इन दिनों सियासी चिल्ल-पों चरम पर है, उत्तर प्रदेश में बहन जी को चिंता सता रही है कि कहीं उनकी पार्टी का हाथी 2012 तक पगला न जाए। अगर ऐसा हुआ तो बौराया हाथी सबसे पहले अपने करीबियों को ही कुचलता है। जो माया पूर्ण बहुमत से सत्तासीन हैं, उनका सीन इस बार बिगड़ सकता है। हालात खुद के पैदा किए हुए हैं। खुद मायावती के खेमे में मौजूद एक सीनियर विभीषण से मेरी चंद रोज़ पहले वार्ता हुई। “तात लात रावण मोहि मारा” रावण की लात से बड़ा आहत मालूम दे रहा था वो। मैं उसके लिए शायद उस वक्त राम से कम न था, क्योंकि उसका दुखड़ा सुन रहा था।
रावण के उस अनुज भ्राता के अनुसार टीका टिप्पणी करने वाले राजनीति के कथित बुद्धिजीवी इन दिनों यूपी वाली बहिन जी को संयुक्त रुप से घेरने की फिराक में हैं। साम, दाम, दंड, भेद, हर किस्म का इस्तेमाल दौलतमंद माया के खिलाफ उनके विरोधी कर सकते हैं। दल अलग-अलग हैं लेकिन मकसद एक है, कहीं बहन जी एक बार फिर सत्तासीन न हो जाए ! उसकी मोसादिक(एक खूफिया एजेंसी) प्रवृत्ति की रिपोर्ट के आधार पर ये कहना उचित होगा कि, लोग बहिन जी को 2012 तक डाइटिंग जरुर करा देंगे। अपने घड़े समान उदर में करोड़ों समेट चुकी बहन जी चालाक हैं, शातिर हैं, और सबसे बडी़ बात, कथित तौर पर दलित मसीहा भी हैं, लिहाज़ा उनके खिलाफ शह और मात का खेल इतना आसान नहीं। तभी लोग माथापच्ची को मजबूर हैं। बहन जी की सत्ता समेटने के लिए लोग इस कदर प्रयासरत हैं कि बस पूछिए मत, अगर ऐसे प्रयास गुलाम भारत के लिए किए गए होते, तो शायद अंग्रेजी पिछवाड़े पर पेट्रोल पहले ही लग गया होता, और गुलामी का इतिहास 200 सालों का नहीं होता।
ये सत्ता का सुख राजनैतिक रतौंधी (एक बीमारी जिसमें रात में दिखाई नहीं देता) है, यहां दिन में आदमी सबका होता है, और रात में किसी का नहीं। राजनीति का ये अंधापन बहनजी को भी खा गया है, भले ही माया पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता और शासन का सुख भोग रही हैं, लेकिन दिन के वादे रात की भूल साबित हो रहे हैं। वो वादा तो कर लेती हैं, लेकिन किसी ग़लती की तरह भूल जाती हैं। उत्तर प्रदेश आपराधिक मामलों का जानकार बन गया है, और माया कहती हैं, ये दोष है और किसी का। अगर दोष किसी और का होता, तो कलह का शिकार उक्त विभीषण को न होना पड़ता । उसकी नौकरी नहीं जाती, वो बेरोजगार नहीं होता, ठलुअई नहीं करता, और सबसे बड़ी किसी राम की शरण में नहीं जाता।
अब जब कि वो कलयुगीन राम के द्वारे आया है, तो कुछ न कुछ तो फायदा उसे मिलना ही चाहिए। लेकिन इस बार बेचारे राम भी कुछ नहीं कर सकते । वो खुद फाके में जी रहे हैं, विभीषण के लिए दो जून की व्यवस्था क्या ख़ाक करेंगे। लेकिन बहन जी के लिए किसी के फाके मायने नहीं रखते, खा-खाकर उनका घाट इतना चौड़ा गया है कि अब पुश्तें मौज काटेंगी ही। यकीन करिए, जिन योजनाओं का विस्तार कागज़ में हुआ, उनमें से कई कागज़ों को तो दोबारा हाथ तक नहीं लगाया गया। जिन योजनाओं को अमल में लाया भी गया, तो उनमें घोटाले चीख़-चीख़ कर कह रहे थे, कि मैं माया हूं, मैं माया हूं। भला कौन समझाए राजनीतिक रतौंधी की शिकार बहन जी को। वक्त सब कुछ समझा देता है, और वैसे भी माया के लिए उनके विरोधियों ने इस बार एक ऐसा मंच बना दिया है। जिस पर चढ़ते ही, धड़ाम की आवाज़ आएगी। आगे आप खुद समझदार हैं।
गुरुवार, 29 जुलाई 2010
शुक्रवार, 16 जुलाई 2010
बदलते मौसम की भयानक तस्वीर
पसीने से सराबोर शरीर की दुर्गंध ने डियो कंपनियों के सारे दावों को तहस नहस कर दिया है। तप रही गर्मी की भट्टी में शरीर ऐसा लग रहा है मानो भुने हुए आलू की तरह सूरज हमें चटनी डालकर चाट जाने वाला है। वाह रे भगवान भास्कर की चटाई, पृथ्वी पर पैदा हुई इस सर्वश्रेष्ठ कलाकृति को ही लीलने पर उतारु है। शरीर पर जमी कालिख की परत और झुलस कर पड़ीं झुर्रियों ने अभी से साल के अस्सीवें पड़ाव पर लाकर खड़ा कर दिया है।
बद मिज़ाज मौसम को तो देखिए, चीख-चीख कर कहता है मैं ग्लोबल वॉर्मिंग का शिकार हूं। मुझे बख्श दो। न हम उसे बख्श रहे हैं, और न वो हमें। जुलाई का महीना है और बारिश के नाम पर दिल्ली-एनसीआर में दो चार छीटे, अल्लाह ने मेघ जहां दिए वहां कयामत आ गई। पंजाब, हरियाणा, में अब तक पानी की कमी थी, लेकिन अब इतना पानी है, लोगों के रहने के लिए जगह कम पड़ गई। नियति का खेल, प्रकृति का तमाशा यही कहता है कि उससे छेड़ छाड़ न करो। वरना वो हमारे साथ खेलेगी। और ये खेल ऐसा है जिसमें जीत की मंशा रखना ही बेमानी है। न ड्रॉ की स्थिति, न वॉकओवर की, बस हारना ही है। खुदा खैर बरकत करे उन लोगों को जिनके घर बाढ़ में तबाह हो गए, जिनके परिवार में से कोई पानी की बलि चढ़ गया। जल की लीला ही ऐसी है, ज्यादा हो तब भी मुसीबत कम हो तब भी मुसीबत।
कहानी से थोड़ा हटना चाहूंगा ले चलता हूं आपको अपने पैतृक गांव जहां इस बार हवा-पानी बदलने के लिए गया था, पूरे दस साल बाद गांव तस्वीर ही बदल गई थी, मेरा खुद का घर भी पक्का हो गया था। छप्पर की जगह लिंटर की छांव थी, मिट्टी की दीवार की जगह भट्टों की पकी लाल ईंटों ने ले ली थी। सड़क पक्की बनाई गई थी, लेकिन मिलावट के माल ने उसकी हकीकत को छिपाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी, जो घुचड़ू मदारी मेरे साथ कभी खेला करता था, उसके चार बच्चे हैं, वो सिर्फ खेती करता है, और कच्ची पीता है। उसकी दिनचर्या भी यही है। ये दिनचर्या बच्चों की नहीं बच्चों के बाप की है। गांव में अब वैसा मजा नहीं था, जैसा सोचकर मैं वहां गया था। हालांकि चंद खुशकिस्मत पेड़ों की छांव मुझे जरुर मिल गई, लेकिन फिर भी उन पेड़ों के बीच अब सूरज की रोशनी की तपिश ने अपने लिए हजारों दर्रे बना लिए थे, जहां से वो अपने कोप से मुझे अपना शिकार बना सकता था। वहां मौजूद कई पोखर तालाब अब सूखने की कगार पर थे क्योंकि मौसम बेईमान है, और उससे ज्यादा हम। तालाबों को पानी की जरुरत है, और हमें पूंजीवाद में अपने आपको आगे बढ़ते देखने की ललक। तालाब अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन हम गलत हैं, क्योंकि हमारे हित नुकसान प्रकृति का ही करते हैं। और फिर प्रकृति या तो हमारे सामने भीषण गर्मी के रुप में, हाड़ कंपाने वाली ठंड के रुप में या फिर किसी सुनामी के रुप में सामने आती है, जिससे हम बच नहीं सकते ।
हमारी किस्मत चमकने के साथ प्रकृति की किस्मत फूट जाती है, और जब ऐसा होता है, तो तबाही का दृश्य बदलते मौसम की भयानक तस्वीर पेश करता है। ज़िंदगी की रहगुजर अब इतनी आसान नहीं रह गई, हमारी लड़ाई बदलते मौसम से है, जहां हम जीत नहीं सकते। इस नफरत को ख़त्म कर दें, वरना ये हमारे लिए नर्क के द्वार खोल देगी। हम प्रकृति को कुछ दे नहीं सकते तो उसकी रक्षा जरुर कर सकते हैं। वैसे भी भीषण गर्मी ने हमें हमारी औकात बता दी है। बामुलाहिजा होशियार तूफान तबाही लेकर ही आते हैं।
बद मिज़ाज मौसम को तो देखिए, चीख-चीख कर कहता है मैं ग्लोबल वॉर्मिंग का शिकार हूं। मुझे बख्श दो। न हम उसे बख्श रहे हैं, और न वो हमें। जुलाई का महीना है और बारिश के नाम पर दिल्ली-एनसीआर में दो चार छीटे, अल्लाह ने मेघ जहां दिए वहां कयामत आ गई। पंजाब, हरियाणा, में अब तक पानी की कमी थी, लेकिन अब इतना पानी है, लोगों के रहने के लिए जगह कम पड़ गई। नियति का खेल, प्रकृति का तमाशा यही कहता है कि उससे छेड़ छाड़ न करो। वरना वो हमारे साथ खेलेगी। और ये खेल ऐसा है जिसमें जीत की मंशा रखना ही बेमानी है। न ड्रॉ की स्थिति, न वॉकओवर की, बस हारना ही है। खुदा खैर बरकत करे उन लोगों को जिनके घर बाढ़ में तबाह हो गए, जिनके परिवार में से कोई पानी की बलि चढ़ गया। जल की लीला ही ऐसी है, ज्यादा हो तब भी मुसीबत कम हो तब भी मुसीबत।
कहानी से थोड़ा हटना चाहूंगा ले चलता हूं आपको अपने पैतृक गांव जहां इस बार हवा-पानी बदलने के लिए गया था, पूरे दस साल बाद गांव तस्वीर ही बदल गई थी, मेरा खुद का घर भी पक्का हो गया था। छप्पर की जगह लिंटर की छांव थी, मिट्टी की दीवार की जगह भट्टों की पकी लाल ईंटों ने ले ली थी। सड़क पक्की बनाई गई थी, लेकिन मिलावट के माल ने उसकी हकीकत को छिपाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी, जो घुचड़ू मदारी मेरे साथ कभी खेला करता था, उसके चार बच्चे हैं, वो सिर्फ खेती करता है, और कच्ची पीता है। उसकी दिनचर्या भी यही है। ये दिनचर्या बच्चों की नहीं बच्चों के बाप की है। गांव में अब वैसा मजा नहीं था, जैसा सोचकर मैं वहां गया था। हालांकि चंद खुशकिस्मत पेड़ों की छांव मुझे जरुर मिल गई, लेकिन फिर भी उन पेड़ों के बीच अब सूरज की रोशनी की तपिश ने अपने लिए हजारों दर्रे बना लिए थे, जहां से वो अपने कोप से मुझे अपना शिकार बना सकता था। वहां मौजूद कई पोखर तालाब अब सूखने की कगार पर थे क्योंकि मौसम बेईमान है, और उससे ज्यादा हम। तालाबों को पानी की जरुरत है, और हमें पूंजीवाद में अपने आपको आगे बढ़ते देखने की ललक। तालाब अपनी जगह ठीक हैं, लेकिन हम गलत हैं, क्योंकि हमारे हित नुकसान प्रकृति का ही करते हैं। और फिर प्रकृति या तो हमारे सामने भीषण गर्मी के रुप में, हाड़ कंपाने वाली ठंड के रुप में या फिर किसी सुनामी के रुप में सामने आती है, जिससे हम बच नहीं सकते ।
हमारी किस्मत चमकने के साथ प्रकृति की किस्मत फूट जाती है, और जब ऐसा होता है, तो तबाही का दृश्य बदलते मौसम की भयानक तस्वीर पेश करता है। ज़िंदगी की रहगुजर अब इतनी आसान नहीं रह गई, हमारी लड़ाई बदलते मौसम से है, जहां हम जीत नहीं सकते। इस नफरत को ख़त्म कर दें, वरना ये हमारे लिए नर्क के द्वार खोल देगी। हम प्रकृति को कुछ दे नहीं सकते तो उसकी रक्षा जरुर कर सकते हैं। वैसे भी भीषण गर्मी ने हमें हमारी औकात बता दी है। बामुलाहिजा होशियार तूफान तबाही लेकर ही आते हैं।
रविवार, 11 जुलाई 2010
बारह फट्ट-फट्ट, आठ परसीं चार गायब
टाइटिल उलझाऊ हो सकता है, लेकिन कहानी बेहद साफ है। एक दम शीशे सी उजली । बात दिनों की है, जब शायद वस्तु विनिमय का दौर रहा होगा। एक गांव में एक भठियारन ( पैसे या सामान लेकर खाना बनाने वाली महिला) रहा करती थी, उस दौर में मुद्रा अलग-अलग रुपों में प्रचिलित थी, नोट चलन में नहीं थे, लेकिन सिक्कों का चलन शायद रहा होगा। वो भठियारन राहगीरों के लिए खाना बनाया करती थी, एवज़ में राहगीरों से लेती थी, अपनी जरुरत का कुछ सामान, जो कि उसके लिए मुद्रा का कार्य करता था। वो भठियारन अपनी उम्दा पाक कला के कारण दूर-दूर तक मशहूर थी, लिहाज़ा बीवियों से ठुकराए हुए, समाज से ठुकराए हुए, या नहीं भी ठुकराए हुए लोग उसकी झोपड़ी में कुछ दमड़ी चुका कर उदर छुदा को मिटा लिया करते थे। कुछ लोग उसके शरीर की कीमत भी लगा दिया करते थे, और वो भी मना नहीं करती थी। लेकिन ज्यादा पैसे की लोलुपता ने उसके मन में कपट भर दिया था।
एक रोज़ की बात है, एक राहगीर जिसके पास पर्याप्त मात्रा में खाद्य सामग्री का कच्चा माल मौजूद था, लेकिन भोजन बनाना नहीं जानता था, इसलिए उसने उस भटियारन की झोपड़ी की ओर कूच कर दिया। दरवाजे पर पहुंचते ही, उसने अपनी फरमाइश भठियारन के सामने रख दी । और भठियारन ने कहा ठीक है, लेकिन खाना बनने में थोड़ा वक्त लगेगा, वो राहगीर वहीं भठियारन की झोपड़ी के एक दूसरे छोटे कमरे में बैठकर खाने का इंतज़ार करने लगा, सब्जी तैयार हो चुकी थी, और रोटियों के लिए आंटा भी गूथा जा चुका था। अब बारी थी, रोटियां सेंकने की। उस आंटे से बनने वाली रोटियों की तादात 12 थी। क्योंकि राहगीर ने बारह बार रोटियों की फट्ट फट्ट (हाथ से बेलने की आवाज़) की आवाज़ को सुना था, लेकिन जब राहगीर को रोटियां परोसी गईं तो रोटियां 12 की संख्या में नहीं बल्कि 8 की संख्या में थीं। राहगीर भौचक्का था, बोला क्या बीबीजी बारह “फट्ट फट्ट, आठ परसीं चार गायब” । पहले तो भठियारन को कुछ समझ नहीं आया, लेकिन जब राहगीर ने अकड़ कर उससे कहा कि मैने बारह बार रोटियां बेलने की आवाज़ को सुना, और तुमने आठ ही परोसीं, ये क्या घपला है। वो भठियारन सफाई देने लगी कि नहीं तुम्हें गलतफहमी हुई है। लेकिन वो राहगीर भी चालाक था और उसकी हरकतों को अच्छी तरह जानता था, वो उसकी रसोई की तरफ गया, और छिपा कर रखी गईं चार रोटियों को दिखाते हुए बोला कि ये वही रोटियां हैं, जो कि तुमने मेरे हिस्से में से चुराकर अपने पास रख लीं। गलत मैं नहीं था, गलत तुम हो अपने ईमान से।
तो कहानी का सार यही कहता है कि हिंदुस्तान की सियासत में बनने वाली रोटियां बारह फट्ट फट्ट हैं, जिनमें चार गायब हो जाती हैं, और पता तक नहीं लगता, जनता जनार्दन जानती है, कि सरकार की योजनाओं से जो हिस्सा उसे मिलना चाहिए या तो वो उस तक पहुंच ही नहीं पाता और अगर पहुंचता भी है तो आधा-अधूरा। सरकार के बीच बैठे चंद लोग भठियारन का रोल निभाते हैं, और हम राहगीर हैं, जो अपने हिस्से से टैक्स देते हुए भी अपने अधिकारों से वंचित रह जाते हैं। आंखों में जब लालच भर जाए तो उन्हें दमड़ी के सिवाए कुछ दिखाई नहीं देता। ऐसा ही हाल भारतीय राजनीति का भी है, यहां भठियारन भी है, और राहगीर भी।
भठियारन की आँखों में सिर्फ लालच भरा है, तो उसे सिर्फ दमड़ी दिखाई देती है, और राहगीर हमेशा की तरह बेचारा बना रहता है।
बिहार में हर साल आने वाली बाढ़ के बाद की कहानी भी ऐसी ही है, यहां बाढ़ के बाद अगर कुछ बचता है, तो सिर्फ किसानों के हाथों में रेत, खेतों में खरपतवार, और तबाही, पिछली बाढ़ के बाद दूसरे राज्यों से मिली मदद के बावजूद कई लोग अब तक बेघर हैं, उनके खेतों से अभी तक वो मनहूस रेत नहीं हट सकी है, जिसे पिछले साल की बाढ़ बहा कर अपने साथ ले आई थी। और अब अगर इस बार भी बिहार को इंद्र देवता का कोप झेलना पड़ा, तो नुकसान की सुनामी आ जाएगी। और मुआवज़े या मदद के रुप में वही “बारह फट्ट फट्ट आठ परसीं चार गायब” या फिर शायद इससे भी ज्यादा। हमें उस राहगीर की तरह जागरूक और बुद्धिमान बने रहना होगा, और चेताना होगा सरकार के उन नुमाइंदों को जो सफेदपोश भठियारन का किरदार निभा रहे हैं।
एक रोज़ की बात है, एक राहगीर जिसके पास पर्याप्त मात्रा में खाद्य सामग्री का कच्चा माल मौजूद था, लेकिन भोजन बनाना नहीं जानता था, इसलिए उसने उस भटियारन की झोपड़ी की ओर कूच कर दिया। दरवाजे पर पहुंचते ही, उसने अपनी फरमाइश भठियारन के सामने रख दी । और भठियारन ने कहा ठीक है, लेकिन खाना बनने में थोड़ा वक्त लगेगा, वो राहगीर वहीं भठियारन की झोपड़ी के एक दूसरे छोटे कमरे में बैठकर खाने का इंतज़ार करने लगा, सब्जी तैयार हो चुकी थी, और रोटियों के लिए आंटा भी गूथा जा चुका था। अब बारी थी, रोटियां सेंकने की। उस आंटे से बनने वाली रोटियों की तादात 12 थी। क्योंकि राहगीर ने बारह बार रोटियों की फट्ट फट्ट (हाथ से बेलने की आवाज़) की आवाज़ को सुना था, लेकिन जब राहगीर को रोटियां परोसी गईं तो रोटियां 12 की संख्या में नहीं बल्कि 8 की संख्या में थीं। राहगीर भौचक्का था, बोला क्या बीबीजी बारह “फट्ट फट्ट, आठ परसीं चार गायब” । पहले तो भठियारन को कुछ समझ नहीं आया, लेकिन जब राहगीर ने अकड़ कर उससे कहा कि मैने बारह बार रोटियां बेलने की आवाज़ को सुना, और तुमने आठ ही परोसीं, ये क्या घपला है। वो भठियारन सफाई देने लगी कि नहीं तुम्हें गलतफहमी हुई है। लेकिन वो राहगीर भी चालाक था और उसकी हरकतों को अच्छी तरह जानता था, वो उसकी रसोई की तरफ गया, और छिपा कर रखी गईं चार रोटियों को दिखाते हुए बोला कि ये वही रोटियां हैं, जो कि तुमने मेरे हिस्से में से चुराकर अपने पास रख लीं। गलत मैं नहीं था, गलत तुम हो अपने ईमान से।
तो कहानी का सार यही कहता है कि हिंदुस्तान की सियासत में बनने वाली रोटियां बारह फट्ट फट्ट हैं, जिनमें चार गायब हो जाती हैं, और पता तक नहीं लगता, जनता जनार्दन जानती है, कि सरकार की योजनाओं से जो हिस्सा उसे मिलना चाहिए या तो वो उस तक पहुंच ही नहीं पाता और अगर पहुंचता भी है तो आधा-अधूरा। सरकार के बीच बैठे चंद लोग भठियारन का रोल निभाते हैं, और हम राहगीर हैं, जो अपने हिस्से से टैक्स देते हुए भी अपने अधिकारों से वंचित रह जाते हैं। आंखों में जब लालच भर जाए तो उन्हें दमड़ी के सिवाए कुछ दिखाई नहीं देता। ऐसा ही हाल भारतीय राजनीति का भी है, यहां भठियारन भी है, और राहगीर भी।
भठियारन की आँखों में सिर्फ लालच भरा है, तो उसे सिर्फ दमड़ी दिखाई देती है, और राहगीर हमेशा की तरह बेचारा बना रहता है।
बिहार में हर साल आने वाली बाढ़ के बाद की कहानी भी ऐसी ही है, यहां बाढ़ के बाद अगर कुछ बचता है, तो सिर्फ किसानों के हाथों में रेत, खेतों में खरपतवार, और तबाही, पिछली बाढ़ के बाद दूसरे राज्यों से मिली मदद के बावजूद कई लोग अब तक बेघर हैं, उनके खेतों से अभी तक वो मनहूस रेत नहीं हट सकी है, जिसे पिछले साल की बाढ़ बहा कर अपने साथ ले आई थी। और अब अगर इस बार भी बिहार को इंद्र देवता का कोप झेलना पड़ा, तो नुकसान की सुनामी आ जाएगी। और मुआवज़े या मदद के रुप में वही “बारह फट्ट फट्ट आठ परसीं चार गायब” या फिर शायद इससे भी ज्यादा। हमें उस राहगीर की तरह जागरूक और बुद्धिमान बने रहना होगा, और चेताना होगा सरकार के उन नुमाइंदों को जो सफेदपोश भठियारन का किरदार निभा रहे हैं।
मंगलवार, 22 जून 2010
चमचा उन्नति कॉर्नर
पिछले कई बर्षों से देख रहा हूं, चमचों को फलते-फूलते, ये नहीं पता चल पा रहा था कि वो और क्यों, कैसे, और किस विधि से दिन ब दिन विकसित हो रहे हैं, और भारत विकाशसील का विकाशसील ही बना हुआ है। भारत ढर्रे पर चल रहा है, और वो ढर्रे से हट चुके हैं। शायद यही उनके विकास का जरिया बन गया है। विकासशील भारत की उन्नत तस्वीर जब चमचों के द्वारा खींची जाएगी, तो भारत का गर्त में जाना तय है। खासकर तब जब हिंदुस्तान में चमचा उन्नति कॉर्नर खोला जाने लगा हो। चूंकि अब से कुछ रोज पहले मैने अपने एक ब्लॉग में http://khabarloongasabki.blogspot.com/2010/03/blog-post_29.html
चमचा काल का जिक्र किया था, इसलिए इसमें जिक्र नहीं करुंगा की चमचों का इतिहास कलिकाल से चला आ रहा है। मेरी बात ढर्रों से थोड़ी हटकर है क्योंकि ढर्रे पर चलना मेरी आदत नहीं, लेकिन मैं एक चमचा भी नहीं, बस चमचों पर नज़र रखने वाला एक ख़बरदार हूं। इसमें कोई शक नहीं हमाम में नंगों की कोई कमी नहीं, लेकिन इस बात में भी कोई शक नहीं कि भारत में चमचों की कोई कमी नहीं।
जब घी सीधी उंगली से नहीं निकला, तो चमचों ने उन्नति कॉर्नर खोल लिया। चमचों के इस ठिए में (निवास स्थान) सिर्फ मंत्रणा होती है, भारत के विकास पर नहीं, बल्कि खुद के विकास पर । जनता इन दिनों महंगाई और गर्मी से परेशान हैं, लेकिन चमचों को इससे कोई इत्तेफाक नहीं, क्योंकि वो मेरी नज़र में इंसानों की श्रेणी में नहीं आते, वो एक अलग तरह की प्रजाति है, जिसने पिछले दिनों में बेतरतीब उन्नति की है। बस कुछ ऐसा ही बूछिए कि वो जब चर्चा करते हैं, तो सिर्फ निजी विकास पर। भारत की विकास दर से उन्हें कोई आशय नहीं।
चमचों का ये कोना एक ऐसी चर्चा का मंच है, जहां चमचैली परंपराओं की कलश यात्रा से लेकर उनका अश्वमेघ यज्ञ भी किया जाता है। एक बॉस की पीछे दस चमचे ठीक वैसे ही लगे होते हैं, जैसे कातिक की कुतिया के पीछे सड़क छाप कुत्ते। निजी विकास की रबड़ी को लालायित ये कुत्ते, कातिक की कुतिया के पीछे ऐसे पड़े रहते हैं, जैसे गाजर के पीछे गधा। “तात लात रावण मोहि मारा” की तरह किसी दफ्तर के लिए ये विभीषण साबित होते हैं, जैसे ही रावण इनके पिछवाड़े पर लात मारता है, ये फौरन राम की शरण में जाकर सारे राज़ उगल देते हैं। बस अंतर इतना है कि राक्षस कुलीन विभीषण एक सीधा साधा इंसान था, जबकि ये आदम युगीन लोग लोभी प्रजाति के जीव के जीव की तरह हैं। जो नौकरी में प्रमोशन पाने से लेकर, लोगों की नौकरी खाने तक में बॉस की जी हुजूरी बजाते फिरते हैं। काम के नाम पर उनकी दिहाड़ी सिर्फ बॉस को एक मैसेज भेजने मात्र से ही पूरी हो जाती है। मैसेज का विषय कुछ ऐसा रहता है, कि आज दफ्तर में इतने आदमी मौजूद रहे, उस व्यक्ति ने काम किया, अमुक व्यक्ति ने काम नहीं किया, फलाना व्यक्ति आपको गरिया रहा था, और आपकी दुआ से सब बढ़िया चल रहा है। कुल मिलाकर बॉस को भेजा गया ये एसएमएस छ महीनों में ही उनकी तरक्की के साधन जुटा देता । बॉस की जूठन चमचों के लिए नाइट मील से कम नहीं है। और उसकी जूठन खाकर चमचा अपने आप को महान समझता है।
ये सच है कि चमचा उन्नति कॉर्नर में मौजूद सारे चमचे बॉस की खिचड़ी हिलाने का काम करते हैं, वो दिगंबर हैं, और उनका बॉस द हेड ऑफ दिगंबर। वाह रे नंग, जो तुम अपने आप को परमेश्वर से भी ऊंचा समझते हो। क्योंकि आपको पता ही होगा “नंग बड़े परमेश्वर से”। इसलिए चमचों की नंगई से बचकर ही रहिएगा। इनकी हरामगर्दी आपकी खुद्दारी को लील सकती है।
चमचा काल का जिक्र किया था, इसलिए इसमें जिक्र नहीं करुंगा की चमचों का इतिहास कलिकाल से चला आ रहा है। मेरी बात ढर्रों से थोड़ी हटकर है क्योंकि ढर्रे पर चलना मेरी आदत नहीं, लेकिन मैं एक चमचा भी नहीं, बस चमचों पर नज़र रखने वाला एक ख़बरदार हूं। इसमें कोई शक नहीं हमाम में नंगों की कोई कमी नहीं, लेकिन इस बात में भी कोई शक नहीं कि भारत में चमचों की कोई कमी नहीं।
जब घी सीधी उंगली से नहीं निकला, तो चमचों ने उन्नति कॉर्नर खोल लिया। चमचों के इस ठिए में (निवास स्थान) सिर्फ मंत्रणा होती है, भारत के विकास पर नहीं, बल्कि खुद के विकास पर । जनता इन दिनों महंगाई और गर्मी से परेशान हैं, लेकिन चमचों को इससे कोई इत्तेफाक नहीं, क्योंकि वो मेरी नज़र में इंसानों की श्रेणी में नहीं आते, वो एक अलग तरह की प्रजाति है, जिसने पिछले दिनों में बेतरतीब उन्नति की है। बस कुछ ऐसा ही बूछिए कि वो जब चर्चा करते हैं, तो सिर्फ निजी विकास पर। भारत की विकास दर से उन्हें कोई आशय नहीं।
चमचों का ये कोना एक ऐसी चर्चा का मंच है, जहां चमचैली परंपराओं की कलश यात्रा से लेकर उनका अश्वमेघ यज्ञ भी किया जाता है। एक बॉस की पीछे दस चमचे ठीक वैसे ही लगे होते हैं, जैसे कातिक की कुतिया के पीछे सड़क छाप कुत्ते। निजी विकास की रबड़ी को लालायित ये कुत्ते, कातिक की कुतिया के पीछे ऐसे पड़े रहते हैं, जैसे गाजर के पीछे गधा। “तात लात रावण मोहि मारा” की तरह किसी दफ्तर के लिए ये विभीषण साबित होते हैं, जैसे ही रावण इनके पिछवाड़े पर लात मारता है, ये फौरन राम की शरण में जाकर सारे राज़ उगल देते हैं। बस अंतर इतना है कि राक्षस कुलीन विभीषण एक सीधा साधा इंसान था, जबकि ये आदम युगीन लोग लोभी प्रजाति के जीव के जीव की तरह हैं। जो नौकरी में प्रमोशन पाने से लेकर, लोगों की नौकरी खाने तक में बॉस की जी हुजूरी बजाते फिरते हैं। काम के नाम पर उनकी दिहाड़ी सिर्फ बॉस को एक मैसेज भेजने मात्र से ही पूरी हो जाती है। मैसेज का विषय कुछ ऐसा रहता है, कि आज दफ्तर में इतने आदमी मौजूद रहे, उस व्यक्ति ने काम किया, अमुक व्यक्ति ने काम नहीं किया, फलाना व्यक्ति आपको गरिया रहा था, और आपकी दुआ से सब बढ़िया चल रहा है। कुल मिलाकर बॉस को भेजा गया ये एसएमएस छ महीनों में ही उनकी तरक्की के साधन जुटा देता । बॉस की जूठन चमचों के लिए नाइट मील से कम नहीं है। और उसकी जूठन खाकर चमचा अपने आप को महान समझता है।
ये सच है कि चमचा उन्नति कॉर्नर में मौजूद सारे चमचे बॉस की खिचड़ी हिलाने का काम करते हैं, वो दिगंबर हैं, और उनका बॉस द हेड ऑफ दिगंबर। वाह रे नंग, जो तुम अपने आप को परमेश्वर से भी ऊंचा समझते हो। क्योंकि आपको पता ही होगा “नंग बड़े परमेश्वर से”। इसलिए चमचों की नंगई से बचकर ही रहिएगा। इनकी हरामगर्दी आपकी खुद्दारी को लील सकती है।
रविवार, 13 जून 2010
चिलम चूतिया
एक रात की बात है,
बिना विचारे,
मेरे द्वारे,
दो चूतिया पधारे।
मकसद-ए-खाक था,
इरादा नापाक था।
बनाना था मुझे चूतिया,
मौका था अप्रैल फूल का।
भीषण गर्मी थी,
उन्हें ठहराने को,
घर में जगह कम थी।
चू रहा था,
उनकी टांट से पसीना,
उस रात दोनों ने,
कर दिया हराम मेरा जीना।
अपनी संकुचित जुबान से,
बड़े बड़े प्रोजेक्ट मुझे सुझाने लगे।
कम लागत में,
बड़े बनने का ख्वाब,
मुझे दिखाने लगे।
उनकी बातों में उस रात बड़ा दम था,
जो मुझे हर बात सुहाने लगी।
लगा,
कि अब बड़ा बन जाऊंगा
टेम्स के दर्शन कर पाऊंगा ।
लेकिन उनकी सुलगती,
चिलम-ए-चूतिया का धुंआ,
मैं महसूस न कर पाया,
उनके इरादों को भांप न पाया ।
अपने आप को वो समझ रहे थे,
भारत की महान विभूतियां,
और बना रहे थे मुझे चूतिया।
था मलाल इस बात का ,
कि वो दो थे ,
और मैं था अकेला,
समझ नहीं पा रहा था,
उनका झमेला ।
उनकी हर बात में रबडी़ का लच्छा था,
उनका हर विचार उस समय बड़ा अच्छा था।
वो ब्रेन वॉश में माहिर थे,
चाट गए किसी दीमक की भांति,
मेरे दिमाग को,
और समझ रहे थे बुद्धिजीवी,
अपने आप को ।
बिना विचारे,
मेरे द्वारे,
दो चूतिया पधारे।
मकसद-ए-खाक था,
इरादा नापाक था।
बनाना था मुझे चूतिया,
मौका था अप्रैल फूल का।
भीषण गर्मी थी,
उन्हें ठहराने को,
घर में जगह कम थी।
चू रहा था,
उनकी टांट से पसीना,
उस रात दोनों ने,
कर दिया हराम मेरा जीना।
अपनी संकुचित जुबान से,
बड़े बड़े प्रोजेक्ट मुझे सुझाने लगे।
कम लागत में,
बड़े बनने का ख्वाब,
मुझे दिखाने लगे।
उनकी बातों में उस रात बड़ा दम था,
जो मुझे हर बात सुहाने लगी।
लगा,
कि अब बड़ा बन जाऊंगा
टेम्स के दर्शन कर पाऊंगा ।
लेकिन उनकी सुलगती,
चिलम-ए-चूतिया का धुंआ,
मैं महसूस न कर पाया,
उनके इरादों को भांप न पाया ।
अपने आप को वो समझ रहे थे,
भारत की महान विभूतियां,
और बना रहे थे मुझे चूतिया।
था मलाल इस बात का ,
कि वो दो थे ,
और मैं था अकेला,
समझ नहीं पा रहा था,
उनका झमेला ।
उनकी हर बात में रबडी़ का लच्छा था,
उनका हर विचार उस समय बड़ा अच्छा था।
वो ब्रेन वॉश में माहिर थे,
चाट गए किसी दीमक की भांति,
मेरे दिमाग को,
और समझ रहे थे बुद्धिजीवी,
अपने आप को ।
शनिवार, 5 जून 2010
हलाल हो गई कसक
तुम्हारी कसक मेरे घावों पर लगी उस बैंडेड की उधड़ी पैबंद है जहां से झांकता मेरा घाव अब लोगों को भी नज़र आने लगा है। ये घाव कभी सी नहीं सकेगा कोई, तुम्हारे अहसासों की पुलटिस (मरहम) बार-बार इन घावों को हरा करती रहेगी, ये टीस हमेशा उठती रहेगी। बार बार आवाज़ आएगी, तुम मतलब परस्त हो। मैं तुम्हें जीत तो न सका, लेकिन तुम मेरी हार पर हमेशा हंसते गए। तुम्हारी उस हंसी में आत्म सुख की अनुभूति दिखाई देती है मुझे। शायद तुम्हारा आत्मसुख मेरी हार से ही जीवित है। मैं हर बार हारुंगा ऐसा नहीं होगा। जीतने आया था, जीत कर जाऊंगा। मेरी इच्छाएं नेपोलियन के साहस से भी ऊंची हो जाती हैं, जब मैं इस खेल में अपने आप को हारा हुआ महसूस करता हूं। कभी न झुकने का साहस मेरी खुद्दारी है। हो सकता है कि मैं थोड़ा सा नरम हुआ हूं, लेकिन झुका कभी नहीं। तुमने शायद इसी नरमी को गले लगाकर जीत का हार पहन लिया हो। लेकिन मैं अपनी हार से ऊपर उठ जाऊंगा, तुम्हें हराकर जाऊंगा। तुम्हारे साथ के अहसासों में मैने अपने आप को कहीं खो दिया था। लेकिन अब निष्ठुर हो चुका हूं। कहीं खोने नहीं दूंगा अपने आप को । अब साधा हुआ तीर चिड़िया की आंख पर ही लगेगा। मेरे दरीचे का जो शामियाना तुम्हारे तूफान से उखड़ गया था, वो अब फिर लग चुका है। फिर बहार उस शामियाने को अपने आगोश में लेने वाली है। तुम्हारी हर मीठी छुअन अब चुभन बन चुकी है। पोटेशियम साइनाइट बनते जा रहे हो तुम मेरे लिए, मैं तुम्हें सिर आंखों पर बिठाता गया, और तुम चंदन पर लिपटे सांप की ही तरह मेरे तन को डसते चले गए।तुम खुद्दार हो किसी के लिए ये तो मैं नहीं जानता, लेकिन तुम्हारी गद्दारी ने मुझे खूब सिखाया है। वक्त बदल चुका है, राहों के कांटे अब पुष्प बन चुके हैं। तुम्हारी याद करके इन लम्हों में और ज़हर नहीं घोलना चाहता। तुम्हारे सुख की कामना करता रहूं, अब शायद ये भी न हो पाए मुझसे। अगर तुम व्यस्त हो, तो मैं तुमसे ज्यादा व्यस्त हूं। मेरी जीवनी में तुम एक ऐसा चरित्र बन बैठे थे, जो मुझे हमेशा कमज़ोर करता रहा। अपनी इसी कमज़ोरी से निपटने का उपाय ढूंढ लिया है मैने। जाओ चले जाओ कहीं दूर, जहां से न मैं तुम्हारी आवाज़ सुन सकूं, और न ही तुम्हें देख ही सकूं। तुम एक बेरहम कातिल हो, तुमने मेरे शरीर का कत्ल तो नहीं किया। लेकिन मेरी आत्मा और मेरे अहसासों को हलाल जरुर कर दिया। अब वो अहसास कभी जीवित न होंगे। जाओ किसी कण में अब तुम्हारी शक्ल मुझे दिख जाए न कहीं। मेरी कसक की हलाली करने वाले ऐ दोस्त तुम्हारी गुमशुदगी अब कभी तलाश न हो सकेगी।
बुधवार, 19 मई 2010
तीन मिनट की ‘लोन व्यवस्था’
भारत एक कृषि प्रधान देश है, साथ ही तुर्रमखाओं का देश भी है। यहां तुर्रमखाओं ने अपनी तुर्रमई की बदौलत पड़ोसियों को जलने-कुढ़ने पर मजबूर कर दिया है, ‘पड़ोसियों की जलन आपकी शान’ सभी को याद होगा। कि किस तरह से एक कंपनी की टीवी खरीदने से दूसरों के जलन की व्यवस्था हो जाती है। यहां हमारी शान से कोई मतलब नहीं विशेष प्रायोजन तो दूसरे की जलन से है। नब्बे के दशक में विलासकारी वस्तुओं की खासी कीमत हुआ करती थी। इन वस्तुओं को घर में सजाने के लिए पहले योजनाबद्ध होना पड़ता था, उसके बाद अगर योजना अमल में आ जाती थी, तो घर में अच्छे पकवानों के साथ उस योजना का शुभारंभ भी हो जाता था। मसलन बीस हजार रुपए में अगर रंगीन टेलीविजन बाज़ार में बिक रहा है, तो तुर्रमखां को कम से कम बीस बार सोचना पड़ता था, उसके बाद कहीं जा कर जोड़-जुगाड़ भिड़ा कर रंगीन स्क्रीन टीवी घर पर आ पाता था। और यहीं से शुरु हो जाती थी, पड़ोसी के जलने की व्यवस्था।
उस वक्त विलासकारी समस्त वस्तुओं के दाम इतने ज्यादा हुआ करते थे, कि सरकारी नौकरी करने वालों के बस के बाहर की बात थी, कि वो हर सुविधा का लुत्फ उठा सकें। जिस तरह से जब ताकत तानाशाह बन जाती है तो विनाश की बू आने लगती है। ठीक वैसी ही कहानी है भारत में लोन व्यवस्था की, यहां धन संपन्न होना समाज में पैठ है, ख्याति है, डूड है, हंक है, एलीट है, और न जाने क्या क्या, लेकिन अगर आप धन संपन्न नहीं हैं तो, आप नाकारा हैं, काहिल हैं, मजबूर हैं, गरीब हैं, सस्ते हैं, निरीह हैं, हैरान हैं, परेशान हैं, और न जाने क्या क्या।
चलिए शुरु करते हैं लोनिंग व्यवस्था के बारे में। ये आज के युग में सभी के लिए ठीक वैसे ही जरुरी है, जैसे एकाउंट्स में व्यापार आरंभ करने की जर्नल एंट्री। अमीर हो तो लोन, गरीब हो तो लोन, कहीं के नहीं हो तो भी लोन। लोन यूनिवर्सल है, तुर्रमखां ने लिया लोन और बनवा ली कोठी, खरीद ली कार, लगवा लिया एसी, और बन गए एलीट, ब्याज चुकाए पड़े हैं, नौबत ये आ गई है कि जो खरीदा था वो धीरे धीरे बेंचना पड़ रहा है। यही तो कर्ज की माया है, और कर्जदार का दुर्भाग्य।
बड़ी पुरानी कहावत है, किसान कर्ज में जन्म लेता है, और कर्ज में मर जाता है। लेकिन फिर भी कर्ज लेता है, ले भी क्यों न, कृषि प्रधान देश है तो क्या, यहां किसानों की इज्जत करने वाले न तो हम हैं और न सरकार । हालांकि सरकार ने तो इस बार ऋण माफ कर दिया, लेकिन साहूकार कोई मर थोड़े ही गए हैं, किसान उनसे और लोन लेंगे, और साहूकार उनसे और ब्याज लेंगे। नतीजा ये निकलेगा कि बेचारे की लुटिया डूब जाएगी। उसकी ज़मीन पर सामंतवाद का अंगूठा लगा दिया जाएगा । और किसान फिर मजबूर हो जाएगा कर्ज में मरने को।
लोन की बात चली रही है तो एक साइन बोर्ड पर आपकी नज़र ले जाता हूं, जो कहता फिरता है कि “तीन मिनट में लोन” । ये तीन तिगाड़ा जहां भी होता है काम बिगाड़ता ही है। लेकिन किसी रचनात्मक व्यक्ति द्वारा रखी गई ये पंच लाइन, बड़ी सफाई से चूतिया बना रही है। पहले तो ये सुनें कि तीन मिनट में कर्जदार बनाने वाली कंपनिया, तीस चक्कर कटवाती हैं, उसके बाद कहीं जाकर इंसान को कर्ज में डुबा दिया जाता है। औद्योगिक क्रांति है, सभी को कर्ज चाहिए किसी को इनकम टैक्स से बचने के लिए तो किसी को पड़ोसियों की जलन के लिए, तो किसी को दो जून के लिए। ऐसे में तीन मिनट की लोन व्यवस्था बड़ी आसान नज़र आती है।
ये तीन मिनट की लोन व्यवस्था दूर का ढोल है जरा उनसे पूछिएगा जो इस सुविधा का कथित तौर पर आनंद उठा चुके हैं। उनके लिए आज का आनंद कल का रोग बन चुका है। हायर परचेज़िंग और इंस्टॉलमेंट सिस्टम ने सिस्टम खराब कर दिया है। ये व्यवस्था, उदारवादी युग में साझीदार बन चुकी है। एक ऐसा साझीदार जो सिर्फ सुख का साथी है, दुखों के दौर में वो मौत बनकर प्रकट हो जाता है। लोन लेने से पहले विचारना ये कर्जदार की फितरत नहीं, यही कारण है कि बाद में उसे कई बार लोन माफियाओं के लट्ठ खाने पड़ते हैं। लोनिंग के पीछे बैठी लोन माफियाओं की ताकत कर्जदारों की नींद हराम कर देती है। ये इतने ताकतवर होते हैं कि अगर आपने अपनी किश्त वक्त पर नहीं जमा की तो ये आपका आने वाला वक्त खराब कर सकते हैं। लठैतों को ट्रेंड करने वाली ये निजी कर्ज संस्थाएं बरसाती कुकुरमुत्तों की तरह फैली जा रही हैं। एक कर्जदार के पीछे चार लठैत नियुक्त किए जाते हैं। जो किश्त वक्त पर नहीं भर पाता उसे घर से उठवाने का माद्दा भी रखते हैं ये। प्रशासन इनकी दौलत और रसूख के सामने खुद को बौना साबित कर लेता है। यही कारण है कि कर्ज का कैंसर लाइलाज बीमारी बनने की कोशिश करने लगा है।
खैर तुर्रमखां अब लोन लेंगे, इस बात का तो पता नहीं, लेकिन वो लोनिंग प्रक्रिया के परिणामों को नहीं भूलेंगे। कई बार ऐसा होता है कि दूसरों को जलाने के चक्कर में हम खुद जल जाते हैं। जलन बड़ी महान है, दूसरों को हो जाए तो समझिये हमारे लिए सबसे बड़ा सुख । तो कवि कहता है कि लोन लेकर तुर्रमखां न बनिए। दूसरे आपके सुखों से जलेंगे, ये मत सोचिए। बस ये सोचिए कि अब कर्ज नहीं लेंगे।
उस वक्त विलासकारी समस्त वस्तुओं के दाम इतने ज्यादा हुआ करते थे, कि सरकारी नौकरी करने वालों के बस के बाहर की बात थी, कि वो हर सुविधा का लुत्फ उठा सकें। जिस तरह से जब ताकत तानाशाह बन जाती है तो विनाश की बू आने लगती है। ठीक वैसी ही कहानी है भारत में लोन व्यवस्था की, यहां धन संपन्न होना समाज में पैठ है, ख्याति है, डूड है, हंक है, एलीट है, और न जाने क्या क्या, लेकिन अगर आप धन संपन्न नहीं हैं तो, आप नाकारा हैं, काहिल हैं, मजबूर हैं, गरीब हैं, सस्ते हैं, निरीह हैं, हैरान हैं, परेशान हैं, और न जाने क्या क्या।
चलिए शुरु करते हैं लोनिंग व्यवस्था के बारे में। ये आज के युग में सभी के लिए ठीक वैसे ही जरुरी है, जैसे एकाउंट्स में व्यापार आरंभ करने की जर्नल एंट्री। अमीर हो तो लोन, गरीब हो तो लोन, कहीं के नहीं हो तो भी लोन। लोन यूनिवर्सल है, तुर्रमखां ने लिया लोन और बनवा ली कोठी, खरीद ली कार, लगवा लिया एसी, और बन गए एलीट, ब्याज चुकाए पड़े हैं, नौबत ये आ गई है कि जो खरीदा था वो धीरे धीरे बेंचना पड़ रहा है। यही तो कर्ज की माया है, और कर्जदार का दुर्भाग्य।
बड़ी पुरानी कहावत है, किसान कर्ज में जन्म लेता है, और कर्ज में मर जाता है। लेकिन फिर भी कर्ज लेता है, ले भी क्यों न, कृषि प्रधान देश है तो क्या, यहां किसानों की इज्जत करने वाले न तो हम हैं और न सरकार । हालांकि सरकार ने तो इस बार ऋण माफ कर दिया, लेकिन साहूकार कोई मर थोड़े ही गए हैं, किसान उनसे और लोन लेंगे, और साहूकार उनसे और ब्याज लेंगे। नतीजा ये निकलेगा कि बेचारे की लुटिया डूब जाएगी। उसकी ज़मीन पर सामंतवाद का अंगूठा लगा दिया जाएगा । और किसान फिर मजबूर हो जाएगा कर्ज में मरने को।
लोन की बात चली रही है तो एक साइन बोर्ड पर आपकी नज़र ले जाता हूं, जो कहता फिरता है कि “तीन मिनट में लोन” । ये तीन तिगाड़ा जहां भी होता है काम बिगाड़ता ही है। लेकिन किसी रचनात्मक व्यक्ति द्वारा रखी गई ये पंच लाइन, बड़ी सफाई से चूतिया बना रही है। पहले तो ये सुनें कि तीन मिनट में कर्जदार बनाने वाली कंपनिया, तीस चक्कर कटवाती हैं, उसके बाद कहीं जाकर इंसान को कर्ज में डुबा दिया जाता है। औद्योगिक क्रांति है, सभी को कर्ज चाहिए किसी को इनकम टैक्स से बचने के लिए तो किसी को पड़ोसियों की जलन के लिए, तो किसी को दो जून के लिए। ऐसे में तीन मिनट की लोन व्यवस्था बड़ी आसान नज़र आती है।
ये तीन मिनट की लोन व्यवस्था दूर का ढोल है जरा उनसे पूछिएगा जो इस सुविधा का कथित तौर पर आनंद उठा चुके हैं। उनके लिए आज का आनंद कल का रोग बन चुका है। हायर परचेज़िंग और इंस्टॉलमेंट सिस्टम ने सिस्टम खराब कर दिया है। ये व्यवस्था, उदारवादी युग में साझीदार बन चुकी है। एक ऐसा साझीदार जो सिर्फ सुख का साथी है, दुखों के दौर में वो मौत बनकर प्रकट हो जाता है। लोन लेने से पहले विचारना ये कर्जदार की फितरत नहीं, यही कारण है कि बाद में उसे कई बार लोन माफियाओं के लट्ठ खाने पड़ते हैं। लोनिंग के पीछे बैठी लोन माफियाओं की ताकत कर्जदारों की नींद हराम कर देती है। ये इतने ताकतवर होते हैं कि अगर आपने अपनी किश्त वक्त पर नहीं जमा की तो ये आपका आने वाला वक्त खराब कर सकते हैं। लठैतों को ट्रेंड करने वाली ये निजी कर्ज संस्थाएं बरसाती कुकुरमुत्तों की तरह फैली जा रही हैं। एक कर्जदार के पीछे चार लठैत नियुक्त किए जाते हैं। जो किश्त वक्त पर नहीं भर पाता उसे घर से उठवाने का माद्दा भी रखते हैं ये। प्रशासन इनकी दौलत और रसूख के सामने खुद को बौना साबित कर लेता है। यही कारण है कि कर्ज का कैंसर लाइलाज बीमारी बनने की कोशिश करने लगा है।
खैर तुर्रमखां अब लोन लेंगे, इस बात का तो पता नहीं, लेकिन वो लोनिंग प्रक्रिया के परिणामों को नहीं भूलेंगे। कई बार ऐसा होता है कि दूसरों को जलाने के चक्कर में हम खुद जल जाते हैं। जलन बड़ी महान है, दूसरों को हो जाए तो समझिये हमारे लिए सबसे बड़ा सुख । तो कवि कहता है कि लोन लेकर तुर्रमखां न बनिए। दूसरे आपके सुखों से जलेंगे, ये मत सोचिए। बस ये सोचिए कि अब कर्ज नहीं लेंगे।
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