क हो। मैं रग तुम रुधिर हो। मैं दिल, तुम धड़कन। मैं सावन, तुम हो बसंत। मैं बालू, तुम गंगा । मैं शब्द, तुम स्याही। मैं पथ, तुम राही। मैं चूल्हा तुम फुंकनी । मैं ब्लैक बोर्ड, तुम डस्टर हो । मैं रेता तुम अभ्रक हो। मैं चूना तुम फिटनी हो। मैं बीयर तुम बर्फ। मैं सोडा, हाला हो। मैं एलईडी तुम डीवीडी। मैं प्रसंग तुम उपसंहार। मैं गद्य प्रिये तुम हो कविता। मैं चॉकलेट, तुम कैंडी हो। मैं कंचा तुम, पिल्लू हो। मैं डंडा तुम गिल्ली हो।मै पराकाष्ठा व्यंग विधा, तुम समालोचना जननी हो। मैं खानाबदोश सा पत्रकार, संघर्षशील तुम लेखक हो। मैं नीति नियति तुम राजनीति। मैं शासन तुम, सत्ता हो। मैं जिजीविषा, तुम आशा हो। मैं जनसंख्या, तुम जगजननी। मैं छाया हूं बरगद की तो तुम पीपल की डाली हो। मैं सिस्टम सरकारी सा, तुम आंधी निजीकरण की हो। मैं होठों की गाली तो तुम सुंदर शब्दों की सिरहन हो। मैं मनरेगा तुम रोजगार। मैं बीपीएल, तुम एपीएल। मैं मलिहाबादी आम प्रिये, तुम लौटा गुड़ का ड्राम प्रिये। मैं पाइप तुम पानी हो। मैं नाना तुम नानी हो। मैं बॉलीवुड की रात प्रिये, तुम हॉलीवुड हंगामा हो। मैं प्रश्नपत्र तुम कुंजी हो। मैं विस्मय तुम बोधक हो। मैं किंतु परंतु तुम लेकिन हो। मैं कंचनजंगा की बर्फ प्रिये, तुम एवरेस्ट की ठंडक हो। मैं पापी तुम पुण्य प्रिये। मैं अभिप्राय, तुम आशय हो। मैं पगडंडी तुम मेढ़ प्रिये। मैं श्वेत श्याम तुम मैदा की भेड़ प्रिये। मैं सर्कस के जोकर सा, तुम अदाकार स्पेशल हो। मैं राशि मुआवज़े वाली हूं, तुम सरकारी अनुकंपा हो। मै तमिलनाडु का डोसा हूं, तुम बंगाली रसगुल्ला हो। मैं चाइना की चाऊमीन, तुम जापानी तरकारी हो। मैं मिथ्यावर्णन की बात प्रिये, तुम सच्चाई की मूरत हो। मैं युद्ध भूमि का धनुष बाण और तुम मेरी प्रत्यंचा हो। मैं दशरथ का राम सही पर तुम मेरी रामायण हो। मैं कलयुग का कान्हा हूं, और तुम ही मेरी गीता हो। मैं राम, तुम सीता हो। प्रिये न जाने क्या हो गया तुम्हारे जाने के बाद। मैं कवि नहीं था, पर कविता लिखने लगा हूं। गायक नहीं था, किंतु गज़ल लिखने लगा हूं। सामाजिक नहीं था, किंतु समाज को समझने लगा हूं। सरकारी मुलाज़िम नहीं था, किंतु सरकार को समझने लगा हूं। प्रेमी नहीं था, प्रेम को समझने लगा हूं। वैरागी नहीं था, किंतु वियोग को समझने लगा हूं। प्रिये तुम्हारे जाने के बाद मैं आंटा दाल का भाव भी समझने लगा हूं। तुम्हारे जाने के बाद से मैं कुप्रबंधन का शिकार हो गया हूं, कब उठता हूं, कब सोता हूं, कब खाता हूं, कुछ पता नहीं। अब कभी नाराज़ नहीं होउंगा। अब कभी तुम्हें सताऊंगा नहीं। कभी फोन पर देर रात बतिआऊंगा नहीं। तुम आ जाओ। बड़ी शिद्दत से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूं। मेरे प्यारे से पत्र का जवाब जरुर देना । तुम नहीं आईं तो मैं फिर एक पत्र लिखूंगा। अब और इंतज़ार बर्दाश्त नहीं होता। हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी, तुम देखी सीता मृग नयनी। तुम्हारे इंतज़ार में...

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

रेडियो नहीं रोटी (सरकारी रहम से रोटी की जुगाड़)

सुशासन बाबू संचार क्रांति हमें क्या देगी ? अब ऐसा एक सवाल बिहार के महादलित अपने नेता नीतीश कुमार से पूछ रहे हैं। आपके दिमाग में सवाल जरुर आया होगा कि सिर्फ महादलित ही ऐसा क्यों सोच रहे होंगे ? तो इसका जवाब है कि बिहार सरकार ने दूसरे राज्यों की तरह उनके उद्धार के लिए कई योजनाएं चला रखी हैं। मसलन कई तरीकों के रंग बिरंगे कार्डों की योजनाएं महादलितों के सपनों की दुनिया को रंगीन करने के लिए रजिस्टरों में दर्ज कराई गईं हैं।लेकिन ऐसे लाल नीले पीले कार्डों से किसी की दुनिया में रंग भरे नहीं जा सकते। वो भी तब तक, जब तक कि किसी योजना को धरातल पर न उतार दिया गया हो। ये बात भी अलग है कि धरातल पर उतरने के बाद भी ये योजनाएं आज बिचौलियों की भेंट चढ़ती जा रही हैं। बिहार महादलित विकास मिशन करीब 89 लाख 90 हज़ार महादलितों का उद्धार करने के लिए बिहार के 37 ज़िलों में काम कर रहा है। सूबे की 21 महादलित जातियों पर किया जाने वाले दफ्तरी कार्य बेहद सराहनीय है। इन सभी महादलितों के लिए सरकार ने कुछ न कुछ सोच रखा है। एक ऐसी ही योजना है महादलितों को रेडियो मुहैया कराने की। महादलितों को मुख्यधारा में लाने एवम् प्रभावी जीवन दृष्टि बनाने के लिए इस योजना के तहत प्रत्येक परिवार को रेडियो खरीदने के लिए लिए 400/- रु0 दिया गया। यहां सरकार का मकसद था कि सूबे के उन पिछड़े राज्यों तक संचार क्रांति को पहुंचाया जाए। जहां अब तक विकास की रोशनी नहीं पहुंच सकी है। कम से कम महादलित इस बात पर तो इतरा ही सकें कि उनके घर में संचार क्रांति के नाम पर एक रेडियो सरकार द्वारा पहुंचा दिया गया है। रेडियो की इसी योजना के साथ महादलितों की पीर शुरु होती है। आपको यकीन तो न होगा कि कोई सरकारी योजना किसी के लिए पीर कैसे बन सकती है? लेकिन ये कड़वे घूंट की ऐसी सच्चाई है जिसे महादलित हर रात पिया करते हैं। दरअसल नीतीश सरकार ने जिन महादलितों को रेडियो बांटे हैं उन महादलितों के पास इतने भी पैसे नहीं हैं कि वे अपनी दिन भर की रोटी की जुगाड़ कर सके। दिन भर अपने हाड़ को गलाते महादलित जैसे तैसे अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं। ऐसी स्थिति में जब बात रेडियो में सेल डालने की आती है। तो जिनके रेडियो के सेल जवाब दे गए । उन रेडियो में सेल आज तक पड़े ही नहीं। इसलिए रेडियो बेंचकर लोग रोटी की जुगाड़ कर रहे हैं। जो रेडियो सेलविहीन हो चुका है वो बच्चों के हाथ में महज़ एक खिलौने की तरह शोभा बढ़ाता दिखाई दे रहा है। यहां भी कहानी में एक पेंच है, जो रेडियो सरकार ने महादलितों के बीच बंटवाए हैं वो आधुनिकता के हिसाब से बेहद भारी और उनका मेंटिनेंस बहुत ज्यादा है। हर महीने उन रेडियो में तीस रुपए के सेल लगाने पड़ते हैं। महादलितों के लिए तीस रुपए की ये राशि एक दिन की रोटी की व्यवस्था कर देती है। इस लिहाज़ से रेडियो की ये योजना महादलितों के लिए अभिषाप जैसी बन गई है। हो सकता है कि जब आपकी ये लुभावनी योजना महादलितों तक पहुंची हो तो सभी के चेहरों पर खुशी का माहौल दिखा हो। लेकिन नीतीश जी आज आपका सरकारी रहम इन महादलितों के काम नहीं आ रहा है। भूखा पेट कोई भजन नहीं सुनना चाहता। जब महादलितों को भूख लगेगी तो संचार क्रांति काम नहीं आएगी। वैसे भी जिस संचार क्रांति को आपने रेडियो के ज़रिए गांव गावं तक पहुंचाने की कोशिश की है वो संचार क्रांति महादलितों को बहुत महंगी पड़ रही है। एक महादलित औरत से जब रेडियो के बारे में कुछ पूछा जाता है। तो उसका पहला जवाब यही होता है कि रोटी की व्यवस्था करें, या रेडियो की मरम्मत कराएं। ऐसी स्थिति बेहद भयानक है। कि जिस राज्य में मुफलिसों पर सरकारें रहम करती हैं। उसी रहम को बेंचकर वो लोग अपने लिए एक दो दिन की रोटी का इंतज़ाम कर लेते हैं। बिहार के हाकिम आपको ये बात समझनी होगी कि रेडियो से पेट नहीं भरता, अगर पेट किसी का भरना है तो उन्हें रोजगार देना होगा। ये हम नहीं वो लोग भी कह रहे हैं जिनकी ज़िंदगी अभावों के चलते जहन्नुम बन गई है। ये ठीक है कि आप (नीतीश) उनके बारे में सूचना क्रांति के नज़रिए से देखते हैं। लेकिन ऐसी सूचना क्रांति का कोई क्या खाक करेगा जब पेट फाकों को मजबूर होगा। हुजूर आप अपने सरकारी रहम की गत देखिए। सोचिए कि ये महादलित लोग आपके रहम को बेंचकर रोटी की जुगाड़ कर रहे हैं। बस इतना समझिए कि ये अपनी शिकायतें आप तक कभी नहीं पहुंचा सकेंगे। हम तो बस एक ज़रिया भर हैं। तय आपको करना है कि हाकिम अपनी रियाया को अब कितना करीब से जानेगा। क्योंकि ये बात याद रखिए लोग सरकारी रहम से रोटी की जुगाड़ कर रहे हैं।

शनिवार, 17 मार्च 2012

हे धरती के भगवान

हे धरती के भगवान।

तुमको मेरा कमर को आधार मानकर 45 डिग्री पर प्रणाम। पुतलियां पथरा गई थीं अरसे से टीवी देख देख कर । और तुम्हारे रनों का टोटा हर रोज़ मेरी चांद को टिपियाता। मैं झल्लाता । लेकिन तुम्हें मेरी झल्लाहट पर रहम न आता। लेकिन आज मैं सारे निजी कार्यों से निवृत्त होकर तुम्हारी अर्चना में जुटा था। सुबह से धूप दीव नैवेद्य के साथ तुम्हारी ईश्वर स्वरुप महिमा मंडित बल्ला उठाऊ तस्वीर का पूजन कर रहा था। पड़ोस से पंडित श्री श्री 108 कदाचित तामलोट लोटन प्रसाद सत्यानासी काशी निवासी पंडित राधे श्याम उपाध्याय को भी बुलवाया था। इस आशा में कि कहीं मुझसे पूजा में कोई मंत्र पढ़ गया तो तुम फिर शतक से चूक जाओगे। और मैं अपनी टांट को टिपियाता फिरुंगा। लेकिन तुम हे धरती के भगवान आज बरेली रोजा पैसेंजर की तरह जब चल निकले तो फिर बरेली से चलने के बाद रोजा ही रुके। तुमने वो महा सुस्त शतक बना ही डाला। जिसका इंतज़ार पिछले एक साल से आपके भक्त कर रहे थे। हे सट्टेबाजों के ईष्ट तुम मेरे घनिष्ट हो अब मुझे ये पता चल गया है। क्योंकि जिस धैर्यपूर्वक पारी में तुमने अपनी जीवटता की मिसाल पेश की है उसकी आशा किसी बुज़ुर्ग खिलाड़ी से ही की जा सकती है। तुमने 147 गेंदों का संहार किया। तब जाकर बड़ी मुश्किल से 114 रन जुटा सके। हे धरती के भगवान तुम्हारे धैर्य को मेरा फिर उसी डिग्री पर प्रणाम। हे क्रिकेट जगत के राजहंस तुम इस युग के ईसा हो। क्योंकि ईसा भी अपने विरोधियों के लिए कहा करते थे कि हे भगवान इन्हें क्षमा करना ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं। तुम भी तो यही कहते हो। लोग तुम्हारी आलोचना करते हैं। और तुम उनसे कुछ नहीं कहते अपना बड़प्पन दिखाकर उन्हें माफ कर देते हो। हे सचिन प्रभू आज तुम्हारे ही महा सुस्त शतक की बदौलत भारत बांग्लादेश जैसी पिद्दी टीम के सामने 289 बनाने लायक हुआ। लेकिन प्रभू की तो लीला अपरंपार होती है। देखिए कैसे झोली में गिर गया मैच बांग्लादेश की। हे दीन दुखियारे सटोरियों के महा प्रभू तुम्हारे महाशतक को मेरा महा प्रणाम। तुम ऐसे ही सतत खेलते जाना। किसी की न सुनना। साल में एक सैकड़ा मार देना। साल भर लोग तुम्हारी आलोचना करेंगे उसके बाद जब तुम शतक वीर बनोगे। तो टीवी पर ब्रेकिंग चलेगी। अखबार में मोटी मोटी सुर्खियां छपेंगी। क्रिकेट का बूढ़ा भगवान आज भी महान। तुम ऐसे ही क्रिक्रेट खेलोगे तो एक दिन तुम्हारा औसत कोर्टनी वॉल्श सा हो जाएगा। 42 से घटकर तुम्हारा औसत 4.2 तक आ जाएगा। तुम यहां भी रिकॉर्ड बना दोगे। क्योंकि तुम्हें सचिन रिकॉर्ड तेंदुलकर भगवान भी तो कहा जाता है। हे देवी अंजलि के देवता अब तुम्हारी संतान के क्रिक्रेट खेलने का वक्त आ गया है। तुम आदेश दोगे तो मैं उसके लिए भी अगरबत्ती जलाऊंगा । पंडित राधेश्याम को बुलवाऊंगा। लेकिन अब मेरी तुमसे एक गुहार है तुम क्रिकेट के सन्यासी हो जाओ। कुछ दिन घर बैठो । परिवार के साथ घूमो-फिरो। और फिर कुछ दिन बाद हमें कमेंट्री बॉक्स में दिखो। कृपया मेरी किसी भी बात को अन्यथा न लेना। मैं तो बस तुमसे विनम्र निवेदन कर रहा हूं। कहीं तुम नाराज़ न हो जाना। मैं तुम्हारी नाराज़गी को बर्दाश्त न कर पाऊंगा। सालों से क्रिकेट देख रहा हूं। तुम्हें मैने भगवान के रुप में पाया है। भगवान को कोई कुछ कहता है तो मुझे बुरा लगता है। इसलिए मेरी भी इज्जत का ख्याल रखना। एशिया कप के बाद मैदान में दिखाई न देना। मैं तो अपने भगवान को अब कमेंट्री बॉक्स में देखना चाहता हूं। हे दयानिधान मेरी गुहार पर गौर फरमाना। क्योंकि कमेंट्री बॉक्स में भी रोजगार के बड़े साधन है। इतना ही कहूंगा । ज्यादा वक्त न मेरे पास है और न ही तुम्हारे पास। चिट्ठी पहुंच जाए तो जवाब जरुर देना। भूल चूक लेनी देनी। तुम्हारा बनवारी लाल। इतिश्री फिलहाल।