निर्जीव किंतु, जीवट हूं मैं
रंगता हूं अंतरमन तक को
नहीं जानता जाति-धर्म मैं
बस लग जाता हूं सबको
गोरे-कालों की भेद मिटाकर
मैं भावों पर छा जाता
कभी किसी की कविता बनता
कभी गीत बन जाता
मैं राष्ट्र एकता का भागी हूं
और अहसासों का साथी
एक रहें सब दुनिया में
ये मेरे जीवन की थाती
क्रोध मिटा लो, द्वैष मिटा लो
भूल जाओ हर एक व्यथा
लगा रहूं मैं सबके तन पर
अंतिम लब्ज़ों में ये एक कथा
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रंगों का त्यौहार, प्यार की फुहार, अल्हड़ मस्ती का सार, अहसासों की सिमटी दुनिया में प्रस्तुती का त्यौहार, होली आज मुबारक, कल मुबारक, हमेशा मुबारक....
शुक्रवार, 18 मार्च 2011
शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011
नई गाथा...
वक्त की सुनामी ने अंधियारे और गमों के धुएं को समेट कर कहीं बहा दिया। झंझावातों में उलझे जज्बाज, छ सालों से सुलग रहे ज्वाला मुखी में जलकर कहीं भस्म हो गए । तकदीर के फसानों ने अब नई गाथा लिखनी शुरु कर दी है। इसी कहानी में अब एक नया चरित्र घर कर चुका है। उसके साथ उम्मीदों का कल्पतरु इतना विशाल है कि पिछले ज़ख्मों की टीस उसकी जड़ों में दबकर अब कहीं ज़मींदोज़ हो चुकी है। मुस्कान के खलिहान में उजाले की पहली किरण कुछ ऐसे पड़ी है कि मौसम सुनहरा हो उठा। इसी मौसम ने चेहरे की सड़क पर खुशी की नुमाइश लगा दी है। जिस किरण की तलाश में बरसों भटका, वो अब मेरे पास है। शहर की गलियों में उसकी मौजूदगी बड़ी खास है। स्याह रात से हसीन सुबह तक ये गाथा अब नया इतिहास लिखने वाली है। एवरेस्ट की पिघलती बर्फ पर शीतल अहसासों ने एक घरौंदा सा बना लिया है। उस घरौंदे में उम्मीदों के पंछियों ने अपना बसेरा कर लिया है। अब वो उस मौसम के इंतज़ार में रहते हैं कि कब बसंती मौसम उनके लिए बहारों की सौगात लेकर आता है। ये उन गुनगुने अहसासों की बारिश की बदौलत है जो पिछले छ सालों में एक टीस का पर्व बन गए थे। हर साल रह रह कर सताया करते थे। जब कभी पछुआ हवाएं चला करतीं तो घाव और हरे हो जाया करते । उनमें एक चीख उभर आया करती । जिसकी ह्दय विदारक ध्वनि आज भी जब महसूस करता हूं। तो कंपकंपी सी आ जाती है। लेकिन हर बार की तरह अब ऐसा नहीं होगा। बिखरी ख्वाहिशों का अब एक गट्ठर मैने बना लिया है। जो पहले से कहीं मजबूत है। हो सकता है कि ये मेरा वहम लो। लेकिन दिल की घबराहट अब जाती रही है। किसी की डर नहीं। बेखौफ हूं। व्यथित मन की अंगड़ाईयां हसरतों की गोधुली बेला के आने से कहीं गुम हो गई हैं। अब थकान नहीं। निरंतर चलने की ख्वाहिश है। अधूरेपन की बेचारगी को भूल एक नया दरख्त मन में अपनी जड़ें जमा चुका है।
मंगलवार, 18 जनवरी 2011
बिहारीनामा
नाम बिहारी था। लेकिन रहते उत्तर प्रदेश में थे। कंजूसी उनका पेशा था, जिसे वो तब से कर रहे थे, जब से होश संभाला। चार बच्चे अपने, और दो बच्चे पराए। ये दो बच्चे युवावस्था के कुटैवों का परिणाम थे जो उनके अनुसार अब गले की हड्डी थे। उनका पेशा सरकारी नहीं था, फिर भी एक सरकारी आवास उनके कब्जे में था, और मरते दम कई सरकारी फरमानों के बावजूद वो उसका मोह त्याग न सके। जसके परिणाम स्वरूप वो दरवाजा पकड़े-पकड़े इस लोक से इह लोक सिधार गए। मतलब दरवाज़े की कुंडी पकड़े-पकड़े उन्होंने अपने प्राणों को यमराज के हवाले कर दिया। इसमें भी थोड़ा संदेह है, कि इतनी आसानी से उन्होंने अपने प्राण यमराज के हवाले क्यों किए। जबकि वो तो निहायत ही ज़िद्दी किस्म के थे।
इस समस्या के निदान के लिए उनेक आलोचकों के खोजबीन विभाग ने जब अपने डोज़ियर सौंपे तो पता चला कि उन्होंने चित्रगुप्त से भी समझौता कर रखा था, कि उनके कुटैवों को संज्ञान में न रखा जाए, और दो चार भले कार्य जो उनके द्वारा भली भांति नहीं निपटाए जा सके थे, उन्हें ध्यान में रखा जाए। इसका सीधा अर्थ ये था कि वो नर्क नहीं जाना चाहते थे, स्वर्ग उन्हें प्रिय था। चूंकि मरण एक सत्य है, इसलिए वो स्वर्ग जाने की ख्वाहिश तब से पाले थे, जब से उन्होंने होश संभाला था, और मृत्यु के मर्म को जाना था। यही कारण था कि 60 की अवस्था में उन्होंने छिनैती, छेड़खानी, उठाईगीरी, और कंजूसी जैसी घिनौनी घटनाओं को अंजाम दे दिया था। अप्रत्यक्ष तरीके से पैसा कमाने का कोई भी विचार उनसे बच न सका था।
बचपन से ही जुगाड़ नामक वाहन पर सवार बिहारी इतना ही पढ़ सके थे, कि बस किसी अखबार का मास्टहेड देखकर पहचान जाते थे, कि वो अखबार कौन सा है। वैसे नोट गिनने की तकनीक भी उनकी साक्षरता को दर्शाती थी। उनकी जुगाड़ प्रवृत्ति के किस्से बीसियों मील तक फैले थे, ठीक वैसे ही जैसे बम पुलिस के जमादारों द्वारा न साफ की जा सकी जगह की बदबू। युवावस्था की उम्र में पांचवें तक बमुश्किल ही की जा सकने वाली उनकी पढ़ाई का एक वाकया बेहद मशहूर था, जब मास्टर पढ़ा रहा था लिंग भेद, और कह रहा था नपुंसक लिंग, तो वो समझे कि मास्टर ने उन्हें नपुंसक कह दिया, तो वहीं मास्टर के सामने दिखाने लगे अपनी मर्दानगी के सुबूत। मास्टर शर्मसार थे, लेकिन बिहारी तो बिहारी थे, मास्टर द्वारा न की जा सकने वाली बेज्जती भला कैसे बर्दाश्त होती। ध्यान रहे उनकी मर्दानगी के सबूत लेख की शुरुआत में ही दिए जा चुके है
उनके फलेफूले शरीर को देखकर जल-भुन जाने वालों की एक लंबी कतार थी। किसी विवादास्पद ढांचे की तरह उनका उदर पूरे शरीर पर एक साम्प्रदायिक दंगे जैसा था। जिसमें निश्चित तौर पर जीत उनके उदर की ही मानी जाती। उनके करामाती उदर के भी काफी किस्से थे। कुछ लोग जो उनकी उदरछटा का शिकार हुए थे, वो जब उनके बारे में कुछ बताया करते थे, तो मन वाह वाह कर उठता। क्योंकि जब कभी सफेद धोती में बिहारी सैर सपाटे पर निकलते, तो सड़क चलते ही उनका उदर बहक जाता, और उनके पीछे आने वाला आदमी अपनी नाक को बचाए फिरता दिखाई देता । कई बार तो आलम ये हो जाता कि जब कभी शरीर पर मौजूद विवादित ढांचा दस्त के साये में होता, तो ये साया उनके उस प्रलाप के साथ बाहर निकलता और उनकी धोती पर फाइन आर्ट की अद्बुत छटा बिखेर जाता, जिसकी वजह से लोग अपनी नाक बचाये फिरा करते थे। और उन फाइन आर्ट रुपी दागो से उन्हें कोई ऐतराज भी नहीं होता क्योंकि उनके लिए तो दाग अच्छे हैं। अजीबो गरीब और पूर्व सूचना के साथ बने इन नक्शों में छोटे छोटे राज्यों की झलक साफ देखी जा सकती थी। कुल मिलाकर उनकी धोती ऐतिहासिक जामा बन चुकी थी।
सीधे बोलना उनकी आदत थी। ऐसा नहीं था कि वो लखनऊ में बहन जी द्वारा कराए गए वर्टिकल डेवलपमेंट की तरह सीधे थे। कई बार उनकी ज़ुबान से निकला वर्टिकल वार उस क्रूज मिसाइल की तरह साबित होता, जिसे अक्सर अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान पर छोड़ा जाता था। जिसका नतीजा ये होता था। कि सीधी बात लोगों का कलेजा छलनी करते हुए मुंह के रास्ते अपशब्दों के माध्यम से बाहर आ जाती थी। और इसके बाद शुरु होता था फसाद-ए-मां बहन। जिसका जीवन रहते तो उन्हें कभी मलाल न हुआ।
विडंबना देखिए कि हाथ अचानक बिहारी नामा लिखते लिखते रुक गए। ऐसा नहीं कि लिखने का मन नहीं हो रहा। बस यूं समझिए कि इतना उनकी छवि के लिये काफी है। वैसे कहानी अभी अधूरी है जिसका ज़िक्र अपनी किताब में कभी किया जाएगा। आत्मा अजर है ।अमर है ।बिहारी मृत हैं। लेकिन फिर भी उनकी स्मृतियां आज भी लोगों के ज़हन में हैं। और खास बात ये कि चर्चाओं के बाज़ार में वो हमेशा की तरह अपनी धाक जमा ही लेते हैं।
इस समस्या के निदान के लिए उनेक आलोचकों के खोजबीन विभाग ने जब अपने डोज़ियर सौंपे तो पता चला कि उन्होंने चित्रगुप्त से भी समझौता कर रखा था, कि उनके कुटैवों को संज्ञान में न रखा जाए, और दो चार भले कार्य जो उनके द्वारा भली भांति नहीं निपटाए जा सके थे, उन्हें ध्यान में रखा जाए। इसका सीधा अर्थ ये था कि वो नर्क नहीं जाना चाहते थे, स्वर्ग उन्हें प्रिय था। चूंकि मरण एक सत्य है, इसलिए वो स्वर्ग जाने की ख्वाहिश तब से पाले थे, जब से उन्होंने होश संभाला था, और मृत्यु के मर्म को जाना था। यही कारण था कि 60 की अवस्था में उन्होंने छिनैती, छेड़खानी, उठाईगीरी, और कंजूसी जैसी घिनौनी घटनाओं को अंजाम दे दिया था। अप्रत्यक्ष तरीके से पैसा कमाने का कोई भी विचार उनसे बच न सका था।
बचपन से ही जुगाड़ नामक वाहन पर सवार बिहारी इतना ही पढ़ सके थे, कि बस किसी अखबार का मास्टहेड देखकर पहचान जाते थे, कि वो अखबार कौन सा है। वैसे नोट गिनने की तकनीक भी उनकी साक्षरता को दर्शाती थी। उनकी जुगाड़ प्रवृत्ति के किस्से बीसियों मील तक फैले थे, ठीक वैसे ही जैसे बम पुलिस के जमादारों द्वारा न साफ की जा सकी जगह की बदबू। युवावस्था की उम्र में पांचवें तक बमुश्किल ही की जा सकने वाली उनकी पढ़ाई का एक वाकया बेहद मशहूर था, जब मास्टर पढ़ा रहा था लिंग भेद, और कह रहा था नपुंसक लिंग, तो वो समझे कि मास्टर ने उन्हें नपुंसक कह दिया, तो वहीं मास्टर के सामने दिखाने लगे अपनी मर्दानगी के सुबूत। मास्टर शर्मसार थे, लेकिन बिहारी तो बिहारी थे, मास्टर द्वारा न की जा सकने वाली बेज्जती भला कैसे बर्दाश्त होती। ध्यान रहे उनकी मर्दानगी के सबूत लेख की शुरुआत में ही दिए जा चुके है
उनके फलेफूले शरीर को देखकर जल-भुन जाने वालों की एक लंबी कतार थी। किसी विवादास्पद ढांचे की तरह उनका उदर पूरे शरीर पर एक साम्प्रदायिक दंगे जैसा था। जिसमें निश्चित तौर पर जीत उनके उदर की ही मानी जाती। उनके करामाती उदर के भी काफी किस्से थे। कुछ लोग जो उनकी उदरछटा का शिकार हुए थे, वो जब उनके बारे में कुछ बताया करते थे, तो मन वाह वाह कर उठता। क्योंकि जब कभी सफेद धोती में बिहारी सैर सपाटे पर निकलते, तो सड़क चलते ही उनका उदर बहक जाता, और उनके पीछे आने वाला आदमी अपनी नाक को बचाए फिरता दिखाई देता । कई बार तो आलम ये हो जाता कि जब कभी शरीर पर मौजूद विवादित ढांचा दस्त के साये में होता, तो ये साया उनके उस प्रलाप के साथ बाहर निकलता और उनकी धोती पर फाइन आर्ट की अद्बुत छटा बिखेर जाता, जिसकी वजह से लोग अपनी नाक बचाये फिरा करते थे। और उन फाइन आर्ट रुपी दागो से उन्हें कोई ऐतराज भी नहीं होता क्योंकि उनके लिए तो दाग अच्छे हैं। अजीबो गरीब और पूर्व सूचना के साथ बने इन नक्शों में छोटे छोटे राज्यों की झलक साफ देखी जा सकती थी। कुल मिलाकर उनकी धोती ऐतिहासिक जामा बन चुकी थी।
सीधे बोलना उनकी आदत थी। ऐसा नहीं था कि वो लखनऊ में बहन जी द्वारा कराए गए वर्टिकल डेवलपमेंट की तरह सीधे थे। कई बार उनकी ज़ुबान से निकला वर्टिकल वार उस क्रूज मिसाइल की तरह साबित होता, जिसे अक्सर अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान पर छोड़ा जाता था। जिसका नतीजा ये होता था। कि सीधी बात लोगों का कलेजा छलनी करते हुए मुंह के रास्ते अपशब्दों के माध्यम से बाहर आ जाती थी। और इसके बाद शुरु होता था फसाद-ए-मां बहन। जिसका जीवन रहते तो उन्हें कभी मलाल न हुआ।
विडंबना देखिए कि हाथ अचानक बिहारी नामा लिखते लिखते रुक गए। ऐसा नहीं कि लिखने का मन नहीं हो रहा। बस यूं समझिए कि इतना उनकी छवि के लिये काफी है। वैसे कहानी अभी अधूरी है जिसका ज़िक्र अपनी किताब में कभी किया जाएगा। आत्मा अजर है ।अमर है ।बिहारी मृत हैं। लेकिन फिर भी उनकी स्मृतियां आज भी लोगों के ज़हन में हैं। और खास बात ये कि चर्चाओं के बाज़ार में वो हमेशा की तरह अपनी धाक जमा ही लेते हैं।
सोमवार, 6 सितंबर 2010
नाक का सवाल
इंसान से लेकर जानवर तक की भौतिक संचरना में नाक का स्थान काफी महत्वपूर्ण है, सूंघने के सुख से लेकर छींकने के सुख तक नाक ने अपनी महत्ता को ऐसे दर्शाया है जैसे आगरा में ताजमहल ने अपने आप को। चेहरे पर नाक की उपस्थिति दिल्ली के कुतुबमीनार का अहसास कराती है। कई वन्य जीवों के लिए नाक उनके शिकार का माध्यम बनती है। ये कहा जा सकता है कि उनकी जो जून की जुगाड़ नाक आधारित होती है। अगर नाक न हो तो उन्हें लंघन (व्रत) करना पड़ जाए।
पुराणों में भी नाक की महिमा का बड़ा ही विशद वर्णन किया गया है। शूर्पनखा की नाक न कटती तो राम की विजय और रावण की हार न होती। ये नाक की ही लीला थी जो लक्ष्मण, रावण की बहिन को नकटा कर बैठे, शूर्पनखा राम के साथ रंगरेलियां मनाना चाहती थी, जबकि लक्ष्मण के लिए यही बात नाक का सवाल थी, एक झटके में गुस्सैल लक्ष्मण ने शूर्पनखा की नाक को हमेशा-हमेशा के लिए उसके सुंदर मुखड़े से जुदा कर दिया। अब जब कि लक्ष्मण ने अपनी और अपने भाई की नाक की बदौलत शूर्पनखा की नाक शहीद कर डाली तो ये बात भला रावण की नाक के लिए कैसे सवाल न बनती। अहंकारी रावण चल दिया राम के साथ सीतमपैजार करने। नाक का सवाल तो सभी के लिए बराबर ही है फिर चाहे वो राम हो या रावण। अब सीता के अपहरण मामले में रावण की खोज एक बार फिर राम के लिए नाक का सवाल बन गई। दोनों की नाक चूंकि अपने अपने समाज में बेहद ऊंची थी, इसलिए नाक के बचाव के लिए दोनों एक दूसरे के प्राण हरने को आमादा थे। अब जबकि बात राम और रावण चल रही है तो भला सु्ग्रीव, बाली, अंगद और हनुमान जैसे चरित्रों को कैसे भूले, इन सभी ने अपनी अपनी नाक के सवाल की रक्षा हेतु शोणित की नदियां बहा डालीं। अथक प्रयासों से और नाक के सवाल ने क्षत्रीय कुल की जैसे- तैसे लाज बचा ही ली, तमाम सीतमपैजार के बाद जब सीता घर लौटीं तो राम के नाक का सवाल बन गई सीता जी की इज्जत, जिसकी खातिर लव कुश की महतारी को अग्निपरीक्षा देनी पड़ी। वाह री नाक हो तो भी मुसीबत, न हो तो भी मुसीबत।
द्वापर युगीन यदुवंशी के लिए भी कंस नाक का सवाल था, लिहाज़ा महज़ 12 साल की ही आयु में किसन जी को अपने मामा के रक्त से हाथ लाल करने पड़े। यहां भी नाक ने ही युद्ध करवा दिया । इस बात से ये बात भी साबित होती है कि नाक के सवाल के जवाब ढूंढो तो युद्ध हो जाता है। दो देश आपस में भिड़ जाते हैं। जैसा कि मैं पहले ही इंगित कर चुका हूं, कि नाक चाहे किसी की भी हो उसके अहंकार का प्रतीक होती है। अगर किसी भिखारी से भी ऊंचे स्वर में बात की जाए तो, और भिखारी थोडा़ भी स्वाभिमानी हुआ, तो नाक के सवाल की खातिर वो आपकी इज्जत का भी फालूदा कर सकता है।
गणेश जी और शंकर जी की कहानी भी शायद आपको याद ही होगी, एक बार गणेश जी की अम्मा यानी पार्वती जी स्नान ध्यान में तल्लीन थी, लिहाज़ा द्वार पर ताका-झांकी से बचाव हेतु गणेश जी को पहरेदार के रुप में खड़ा किया गया था, इतने में कैलाश पर्वत पर भड़ैती फाने भगवान शंकर वहां आ पधारे, वो पार्वती से मिलना चाहते थे, लेकिन गणेश अवरोध उत्पन्न कर रहे थे, दोनों में काफी हील-हुज्जत हुई, लेकिन कोई टस से मस न हो। क्योंकि यहां भी दोनों की नाक का सवाल था, इसलिए दोनों में काफी तूतू-मैंमैं हुई, फैसला कुछ हो पाता इससे पहले ही गुस्सैल कैलाशी ने गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया। ऐसे मौके पर पार्वती का हाल भी वैसा ही हुआ जैसा भारतीय पुलिस का, जो हमेशा देर से पहुंचती है, यहां पार्वती जब तक पहुंचीं तब तक गणेश जी खूना खच्चर हो चुके थे, अब पार्वती को शंकर जी पर गुस्सा आया, अब उनमें तूतू-मैमैं शुरु हो गई, निर्णय ये निकल कर आया कि अब गणेश जी के सिर की व्यवस्था की जाए। इसी व्यवस्था के साथ एक बार फिर शंकर जी के लिए नाक का सवाल सामने निकल कर आया, खैर जैसे तैसे शंकर जी की असीम अनुकंपा से एक हाथी के सिर की जुगाड़ कर ली गई, जिसे गणेश जी के धड़ में फिक्स कर दिया गया, जो आज भी हम कैलेंडरों में देख सकते हैं, कैलेंडर देख कर याद रखिएगा कि ये सिर किसी की नाक का सवाल था।
धर्मयुग पर चलते-चलते थोड़ा अधर्मी युग की ओर भी चलिए, जहां खाने को रोटी नहीं लेकिन फिर भी नाक का सवाल हर किसी की नाक पर रखा रहता है। चने वाले ने चने में प्याज थोड़ी कम डाली तो ये बात ठाकुर वीर सिंह ने अपनी आन पर लेते हुए, उसके ही चाकू से उसकी नाक काट डाली, और उसे शूर्पनखा का मर्दाना रुप दे डाला। भला हो लुच्चे रस्तोगी का, जिसको ये बात नागवार गुजरी कि किसी ने उसके पीछे से उसे चिढ़ाने के लिए सीटी बजा दी, ये बात लुच्चे रस्तोगी के लिए नाक का सवाल बन गई, और उससे सीटी बजाने वाले को गरियाना शुरु कर दिया, ये बात और है कि बाद में पिटाई उसी की हुई। और नाक का सवाल करते करते सरे आम उसकी नाक बगैर खूना खच्चर हुए कट गई। हमारे मोहल्ले में लल्लन बाबू की नाक के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि मोहल्ले में बंदर दिख न जाएं। क्योंकि जहां बंदर दिखेंगे वहां लल्लन बाबू भी दिख जाएंगे। लल्लन और बंदरों के बीच की ये दुश्मनी चोर सिपाही की दुश्मनी जैसी है। और इस दुश्मनी के बीच जो सबसे बड़ी बात जुड़ी है वो भी नाक से ही ताल्लुक रखती है। लल्लन चाहते हैं कि बंदर मोहल्ले से निकल जाएं और बंदर चाहते हैं कि लल्लन इस मोहल्ले से निकल जाएं। रोज़ इस बात की जंग होती है, लेकिन सच यही है कि पिछले तीस सालों का इतिहास आज भी बदला नहीं है, न लल्लन ने ही बंदरों के भय से मोहल्ला छोड़ा और न ही बंदरों ने लल्लन के भय से। उनकी नाक का सवाल आज भी सवाल ही है?
उत्तरप्रदेश की सत्ता में बहन जी का भी हाल नाक की खातिर कुछ ऐसा हो चुका है, चूंकि यूपी की सत्ता मायावती के लिए नाक का सवाल थी, इसलिए ब्राह्मण ठाकुरों को भी अपने दल में जोड़ने लगीं, जिन्हें पहले वो गरियाया करती थीं, अब उन्हीं को गले लगाती हैं, ये जरुर है कि पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता सुख भोगने के बाद पुन: उनके दल से ब्राह्मण ठाकुरों को लतियाया जाने लगा है। खैर बहिन जी की नाक तो बच ही गई, अब चाहे दूसरों की कटे या बची रहे। सोनिया गांधी के लिए भी हिंदी सीखना नाक के सवाल जैसा था, क्योंकि विपक्ष उनकी हिंदी की खिल्ली उड़ाया करता था, और इस इतालवी महिला को बार बार शर्मिंदा होना पड़ता था, औरत के लिए हया ही सब कुछ है, हया और नाक के सवाल की खातिर सोनिया को हिंदी सीखनी ही पड़ी। और आज हिंदी में ही भाषण देने की बदौलत वो काफी हद तक लोगों को जवाब देने में सफल रही हैं।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी नाक ने सफलता के झंडे गाड़े हैं, इस मामले में भारत की नाक वाकई कुतुबमीनार साबित हुई है, इंदिरा नुई, लक्ष्मी मित्तल, बॉबी जिंदल आदि आदि, इन सभी ने विदेशों में सफलता की वो इबारत लिखी कि विदेशियों के लिए ये लोग नाक का सवाल बन गए। तो भइया नाक सवालों की जननी है, या यूं कहें कि सूंघने छींकने के अलावा नाक के पास सवाल पैदा करने का भी एक बड़ा काम है। नाक ने जब-जब जहां-जहां सवाल किए वहां-वहां इतिहास लगभग बदल ही गया। बशर्ते कि सवाल बेक़ायदा न हों। इतिश्री फिलहाल नाक के सवालों को थोड़ा विश्राम दिया जाए। नाक बचा कर रखिएगा।
पुराणों में भी नाक की महिमा का बड़ा ही विशद वर्णन किया गया है। शूर्पनखा की नाक न कटती तो राम की विजय और रावण की हार न होती। ये नाक की ही लीला थी जो लक्ष्मण, रावण की बहिन को नकटा कर बैठे, शूर्पनखा राम के साथ रंगरेलियां मनाना चाहती थी, जबकि लक्ष्मण के लिए यही बात नाक का सवाल थी, एक झटके में गुस्सैल लक्ष्मण ने शूर्पनखा की नाक को हमेशा-हमेशा के लिए उसके सुंदर मुखड़े से जुदा कर दिया। अब जब कि लक्ष्मण ने अपनी और अपने भाई की नाक की बदौलत शूर्पनखा की नाक शहीद कर डाली तो ये बात भला रावण की नाक के लिए कैसे सवाल न बनती। अहंकारी रावण चल दिया राम के साथ सीतमपैजार करने। नाक का सवाल तो सभी के लिए बराबर ही है फिर चाहे वो राम हो या रावण। अब सीता के अपहरण मामले में रावण की खोज एक बार फिर राम के लिए नाक का सवाल बन गई। दोनों की नाक चूंकि अपने अपने समाज में बेहद ऊंची थी, इसलिए नाक के बचाव के लिए दोनों एक दूसरे के प्राण हरने को आमादा थे। अब जबकि बात राम और रावण चल रही है तो भला सु्ग्रीव, बाली, अंगद और हनुमान जैसे चरित्रों को कैसे भूले, इन सभी ने अपनी अपनी नाक के सवाल की रक्षा हेतु शोणित की नदियां बहा डालीं। अथक प्रयासों से और नाक के सवाल ने क्षत्रीय कुल की जैसे- तैसे लाज बचा ही ली, तमाम सीतमपैजार के बाद जब सीता घर लौटीं तो राम के नाक का सवाल बन गई सीता जी की इज्जत, जिसकी खातिर लव कुश की महतारी को अग्निपरीक्षा देनी पड़ी। वाह री नाक हो तो भी मुसीबत, न हो तो भी मुसीबत।
द्वापर युगीन यदुवंशी के लिए भी कंस नाक का सवाल था, लिहाज़ा महज़ 12 साल की ही आयु में किसन जी को अपने मामा के रक्त से हाथ लाल करने पड़े। यहां भी नाक ने ही युद्ध करवा दिया । इस बात से ये बात भी साबित होती है कि नाक के सवाल के जवाब ढूंढो तो युद्ध हो जाता है। दो देश आपस में भिड़ जाते हैं। जैसा कि मैं पहले ही इंगित कर चुका हूं, कि नाक चाहे किसी की भी हो उसके अहंकार का प्रतीक होती है। अगर किसी भिखारी से भी ऊंचे स्वर में बात की जाए तो, और भिखारी थोडा़ भी स्वाभिमानी हुआ, तो नाक के सवाल की खातिर वो आपकी इज्जत का भी फालूदा कर सकता है।
गणेश जी और शंकर जी की कहानी भी शायद आपको याद ही होगी, एक बार गणेश जी की अम्मा यानी पार्वती जी स्नान ध्यान में तल्लीन थी, लिहाज़ा द्वार पर ताका-झांकी से बचाव हेतु गणेश जी को पहरेदार के रुप में खड़ा किया गया था, इतने में कैलाश पर्वत पर भड़ैती फाने भगवान शंकर वहां आ पधारे, वो पार्वती से मिलना चाहते थे, लेकिन गणेश अवरोध उत्पन्न कर रहे थे, दोनों में काफी हील-हुज्जत हुई, लेकिन कोई टस से मस न हो। क्योंकि यहां भी दोनों की नाक का सवाल था, इसलिए दोनों में काफी तूतू-मैंमैं हुई, फैसला कुछ हो पाता इससे पहले ही गुस्सैल कैलाशी ने गणेश जी का सिर धड़ से अलग कर दिया। ऐसे मौके पर पार्वती का हाल भी वैसा ही हुआ जैसा भारतीय पुलिस का, जो हमेशा देर से पहुंचती है, यहां पार्वती जब तक पहुंचीं तब तक गणेश जी खूना खच्चर हो चुके थे, अब पार्वती को शंकर जी पर गुस्सा आया, अब उनमें तूतू-मैमैं शुरु हो गई, निर्णय ये निकल कर आया कि अब गणेश जी के सिर की व्यवस्था की जाए। इसी व्यवस्था के साथ एक बार फिर शंकर जी के लिए नाक का सवाल सामने निकल कर आया, खैर जैसे तैसे शंकर जी की असीम अनुकंपा से एक हाथी के सिर की जुगाड़ कर ली गई, जिसे गणेश जी के धड़ में फिक्स कर दिया गया, जो आज भी हम कैलेंडरों में देख सकते हैं, कैलेंडर देख कर याद रखिएगा कि ये सिर किसी की नाक का सवाल था।
धर्मयुग पर चलते-चलते थोड़ा अधर्मी युग की ओर भी चलिए, जहां खाने को रोटी नहीं लेकिन फिर भी नाक का सवाल हर किसी की नाक पर रखा रहता है। चने वाले ने चने में प्याज थोड़ी कम डाली तो ये बात ठाकुर वीर सिंह ने अपनी आन पर लेते हुए, उसके ही चाकू से उसकी नाक काट डाली, और उसे शूर्पनखा का मर्दाना रुप दे डाला। भला हो लुच्चे रस्तोगी का, जिसको ये बात नागवार गुजरी कि किसी ने उसके पीछे से उसे चिढ़ाने के लिए सीटी बजा दी, ये बात लुच्चे रस्तोगी के लिए नाक का सवाल बन गई, और उससे सीटी बजाने वाले को गरियाना शुरु कर दिया, ये बात और है कि बाद में पिटाई उसी की हुई। और नाक का सवाल करते करते सरे आम उसकी नाक बगैर खूना खच्चर हुए कट गई। हमारे मोहल्ले में लल्लन बाबू की नाक के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि मोहल्ले में बंदर दिख न जाएं। क्योंकि जहां बंदर दिखेंगे वहां लल्लन बाबू भी दिख जाएंगे। लल्लन और बंदरों के बीच की ये दुश्मनी चोर सिपाही की दुश्मनी जैसी है। और इस दुश्मनी के बीच जो सबसे बड़ी बात जुड़ी है वो भी नाक से ही ताल्लुक रखती है। लल्लन चाहते हैं कि बंदर मोहल्ले से निकल जाएं और बंदर चाहते हैं कि लल्लन इस मोहल्ले से निकल जाएं। रोज़ इस बात की जंग होती है, लेकिन सच यही है कि पिछले तीस सालों का इतिहास आज भी बदला नहीं है, न लल्लन ने ही बंदरों के भय से मोहल्ला छोड़ा और न ही बंदरों ने लल्लन के भय से। उनकी नाक का सवाल आज भी सवाल ही है?
उत्तरप्रदेश की सत्ता में बहन जी का भी हाल नाक की खातिर कुछ ऐसा हो चुका है, चूंकि यूपी की सत्ता मायावती के लिए नाक का सवाल थी, इसलिए ब्राह्मण ठाकुरों को भी अपने दल में जोड़ने लगीं, जिन्हें पहले वो गरियाया करती थीं, अब उन्हीं को गले लगाती हैं, ये जरुर है कि पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता सुख भोगने के बाद पुन: उनके दल से ब्राह्मण ठाकुरों को लतियाया जाने लगा है। खैर बहिन जी की नाक तो बच ही गई, अब चाहे दूसरों की कटे या बची रहे। सोनिया गांधी के लिए भी हिंदी सीखना नाक के सवाल जैसा था, क्योंकि विपक्ष उनकी हिंदी की खिल्ली उड़ाया करता था, और इस इतालवी महिला को बार बार शर्मिंदा होना पड़ता था, औरत के लिए हया ही सब कुछ है, हया और नाक के सवाल की खातिर सोनिया को हिंदी सीखनी ही पड़ी। और आज हिंदी में ही भाषण देने की बदौलत वो काफी हद तक लोगों को जवाब देने में सफल रही हैं।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी नाक ने सफलता के झंडे गाड़े हैं, इस मामले में भारत की नाक वाकई कुतुबमीनार साबित हुई है, इंदिरा नुई, लक्ष्मी मित्तल, बॉबी जिंदल आदि आदि, इन सभी ने विदेशों में सफलता की वो इबारत लिखी कि विदेशियों के लिए ये लोग नाक का सवाल बन गए। तो भइया नाक सवालों की जननी है, या यूं कहें कि सूंघने छींकने के अलावा नाक के पास सवाल पैदा करने का भी एक बड़ा काम है। नाक ने जब-जब जहां-जहां सवाल किए वहां-वहां इतिहास लगभग बदल ही गया। बशर्ते कि सवाल बेक़ायदा न हों। इतिश्री फिलहाल नाक के सवालों को थोड़ा विश्राम दिया जाए। नाक बचा कर रखिएगा।
बुधवार, 1 सितंबर 2010
अहिर चाहे पिंगल पढै़........
कई दिन बिस्तर पर बिताने के बाद खुराफाती कलम आखिर बंदिशों से मुक्त हुई, और चंचल मन कुछ खुराफात करने को बेताब हो उठा। विचार आया कि कुछ लिख दिया जाए। क्या लिखूं ये बड़ा सवाल था? पिछले कई दिनों से एक चाटुकार बॉस की तानाशाही से आजिज़ था, इसलिए बॉस पर व्यंग ही सबसे उम्दा विषय सुझाई दिया। तो चलिए बगैर सुस्ती दिखाई आपको मस्ती में डुबो देता हूं।
शक्ल पर बजे 12 और शरीर पर बजे 24, टी.वी. की दुनिया में टी.बी.(ट्यूबर कुलोसिस) के मरीज की शक्ल को मात देता कुछ ऐसा ही चेहरा है हमारे दफ्तर में मौजूद एक बॉस का। कुंठा के मैले नाले से सराबोर उस बॉस की बदौलत दफ्तरी माहौल में एक नकारात्मक प्रभाव घुला सा नज़र आता है। जीर्ण शीर्ण अवस्था में चैनल के अंदर उसकी मौजूदगी हिरोशिमा नागासाकी के पीड़ितों की याद दिलाती है। तो वहीं महीनों से न धुले कपड़ों का चीकट आवरण दक्षिणी ध्रुव पर बने उन इगलू आवासित (बर्फ से बने मकान) लोगों की याद दिलाता है जिन्हें सालों स्नान ध्यान की आवश्यकता नहीं होती। अगर बॉस दफ्तर में कभी जुराब उतारकर बैठ जाए तो समझिए भोपाल गैस त्रासदी की तरह एक और हादसा दफ्तर में भी हो जाए। जुराबों की सड़ांध इस कदर समाचार कक्ष में घुल जाती है कि लोगों को कक्ष से बाहर भागना पड़ता है। अपने ऐसे ही कैरिकुलम की बदौलत बॉस दफ्तर में चर्चिल की तरह चर्चित रहता है। समीकरण अब कुछ यूं बनता है कि बॉस देश की जनसंख्या में नहीं बल्कि देश की समस्या में आता है।
उसके चेहरे पर भावों का अभाव साफ बताता है कि बाढ़ के बाद का तनाव प्रभावित शहरों में ही नहीं बल्कि उसके हमेशा फूले रहने वाले चेहरे पर भी मौजूद रहता है। जिसे देखकर कोई भी मौसम विज्ञानी बड़ी आसानी से भविष्य में होने वाले घटनाक्रम का अंदाज़ा लगा सकता है। विशेषताओं को दबाती उसकी खामियां ही उसकी खूबी हैं, जिनकी बदौलत उसने रिशेप्सन से होकर बड़ी मैडम के केबिन तक गुजरने वाले रास्ते को शीश झुकाऊ प्रणाली के माध्यम से पार कर लिया है। और यही उसकी विशेषता है। जहां कोई नहीं जा पाता वहां वो आधार से 45 डिग्री के कोण पर अपने सर को झुकाकर पहुंच जाता है। उसकी साधारण लंबाई इस प्रकार के झुकाव में उसकी खासी मदद करती है। अपनी इसी विशेषता की बदौलत लुगदी साहित्य के माहिर उस बॉस का संकुचित सीना गर्व से चौड़ा रहता है।
दो बजे की पाली में चार बजे दफ्तर की सीमा में उसका प्रवेश साफ इंगित करता है कि वो मैडम से सीधे टच में है। ऐसा जान पड़ता है कि मैडम को उसकी काफी आदतें पसंद हैं, जैसे-शीश झुकाऊ प्रणाली, जी मैडम-जी मैडम, हाथ जोड़ू तकनीक, गुदा के ठीक विपरीत दिशा में बंधे हुए हाथों की तकनीक, और दिवालिया दारुण चेहरा तकनीक आदि-आदि। मैडम की मुखबिरी करने वाले इस बॉस रुपी यस मैन ने दफ्तर के हर कोने में जाल बिछा रखा है। इस जाल के फंदे में जैसे ही कोई छोटी-मोटी कर्मचारी रुपी मकड़ी फंसती है, वैसे ही बॉस एक एसएमएस के द्वारा मैडम तक खुराक की खबर पहुंचा देता है, और त्वरित गति से मैडम रुपी बड़ी मकड़ी उस अदने को अपना शिकार बना लेती लेती है, ये एक ऐसी आहार श्रृंखला है जिसका शिकार कई लोग हो चुके हैं।
संगठन में उसकी इस प्रकार की गाथाएं लिखने का तीन साल से ज्यादा का इतिहास हो चुका है। जो अब तक बरकरार है। बॉस के मन में कब क्या चल रहा है किसी को पता नहीं, ठीक वैसे ही जैसे किसी गुप्त रोगी के शरीर की बीमारी का पता किसी को नहीं चल पाता, हक़ीम ही जानता है कि गुप्त रोगी आखिर शरीर के किस आपत्तिजनक रास्ते का इलाज करवा रहा है। वो भी तब जब हक़ीम को पूरी बात तफ़्सील से बताई जाए। लेकिन ये बॉस निहायत ही सूम किस्म का इंसान है, इसको पता है कि बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी, इसलिए बिना हाजमोला के ही बातों को निगल जाता है। बातें शेयर करने का डेयर उसके भीतर कतई नहीं। बस कुर्सी पर बैठकर हाथ में मोबाइल लेकर एक प्रकार की खुड़पैंच करता रहता है। सभी को पता रहता है कि ये खुड़पैंच सीधे डिजिटल संदेशों के माध्यम से बड़ी मैडम तक प्रेषित की जा रही है। ये एक ऐसा प्रेषण (consignment) है जिसके कमीशन के रुप में बॉस को मैडम के बाप से मिलता होगा 10,000 प्रतिमाह मैसेज का फ्री बाउचर। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि मैडम के अब्बा हुजूर से मिला ये कमीशन रुपी बाउचर बॉस की महिला मित्र को लेटनाइट तंग करने और मैडम का सूचना तंत्र मजबूत बनाने के काम आता होगा। यक़ीनन ऐसा था भी, क्योंकि डिजिटल संदेशों की सुपरफास्ट आवृत्ति देखकर कोई भी अंदाज़ा लगा सकता है कि सूचनाओं की आवाजाही कहां तक हो रही है। मजे की बात तो ये है कि कई बार मैडम की ओर से आए संदेश लोगों के लिए भय का प्रतीक बन जाते हैं,जिन्हें दिखाकर बॉस छोटे मोटे कर्मचारियों की जान हलक में डाल देता है। महज़ तीन अर्दलियों के गुट का नेतृत्व करने वाला बॉस अपने आप को ऐसा समझता है जैसे नेपोलियन की तरह वो तीस हज़ार सैनिकों का नेतृत्व कर रहा हो। लेकिन सच यही है कि वो बंदर के खौंखियाने मात्र से डर जाता है।
निहायत ही कायराना प्रवृत्ति के इस बॉस के पास एक मोटरसाइकिल भी है, जो निश्चय ही देखने से युगांडा के ई-कचरे की समस्या जैसी लगती है, हॉर्न छोड़कर बाइक का हर पार्ट बड़े ही करीने बजता है, किश्त भुगतान पद्धति के बाद से बाइक ने शायद ही कभी सर्विस सेंटर का मुंह देखा हो? इस बॉस की एक और आदत है दूसरों के कार्य का क्रेडिट खुद ले उड़ना। और पिछले तीन सालों से ये इस कार्य को बखूबी अंजाम दे रहा है, झूठे रसूख के ठर्रे की मदहोशी इसके पाखंडी होने का अहसास हमेशा कराती रहती है।
सुकरात की तरह दिखने वाला ये बॉस ज़हर पीता नहीं बल्कि लोगों के लिए ज़हर की व्यवस्था करता है। दुनिया पर राज करने की जो समस्या अंग्रेजों के साथ रही वही समस्या इसके साथ भी है, लोगों में फूट डालकर ये बॉस अपने आप को डलहौजी समझता है। और खुद को एक निरंकुश प्रवृत्ति के चैनल का राजा समझता है, हालांकि ये एक ऐसा राजा है जिसे गद्दी कभी हासिल ही नहीं हुई। लेकिन फिर भी रहमो करम पर जीने की आदत ने इसकी आउटपुट हेड बनने की जिजीविषा को आज भी जीवित रखा है।
अपने आप को चैनल का एक प्रतिष्ठित और बेहद व्यस्त कर्मी सिद्ध करने के लिए ये अपने मित्रों तक को चैनल के बाहर दो-दो घंटे इंतज़ार करवा देता है। इस दौरान एक दूत को दोस्तों के पास भेजकर ये बात कहलवा देता है कि बॉस अभी मैडम के साथ मीटिंग में हैं, जबकि उसके दोस्त भी ये बात जानते थे कि ससुरा बेवकूफ बना रहा है, क्योंकि जब भी बॉस के दोस्त आते, तो बॉस की तरफ से एक ही संदेश भिजवाया जाता कि थोडा़ इंतज़ार करो, बॉस अभी मैडम के साथ मीटिंग में हैं।
आधार से 45 डिग्री तक झुकाव की नीति को अपनाने वाले इस बॉस के एक डायलॉग से लोग काफी खौफ खाते हैं, और वो डायलॉग है नौकरी खा जाऊंगा, उसके इस डायलॉग से लगता है कि जिस प्रकार से सूरदास बचपन से आंखों के लिए तरसते रहे, वैसे ही बॉस बचपन से लोगों की नौकरी खाने के लिए तरस रहा है। इस बात का खौफ लोगों में इसलिए भी था कि पूर्व में उसकी षडयंत्रकारी नीतियों की बदौलत दो चार लोग नौकरी से हाथ धो बैठे थे, और यही बॉस की पिछले तीन सालों में सबसे बड़ी उपलब्धि थी। इन्हीं कारणों की बदौलत परेशान कर्मचारियों ने एक लंबे शोध के बाद उसके कई निक नेम रख दिए, जैसे- मोसाद(एक खूफिया जांच एजेंसी), खड़कसिंह, फ्राइड राइस, बुरी आत्मा, मैसेज मैन आदि आदि। ये सभी नाम उसके व्यक्तित्व के निखार को आधार मानकर रखे गए है। अब लोग अपनी भड़ास उसी के सामने उसके निकनेम के माध्यम से निकाल लेते हैं, और बॉस ये समझता है कि लोग किसी और का तियापांचा कर रहे हैं।
तो मित्रों बॉस पर व्यंग का ये एक सत्य घटनाओं पर आधारित किस्सा था, बचिएगा ऐसे अकर्मण्य बॉस से, क्योंकि इनका काम आप जानते ही हैं, ये चाटुकारिता और तानाशाही की दुनिया में तो झंडा बुलंद कर सकते हैं, लेकिन ईमानदारी की दुनिया में इनके लिए कोई जगह नहीं। वैसे भी तानाशाही ज्यादा दिन की नहीं होती, हिटलर भी मारा गया, और सद्दाम भी। अब तेरा क्या होगा बॉस ? क्योंकि सच ही कहा गया है “अहिर चाहे पिंगल पढ़ै, तबहुं तीन गुण हीन, खइबो, बुलिबो, बैठिबो लयो विधाता छीन”.....
शक्ल पर बजे 12 और शरीर पर बजे 24, टी.वी. की दुनिया में टी.बी.(ट्यूबर कुलोसिस) के मरीज की शक्ल को मात देता कुछ ऐसा ही चेहरा है हमारे दफ्तर में मौजूद एक बॉस का। कुंठा के मैले नाले से सराबोर उस बॉस की बदौलत दफ्तरी माहौल में एक नकारात्मक प्रभाव घुला सा नज़र आता है। जीर्ण शीर्ण अवस्था में चैनल के अंदर उसकी मौजूदगी हिरोशिमा नागासाकी के पीड़ितों की याद दिलाती है। तो वहीं महीनों से न धुले कपड़ों का चीकट आवरण दक्षिणी ध्रुव पर बने उन इगलू आवासित (बर्फ से बने मकान) लोगों की याद दिलाता है जिन्हें सालों स्नान ध्यान की आवश्यकता नहीं होती। अगर बॉस दफ्तर में कभी जुराब उतारकर बैठ जाए तो समझिए भोपाल गैस त्रासदी की तरह एक और हादसा दफ्तर में भी हो जाए। जुराबों की सड़ांध इस कदर समाचार कक्ष में घुल जाती है कि लोगों को कक्ष से बाहर भागना पड़ता है। अपने ऐसे ही कैरिकुलम की बदौलत बॉस दफ्तर में चर्चिल की तरह चर्चित रहता है। समीकरण अब कुछ यूं बनता है कि बॉस देश की जनसंख्या में नहीं बल्कि देश की समस्या में आता है।
उसके चेहरे पर भावों का अभाव साफ बताता है कि बाढ़ के बाद का तनाव प्रभावित शहरों में ही नहीं बल्कि उसके हमेशा फूले रहने वाले चेहरे पर भी मौजूद रहता है। जिसे देखकर कोई भी मौसम विज्ञानी बड़ी आसानी से भविष्य में होने वाले घटनाक्रम का अंदाज़ा लगा सकता है। विशेषताओं को दबाती उसकी खामियां ही उसकी खूबी हैं, जिनकी बदौलत उसने रिशेप्सन से होकर बड़ी मैडम के केबिन तक गुजरने वाले रास्ते को शीश झुकाऊ प्रणाली के माध्यम से पार कर लिया है। और यही उसकी विशेषता है। जहां कोई नहीं जा पाता वहां वो आधार से 45 डिग्री के कोण पर अपने सर को झुकाकर पहुंच जाता है। उसकी साधारण लंबाई इस प्रकार के झुकाव में उसकी खासी मदद करती है। अपनी इसी विशेषता की बदौलत लुगदी साहित्य के माहिर उस बॉस का संकुचित सीना गर्व से चौड़ा रहता है।
दो बजे की पाली में चार बजे दफ्तर की सीमा में उसका प्रवेश साफ इंगित करता है कि वो मैडम से सीधे टच में है। ऐसा जान पड़ता है कि मैडम को उसकी काफी आदतें पसंद हैं, जैसे-शीश झुकाऊ प्रणाली, जी मैडम-जी मैडम, हाथ जोड़ू तकनीक, गुदा के ठीक विपरीत दिशा में बंधे हुए हाथों की तकनीक, और दिवालिया दारुण चेहरा तकनीक आदि-आदि। मैडम की मुखबिरी करने वाले इस बॉस रुपी यस मैन ने दफ्तर के हर कोने में जाल बिछा रखा है। इस जाल के फंदे में जैसे ही कोई छोटी-मोटी कर्मचारी रुपी मकड़ी फंसती है, वैसे ही बॉस एक एसएमएस के द्वारा मैडम तक खुराक की खबर पहुंचा देता है, और त्वरित गति से मैडम रुपी बड़ी मकड़ी उस अदने को अपना शिकार बना लेती लेती है, ये एक ऐसी आहार श्रृंखला है जिसका शिकार कई लोग हो चुके हैं।
संगठन में उसकी इस प्रकार की गाथाएं लिखने का तीन साल से ज्यादा का इतिहास हो चुका है। जो अब तक बरकरार है। बॉस के मन में कब क्या चल रहा है किसी को पता नहीं, ठीक वैसे ही जैसे किसी गुप्त रोगी के शरीर की बीमारी का पता किसी को नहीं चल पाता, हक़ीम ही जानता है कि गुप्त रोगी आखिर शरीर के किस आपत्तिजनक रास्ते का इलाज करवा रहा है। वो भी तब जब हक़ीम को पूरी बात तफ़्सील से बताई जाए। लेकिन ये बॉस निहायत ही सूम किस्म का इंसान है, इसको पता है कि बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी, इसलिए बिना हाजमोला के ही बातों को निगल जाता है। बातें शेयर करने का डेयर उसके भीतर कतई नहीं। बस कुर्सी पर बैठकर हाथ में मोबाइल लेकर एक प्रकार की खुड़पैंच करता रहता है। सभी को पता रहता है कि ये खुड़पैंच सीधे डिजिटल संदेशों के माध्यम से बड़ी मैडम तक प्रेषित की जा रही है। ये एक ऐसा प्रेषण (consignment) है जिसके कमीशन के रुप में बॉस को मैडम के बाप से मिलता होगा 10,000 प्रतिमाह मैसेज का फ्री बाउचर। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि मैडम के अब्बा हुजूर से मिला ये कमीशन रुपी बाउचर बॉस की महिला मित्र को लेटनाइट तंग करने और मैडम का सूचना तंत्र मजबूत बनाने के काम आता होगा। यक़ीनन ऐसा था भी, क्योंकि डिजिटल संदेशों की सुपरफास्ट आवृत्ति देखकर कोई भी अंदाज़ा लगा सकता है कि सूचनाओं की आवाजाही कहां तक हो रही है। मजे की बात तो ये है कि कई बार मैडम की ओर से आए संदेश लोगों के लिए भय का प्रतीक बन जाते हैं,जिन्हें दिखाकर बॉस छोटे मोटे कर्मचारियों की जान हलक में डाल देता है। महज़ तीन अर्दलियों के गुट का नेतृत्व करने वाला बॉस अपने आप को ऐसा समझता है जैसे नेपोलियन की तरह वो तीस हज़ार सैनिकों का नेतृत्व कर रहा हो। लेकिन सच यही है कि वो बंदर के खौंखियाने मात्र से डर जाता है।
निहायत ही कायराना प्रवृत्ति के इस बॉस के पास एक मोटरसाइकिल भी है, जो निश्चय ही देखने से युगांडा के ई-कचरे की समस्या जैसी लगती है, हॉर्न छोड़कर बाइक का हर पार्ट बड़े ही करीने बजता है, किश्त भुगतान पद्धति के बाद से बाइक ने शायद ही कभी सर्विस सेंटर का मुंह देखा हो? इस बॉस की एक और आदत है दूसरों के कार्य का क्रेडिट खुद ले उड़ना। और पिछले तीन सालों से ये इस कार्य को बखूबी अंजाम दे रहा है, झूठे रसूख के ठर्रे की मदहोशी इसके पाखंडी होने का अहसास हमेशा कराती रहती है।
सुकरात की तरह दिखने वाला ये बॉस ज़हर पीता नहीं बल्कि लोगों के लिए ज़हर की व्यवस्था करता है। दुनिया पर राज करने की जो समस्या अंग्रेजों के साथ रही वही समस्या इसके साथ भी है, लोगों में फूट डालकर ये बॉस अपने आप को डलहौजी समझता है। और खुद को एक निरंकुश प्रवृत्ति के चैनल का राजा समझता है, हालांकि ये एक ऐसा राजा है जिसे गद्दी कभी हासिल ही नहीं हुई। लेकिन फिर भी रहमो करम पर जीने की आदत ने इसकी आउटपुट हेड बनने की जिजीविषा को आज भी जीवित रखा है।
अपने आप को चैनल का एक प्रतिष्ठित और बेहद व्यस्त कर्मी सिद्ध करने के लिए ये अपने मित्रों तक को चैनल के बाहर दो-दो घंटे इंतज़ार करवा देता है। इस दौरान एक दूत को दोस्तों के पास भेजकर ये बात कहलवा देता है कि बॉस अभी मैडम के साथ मीटिंग में हैं, जबकि उसके दोस्त भी ये बात जानते थे कि ससुरा बेवकूफ बना रहा है, क्योंकि जब भी बॉस के दोस्त आते, तो बॉस की तरफ से एक ही संदेश भिजवाया जाता कि थोडा़ इंतज़ार करो, बॉस अभी मैडम के साथ मीटिंग में हैं।
आधार से 45 डिग्री तक झुकाव की नीति को अपनाने वाले इस बॉस के एक डायलॉग से लोग काफी खौफ खाते हैं, और वो डायलॉग है नौकरी खा जाऊंगा, उसके इस डायलॉग से लगता है कि जिस प्रकार से सूरदास बचपन से आंखों के लिए तरसते रहे, वैसे ही बॉस बचपन से लोगों की नौकरी खाने के लिए तरस रहा है। इस बात का खौफ लोगों में इसलिए भी था कि पूर्व में उसकी षडयंत्रकारी नीतियों की बदौलत दो चार लोग नौकरी से हाथ धो बैठे थे, और यही बॉस की पिछले तीन सालों में सबसे बड़ी उपलब्धि थी। इन्हीं कारणों की बदौलत परेशान कर्मचारियों ने एक लंबे शोध के बाद उसके कई निक नेम रख दिए, जैसे- मोसाद(एक खूफिया जांच एजेंसी), खड़कसिंह, फ्राइड राइस, बुरी आत्मा, मैसेज मैन आदि आदि। ये सभी नाम उसके व्यक्तित्व के निखार को आधार मानकर रखे गए है। अब लोग अपनी भड़ास उसी के सामने उसके निकनेम के माध्यम से निकाल लेते हैं, और बॉस ये समझता है कि लोग किसी और का तियापांचा कर रहे हैं।
तो मित्रों बॉस पर व्यंग का ये एक सत्य घटनाओं पर आधारित किस्सा था, बचिएगा ऐसे अकर्मण्य बॉस से, क्योंकि इनका काम आप जानते ही हैं, ये चाटुकारिता और तानाशाही की दुनिया में तो झंडा बुलंद कर सकते हैं, लेकिन ईमानदारी की दुनिया में इनके लिए कोई जगह नहीं। वैसे भी तानाशाही ज्यादा दिन की नहीं होती, हिटलर भी मारा गया, और सद्दाम भी। अब तेरा क्या होगा बॉस ? क्योंकि सच ही कहा गया है “अहिर चाहे पिंगल पढ़ै, तबहुं तीन गुण हीन, खइबो, बुलिबो, बैठिबो लयो विधाता छीन”.....
गुरुवार, 29 जुलाई 2010
राजनैतिक रतौंधी
इन दिनों सियासी चिल्ल-पों चरम पर है, उत्तर प्रदेश में बहन जी को चिंता सता रही है कि कहीं उनकी पार्टी का हाथी 2012 तक पगला न जाए। अगर ऐसा हुआ तो बौराया हाथी सबसे पहले अपने करीबियों को ही कुचलता है। जो माया पूर्ण बहुमत से सत्तासीन हैं, उनका सीन इस बार बिगड़ सकता है। हालात खुद के पैदा किए हुए हैं। खुद मायावती के खेमे में मौजूद एक सीनियर विभीषण से मेरी चंद रोज़ पहले वार्ता हुई। “तात लात रावण मोहि मारा” रावण की लात से बड़ा आहत मालूम दे रहा था वो। मैं उसके लिए शायद उस वक्त राम से कम न था, क्योंकि उसका दुखड़ा सुन रहा था।
रावण के उस अनुज भ्राता के अनुसार टीका टिप्पणी करने वाले राजनीति के कथित बुद्धिजीवी इन दिनों यूपी वाली बहिन जी को संयुक्त रुप से घेरने की फिराक में हैं। साम, दाम, दंड, भेद, हर किस्म का इस्तेमाल दौलतमंद माया के खिलाफ उनके विरोधी कर सकते हैं। दल अलग-अलग हैं लेकिन मकसद एक है, कहीं बहन जी एक बार फिर सत्तासीन न हो जाए ! उसकी मोसादिक(एक खूफिया एजेंसी) प्रवृत्ति की रिपोर्ट के आधार पर ये कहना उचित होगा कि, लोग बहिन जी को 2012 तक डाइटिंग जरुर करा देंगे। अपने घड़े समान उदर में करोड़ों समेट चुकी बहन जी चालाक हैं, शातिर हैं, और सबसे बडी़ बात, कथित तौर पर दलित मसीहा भी हैं, लिहाज़ा उनके खिलाफ शह और मात का खेल इतना आसान नहीं। तभी लोग माथापच्ची को मजबूर हैं। बहन जी की सत्ता समेटने के लिए लोग इस कदर प्रयासरत हैं कि बस पूछिए मत, अगर ऐसे प्रयास गुलाम भारत के लिए किए गए होते, तो शायद अंग्रेजी पिछवाड़े पर पेट्रोल पहले ही लग गया होता, और गुलामी का इतिहास 200 सालों का नहीं होता।
ये सत्ता का सुख राजनैतिक रतौंधी (एक बीमारी जिसमें रात में दिखाई नहीं देता) है, यहां दिन में आदमी सबका होता है, और रात में किसी का नहीं। राजनीति का ये अंधापन बहनजी को भी खा गया है, भले ही माया पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता और शासन का सुख भोग रही हैं, लेकिन दिन के वादे रात की भूल साबित हो रहे हैं। वो वादा तो कर लेती हैं, लेकिन किसी ग़लती की तरह भूल जाती हैं। उत्तर प्रदेश आपराधिक मामलों का जानकार बन गया है, और माया कहती हैं, ये दोष है और किसी का। अगर दोष किसी और का होता, तो कलह का शिकार उक्त विभीषण को न होना पड़ता । उसकी नौकरी नहीं जाती, वो बेरोजगार नहीं होता, ठलुअई नहीं करता, और सबसे बड़ी किसी राम की शरण में नहीं जाता।
अब जब कि वो कलयुगीन राम के द्वारे आया है, तो कुछ न कुछ तो फायदा उसे मिलना ही चाहिए। लेकिन इस बार बेचारे राम भी कुछ नहीं कर सकते । वो खुद फाके में जी रहे हैं, विभीषण के लिए दो जून की व्यवस्था क्या ख़ाक करेंगे। लेकिन बहन जी के लिए किसी के फाके मायने नहीं रखते, खा-खाकर उनका घाट इतना चौड़ा गया है कि अब पुश्तें मौज काटेंगी ही। यकीन करिए, जिन योजनाओं का विस्तार कागज़ में हुआ, उनमें से कई कागज़ों को तो दोबारा हाथ तक नहीं लगाया गया। जिन योजनाओं को अमल में लाया भी गया, तो उनमें घोटाले चीख़-चीख़ कर कह रहे थे, कि मैं माया हूं, मैं माया हूं। भला कौन समझाए राजनीतिक रतौंधी की शिकार बहन जी को। वक्त सब कुछ समझा देता है, और वैसे भी माया के लिए उनके विरोधियों ने इस बार एक ऐसा मंच बना दिया है। जिस पर चढ़ते ही, धड़ाम की आवाज़ आएगी। आगे आप खुद समझदार हैं।
रावण के उस अनुज भ्राता के अनुसार टीका टिप्पणी करने वाले राजनीति के कथित बुद्धिजीवी इन दिनों यूपी वाली बहिन जी को संयुक्त रुप से घेरने की फिराक में हैं। साम, दाम, दंड, भेद, हर किस्म का इस्तेमाल दौलतमंद माया के खिलाफ उनके विरोधी कर सकते हैं। दल अलग-अलग हैं लेकिन मकसद एक है, कहीं बहन जी एक बार फिर सत्तासीन न हो जाए ! उसकी मोसादिक(एक खूफिया एजेंसी) प्रवृत्ति की रिपोर्ट के आधार पर ये कहना उचित होगा कि, लोग बहिन जी को 2012 तक डाइटिंग जरुर करा देंगे। अपने घड़े समान उदर में करोड़ों समेट चुकी बहन जी चालाक हैं, शातिर हैं, और सबसे बडी़ बात, कथित तौर पर दलित मसीहा भी हैं, लिहाज़ा उनके खिलाफ शह और मात का खेल इतना आसान नहीं। तभी लोग माथापच्ची को मजबूर हैं। बहन जी की सत्ता समेटने के लिए लोग इस कदर प्रयासरत हैं कि बस पूछिए मत, अगर ऐसे प्रयास गुलाम भारत के लिए किए गए होते, तो शायद अंग्रेजी पिछवाड़े पर पेट्रोल पहले ही लग गया होता, और गुलामी का इतिहास 200 सालों का नहीं होता।
ये सत्ता का सुख राजनैतिक रतौंधी (एक बीमारी जिसमें रात में दिखाई नहीं देता) है, यहां दिन में आदमी सबका होता है, और रात में किसी का नहीं। राजनीति का ये अंधापन बहनजी को भी खा गया है, भले ही माया पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता और शासन का सुख भोग रही हैं, लेकिन दिन के वादे रात की भूल साबित हो रहे हैं। वो वादा तो कर लेती हैं, लेकिन किसी ग़लती की तरह भूल जाती हैं। उत्तर प्रदेश आपराधिक मामलों का जानकार बन गया है, और माया कहती हैं, ये दोष है और किसी का। अगर दोष किसी और का होता, तो कलह का शिकार उक्त विभीषण को न होना पड़ता । उसकी नौकरी नहीं जाती, वो बेरोजगार नहीं होता, ठलुअई नहीं करता, और सबसे बड़ी किसी राम की शरण में नहीं जाता।
अब जब कि वो कलयुगीन राम के द्वारे आया है, तो कुछ न कुछ तो फायदा उसे मिलना ही चाहिए। लेकिन इस बार बेचारे राम भी कुछ नहीं कर सकते । वो खुद फाके में जी रहे हैं, विभीषण के लिए दो जून की व्यवस्था क्या ख़ाक करेंगे। लेकिन बहन जी के लिए किसी के फाके मायने नहीं रखते, खा-खाकर उनका घाट इतना चौड़ा गया है कि अब पुश्तें मौज काटेंगी ही। यकीन करिए, जिन योजनाओं का विस्तार कागज़ में हुआ, उनमें से कई कागज़ों को तो दोबारा हाथ तक नहीं लगाया गया। जिन योजनाओं को अमल में लाया भी गया, तो उनमें घोटाले चीख़-चीख़ कर कह रहे थे, कि मैं माया हूं, मैं माया हूं। भला कौन समझाए राजनीतिक रतौंधी की शिकार बहन जी को। वक्त सब कुछ समझा देता है, और वैसे भी माया के लिए उनके विरोधियों ने इस बार एक ऐसा मंच बना दिया है। जिस पर चढ़ते ही, धड़ाम की आवाज़ आएगी। आगे आप खुद समझदार हैं।
शुक्रवार, 16 जुलाई 2010
बदलते मौसम की भयानक तस्वीर
पसीने से सराबोर शरीर की दुर्गंध ने डियो कंपनियों के सारे दावों को तहस नहस कर दिया है। तप रही गर्मी की भट्टी में शरीर ऐसा लग रहा है मानो भुने हुए आलू की तरह सूरज हमें चटनी डालकर चाट जाने वाला है। वाह रे भगवान भास्कर की चटाई, पृथ्वी पर पैदा हुई इस सर्वश्रेष्ठ कलाकृति को ही लीलने पर उतारु है। शरीर पर जमी कालिख की परत और झुलस कर पड़ीं झुर्रियों ने अभी से साल के अस्सीवें पड़ाव पर लाकर खड़ा कर दिया है।
बद मिज़ाज मौसम को तो देखिए, चीख-चीख कर कहता है मैं ग्लोबल वॉर्मिंग का शिकार हूं। मुझे बख्श दो। न हम उसे बख्श रहे हैं, और न वो हमें। जुलाई का महीना है और बारिश के नाम पर दिल्ली-एनसीआर में दो चार छीटे, अल्लाह ने मेघ जहां दिए वहां कयामत आ गई। पंजाब, हरियाणा, में अब तक पानी की कमी थी, लेकिन अब इतना पानी है, लोगों के रहने के लिए जगह कम पड़ गई। नियति का खेल, प्रकृति का तमाशा यही कहता है कि उससे छेड़ छाड़ न करो। वरना वो हमारे साथ खेलेगी। और ये खेल ऐसा है जिसमें जीत की मंशा रखना ही बेमानी है। न ड्रॉ की स्थिति, न वॉकओवर की, बस हारना ही है। खुदा खैर बरकत करे उन लोगों को जिनके घर बाढ़ में तबाह हो गए, जिनके परिवार में से कोई पानी की बलि चढ़ गया। जल की लीला ही ऐसी है, ज्यादा हो तब भी मुसीबत कम हो तब भी मुसीबत।
कहानी से थोड़ा हटना चाहूंगा ले चलता हूं आपको अपने पैतृक गांव जहां इस बार हवा-पानी बदलने के लिए गया था, पूरे दस साल बाद गांव तस्वीर ही बदल गई थी, मेरा खुद का घर भी पक्का हो गया था। छप्पर की जगह लिंटर की छांव थी, मिट्टी की दीवार की जगह भट्टों की पकी लाल ईंटों ने ले ली थी। सड़क पक्की बनाई गई थी, लेकिन मिलावट के माल ने उसकी हकीकत को छिपाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी, जो घुचड़ू मदारी मेरे साथ कभी खेला करता था, उसके चार बच्चे हैं, वो सिर्फ खेती करता है, और कच्ची पीता है। उसकी दिनचर्या भी यही है। ये दिनचर्या बच्चों की नहीं बच्चों के बाप की है। गांव में अब वैसा मजा नहीं था, जैसा सोचकर मैं वहां गया था। हालांकि चंद खुशकिस्मत पेड़ों की छांव मुझे जरुर मिल गई, लेकिन फिर भी उन पेड़ों के बीच अब सूरज की रोशनी की तपिश ने अपने लिए हजारों दर्रे बना लिए थे, जहां से वो अपने कोप से मुझे अपना शिकार बना सकता था। वहां मौजूद कई पोखर तालाब अब सूखने की कगार पर थे क्योंकि मौसम बेईमान है, और उससे ज्यादा हम। तालाबों को पानी की जरुरत है, और हमें पूंजीवाद में अपने आपको आगे बढ़ते देखने की ललक। तालाब अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन हम गलत हैं, क्योंकि हमारे हित नुकसान प्रकृति का ही करते हैं। और फिर प्रकृति या तो हमारे सामने भीषण गर्मी के रुप में, हाड़ कंपाने वाली ठंड के रुप में या फिर किसी सुनामी के रुप में सामने आती है, जिससे हम बच नहीं सकते ।
हमारी किस्मत चमकने के साथ प्रकृति की किस्मत फूट जाती है, और जब ऐसा होता है, तो तबाही का दृश्य बदलते मौसम की भयानक तस्वीर पेश करता है। ज़िंदगी की रहगुजर अब इतनी आसान नहीं रह गई, हमारी लड़ाई बदलते मौसम से है, जहां हम जीत नहीं सकते। इस नफरत को ख़त्म कर दें, वरना ये हमारे लिए नर्क के द्वार खोल देगी। हम प्रकृति को कुछ दे नहीं सकते तो उसकी रक्षा जरुर कर सकते हैं। वैसे भी भीषण गर्मी ने हमें हमारी औकात बता दी है। बामुलाहिजा होशियार तूफान तबाही लेकर ही आते हैं।
बद मिज़ाज मौसम को तो देखिए, चीख-चीख कर कहता है मैं ग्लोबल वॉर्मिंग का शिकार हूं। मुझे बख्श दो। न हम उसे बख्श रहे हैं, और न वो हमें। जुलाई का महीना है और बारिश के नाम पर दिल्ली-एनसीआर में दो चार छीटे, अल्लाह ने मेघ जहां दिए वहां कयामत आ गई। पंजाब, हरियाणा, में अब तक पानी की कमी थी, लेकिन अब इतना पानी है, लोगों के रहने के लिए जगह कम पड़ गई। नियति का खेल, प्रकृति का तमाशा यही कहता है कि उससे छेड़ छाड़ न करो। वरना वो हमारे साथ खेलेगी। और ये खेल ऐसा है जिसमें जीत की मंशा रखना ही बेमानी है। न ड्रॉ की स्थिति, न वॉकओवर की, बस हारना ही है। खुदा खैर बरकत करे उन लोगों को जिनके घर बाढ़ में तबाह हो गए, जिनके परिवार में से कोई पानी की बलि चढ़ गया। जल की लीला ही ऐसी है, ज्यादा हो तब भी मुसीबत कम हो तब भी मुसीबत।
कहानी से थोड़ा हटना चाहूंगा ले चलता हूं आपको अपने पैतृक गांव जहां इस बार हवा-पानी बदलने के लिए गया था, पूरे दस साल बाद गांव तस्वीर ही बदल गई थी, मेरा खुद का घर भी पक्का हो गया था। छप्पर की जगह लिंटर की छांव थी, मिट्टी की दीवार की जगह भट्टों की पकी लाल ईंटों ने ले ली थी। सड़क पक्की बनाई गई थी, लेकिन मिलावट के माल ने उसकी हकीकत को छिपाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी, जो घुचड़ू मदारी मेरे साथ कभी खेला करता था, उसके चार बच्चे हैं, वो सिर्फ खेती करता है, और कच्ची पीता है। उसकी दिनचर्या भी यही है। ये दिनचर्या बच्चों की नहीं बच्चों के बाप की है। गांव में अब वैसा मजा नहीं था, जैसा सोचकर मैं वहां गया था। हालांकि चंद खुशकिस्मत पेड़ों की छांव मुझे जरुर मिल गई, लेकिन फिर भी उन पेड़ों के बीच अब सूरज की रोशनी की तपिश ने अपने लिए हजारों दर्रे बना लिए थे, जहां से वो अपने कोप से मुझे अपना शिकार बना सकता था। वहां मौजूद कई पोखर तालाब अब सूखने की कगार पर थे क्योंकि मौसम बेईमान है, और उससे ज्यादा हम। तालाबों को पानी की जरुरत है, और हमें पूंजीवाद में अपने आपको आगे बढ़ते देखने की ललक। तालाब अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन हम गलत हैं, क्योंकि हमारे हित नुकसान प्रकृति का ही करते हैं। और फिर प्रकृति या तो हमारे सामने भीषण गर्मी के रुप में, हाड़ कंपाने वाली ठंड के रुप में या फिर किसी सुनामी के रुप में सामने आती है, जिससे हम बच नहीं सकते ।
हमारी किस्मत चमकने के साथ प्रकृति की किस्मत फूट जाती है, और जब ऐसा होता है, तो तबाही का दृश्य बदलते मौसम की भयानक तस्वीर पेश करता है। ज़िंदगी की रहगुजर अब इतनी आसान नहीं रह गई, हमारी लड़ाई बदलते मौसम से है, जहां हम जीत नहीं सकते। इस नफरत को ख़त्म कर दें, वरना ये हमारे लिए नर्क के द्वार खोल देगी। हम प्रकृति को कुछ दे नहीं सकते तो उसकी रक्षा जरुर कर सकते हैं। वैसे भी भीषण गर्मी ने हमें हमारी औकात बता दी है। बामुलाहिजा होशियार तूफान तबाही लेकर ही आते हैं।
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