मंगलवार, 25 अगस्त 2009

काश, मैं जख्मों को खरीद सकता

अभी कल ही की बात है
ऑफिस से निकला ही था
दिमाग में कुछ हलचल सी थी
मन व्यथित सा था
आंखों में चुभन थी
दिनभर के काम की
सब कुछ तो ठीक था
लेकिन फिर भी
पता नहीं वो कौन सी बात थी
जो टीस दे रही थी।
अजीब सी उदासी
अजीब सा मौसम
न जाने क्या होने वाला था।
कि अनायास ही नज़र
एक वृद्धा पर पड़ती है
उसकी गोद में एक नवजात था
जो दर्द से तड़प रहा था, शायद
ये दर्द किस बात का था
नहीं जानता
शादय वो भूखा था
कई रोज़ से
और वैसी ही भूखी उसकी दादी
एक कोने में बैठे वो लोग
किसी के इंतजार में थे
शायद किसी अपने के
लेकिन अब जो मैने देखा
वो विचलित कर सकता था
किसी को भी
उस नवजात के शरीर से खून रिस रहा था
उसकी दादी बार-बार
अपने चीथड़ों से
उसके ज़ख्मों को पोछ रही थी
शरीर पर उसके कपड़ा सिर्फ इतना था
कि बमुश्किल ही
अपनी लज्जा को आड़ दे पा रही थी
लेकिन किसी बच्चे को इतना लाड़
शायद मैने पहली बार देखा था।
वो बच्चा तो सिर्फ
चीख ही रहा था
दर्द की कराहट
उसके पेट में मौजूद पानी को भी सोख चुकी थी
अब उसके जख्मों की आवाज़
भरभरा उठी थी
मैं मजबूर था, बेबस था।
क्योंकि न तो मेरे पास इतना पैसा ही था
और न ही इतना ररुख
कि अनजान शहर में
काश, मैं उसके ज़ख्मों को खरीद पाता।

रविवार, 16 अगस्त 2009

अनोखा सफर और वो हाइटेक बाबा

कुछ ही दिन पहले की बात है। नोएडा से गृहनगर लौट रहा था । चुनावों में सारी बसें लगी होने के कारण ट्रेन में काफी भीड़ चल रही थी बीते दिनों। मैं लखनऊ मेल में गाजियाबाद से बैठा। उस दिन भी ट्रेन में भयंकर भीड़ थी। लेकिन एक डिब्बा खाली था। दरअसल ये वो वाला डिब्बा था, जिसमें सामान वगैरा रखा जाता है। वो डिब्बा बंद था । मैने खटखटाया, तो अंदर बैठे एक बाबा ने खोला । वो बाबा अकेले ही उस डिब्बे में सवार हो लिए थे । ऐसा मालूम होता था। क्योंकि अंदर से बंद करने का मतलब तो यही जान पड़ता था कि वो किसी औऱ को जगह नहीं देना चाहते थे। मेरा उस दिन भाग्य अच्छा था जो बाबा ने अंदर से दरवाजा खोल दिया। वरना उस दिन तो मेरी ट्रेन छूट ही जाती । क्योंकि इतनी भीड़ में किसी डिब्बे घुसना युद्ध करने के समान था। खैर मैं उस सामान वाले डिब्बे में बैठ गया। और दरवाजा बंद कर लिया। क्योंकि बाबा ने कहा, बेटा दरवाजा बंद कर लो वरना और लोग घुस आएंगे। ट्रेन जैसे ही स्टेशन पार करेगी तब दरवाजा खोल लेना। महज दो मिनट ठहरने के बाद ट्रेन को हरी बत्ती का इशारा मिला । और वो चल दी, मेरे गंतव्य की ओर। धीमे धीमे ट्रेन रफ्तार पकड़ रही थी। मैने स्टेशन पार होते ही दरवाजा खोल दिया । ठंडी हवा अंदर आ रही थी। मैने बैग से निकाल कर चादर बिछा ली। और लेट गया । ट्रेन अपनी रफ्तार पकड़ चुकी थी।
और यहीं से शुरु होती है, उस बाबा की कहानी। बाबा मेरे पास ही बैठे थे। लेकिन पहले बाबा की काया का वर्णन करना जरुरी है। उम्र लगभग 75 की रही होगी। कद करीब 5 फुट 11 इंच। बाल जैसे कपास की खेती। माथा बिना प्रेस का कपड़ा। और दोनो गाल स्रंग गर्त से नज़र आते थे। मुंह में दो दांत ही थे शायद, जो उनकी बत्तीसी के इतिहास की गवाही चीख चीख कर दे रहे थे। वो दांत अब शायद खाने के भी थे और दिखाने के भी। बदन को ढंकने के लिए एक सूती कुर्ता था। लगता था उस कुर्ते ने काफी दिनों से निरमा नहीं खाया होगा। लेकिन जो धोती उन्होंने पहन रखी थी वो काफी उजली थी। लगता था उसे रिन सुप्रीम का भोग लगाया गया हो।
खैर ये तो था बाबा की हैल्थ का एक छोटा सा परिचय। अब कुछ दिलचस्प बातें। कुछ देर बाद बाबा ने अपनी जेब से दूरभाष यंत्र निकाला। लग रहा था किसी से बात करने के मूड में हैं। लेकिन मजा तो तब आया जब बाबा ने उस बड़े से दिख रहे मोबाइल को चलाने के लिए स्टिक का प्रयोग किया। अब आप ही अनुमान लगाइये कि सीन क्या रहा होगा। बाबा बैठे हैं ट्रेन में और मिला रहे हैं किसी अपने का नंबर।वो भी स्टिक से। इस बीच मुझे ये पता लगा कि बाबा के पास जो मोबाइल था वो एचटीसी का था। लेकिन बाबा तो जैसे उस मोबाइल से बड़े फैमिलियर थे।
अब वो नंबर मिल चुका था जिससे बाबा बात करना चाहते हैं। पहली दुआ सलाम से ये पता लग चुका था कि डायल्ड नंबर उनके घर का है। बात शुरु होती है। हैलो के उच्चारण के साथ । उधर से पॉजिटिव रिस्पॉन्स मिलने के बाद बाबा ने हा बहू हम ट्रेन मा बैइठि गए हैं। औ सुबह तक शइजहांपुर पहुंचि जइहीं। बाबा अपनी लोकल लैंग्वैज में बात कर रहे थे। बात जारी है फोन पर। हाल चाल लिए जा रहे हैं। ऐसा लग रहा था कि काफी दिनों बाद घर वापस जा रहे है। बहू जा बताबऊ कि छुट्टन की तबियत हरी भइ की नाई। अभी नाई पिता जी । शायद कुछ ऐसा ही जवाब आया था बहू की तरफ से । क्योंकि बाबा के चेहरे पर छुट्टन की तवियत को लेकर उदासी के भाव थे। इस बीच फोन बहू ने किसी और को दे दिया। उधर से मर्दानी ध्वनि सुनाई दे रही थी। पाइं लागूं पिता जी । जीते रहऊ बाबा की तरफ से आशीर्वाद के रुप में। दुकान ठीक चलि रही हअइ कि नाइ। हां ठीकइ चलि रई हइ। पिता जी कब लऊ आइ रए। भुरारे पहुंचि जइहीं, बाबा का जवाब था ये बेटे के पूछे जाने पर। बात करते करते 20 मिनट हो चले थे। लेकिन बाबा तो लगता फुल चार्ज थे । फोन रखने का नाम ही नहीं ले रहे थे। लेकिन इस बीच ये फोन रखने की नौबत तब आई जब सिगनल चले गए । और फोन अचानक ही कट गया । बाबा का चेहरा देखने वाला था उस समय दूरभाष मिनिस्ट्री को सैकड़ों खरी खोटी सुना दी। ससुरे पता नाइ का करत हइं। पइसा निरो लइ लेत सरकार से अऊ टाबर कहूं नाइ लगाउत। बात ससुरी बीचइ मा कटि जात। खैर इस बीच सिगनल फिर आ जाते हैं। और उनका बेटा उधर से ही फोन मिला देता है। उनके फोन पर जो गाना बज रहा था। वो था ‘आए हो मेरी जिंदगी में तुम बहार बनके’। मेरी हंसी चरम पर थी। भइ कमाल के बाबा हैं। क्या गाना लगा रखा है। कब्र में पैर लटके हैं और अभी भी किसी के इंतजार में जवान बने रहने की चाहत है।
बाबा और बेटे की बात फिर शुरु हो जाती है। लेकिन अभी भी वही हाल चाल पर ही बात हो रही है। बातचीत का ये सिलसिला दस मिनट तक चला होगा। बाबा बोले अइसो करऊ अब रक्खि देऊ फोन। रोमिंग लगि रही हइ। हमारो भी कटि रहो। और तुम्हारो भी पइसा कटि रहो। फायदा कोई नाइ। इस बीच एक बार फिर बाबा ने दूरभाष मंत्रालय को गरिया दिया। फोन पर बाबा ने इतिश्री कर दी।
अब चालू होता है फोन से फोटो लेने का सिलसिला। मन ही मन हंसी आ रही थी मुझे। बाबा के हाथ उस स्टिक से इतने फैमिलियर थे कि पूछिए मत। धड़ाधड़ फ्रेम बनाकर बाबा ने बीस पच्चिस फोटो खींच डालीं। साथ ही बना डाली रास्ते में पड़ने वाले स्टेशनों की वीडियो भी। फोटो खींचते-खींचते और वीडियो बनाते-बनाते बाबा बोर हो चुके थे, तो अब बारी थी । गाने सुनने की। बाबा ने मीडिया प्लेयर खोला और कइ सारे गानों को एक साथ उस स्टिक के माध्यम से सेव कर लिया। मैने सोचा बाबा पुराने जमाने के हैं। तो कुछ पुराने गाने ही सुनेंगे। लेकिन जो गाने उन्होंने सुने वो उनकी जवानी का इतिहास बताने के लिए काफी थे। कि बाबा ने अपनी जवानी के समय खूब गुल खिलाए होंगे। जो गाने मैने उनके मोबाइल पर सुने वो थे। फूलों सा चेहरा तेरा कलियों से मुस्कान है, परदेसी परदेसी जाना नहीं मुझे छोड़ के, दिल धड़के मेरा दिल धड़के कोई नहीं जाने बाबा क्यों धड़के (बाबा सहगल की अलबम वाला गाना था ये), कुल मिलाकर जो भी गाने बजाए जा रहे थे, वो प्यार मोहब्बत से लबरेज़ थे। और ये चित्रहार का सिलसिला अगले तीन घंटे तक चलता रहा । ट्रेन भी बरेली पहुंचने वाली थी। जहां से मेरा घर शाहजहांपुर मजह 70 किलोमीटर ही था।
चूंकि बाबा जानी को हमारे ही डेश्टिनेशन पर उतरना था। सो बस अब दोनो को शायद इसी बात का इंतजार था कि कब शाहजहांपुर आए। सुबह के पांच बजने वाले थे, उस दिन लखनऊ मेल कुछ धीमी थी, शायद तभी पांच बजे तक बरेली ही पहुंची थी। लेकिन बतोलेबाज बाबा के चक्कर में सफर का पता ही नहीं चला । सचमुच मेरे लिए ये सफर अनोखा था।

शनिवार, 15 अगस्त 2009

मैं हिंदुस्तान हूं

मैं हिंदुस्तान हूं
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
इन सबकी शान हूं
मैं हिंदुस्तान हूं
मेरी धरा ही, मेरी मां है
मेरी अपनी भारत मां
खून से सींची इस धरती पर
नाज़ मुझे हर दम रहता
इस मिट्टी में जन्मे जो
है गर्व उसे हर पल रहता
एक टीस मुझे जब-तब रहती
जब गुलाम भारत था मैं
उखड़ी सांसे
मां की तड़पन
और तड़प, हिंदुस्तां की
याद रहेगी हर पल मुझको
उनकी उस कुर्बानी की
दगती तोप, चली थी गोली
भारत मां की छाती पर
सिसक, सिसक
हर कोई रोता
अपनी मां के आंचल पर

मंगलवार, 4 अगस्त 2009

सफ़र

उस आने वाली बारिश की बूंदो ने
हवा को, श्रंगार का अहसास कराया।
घर की कुछ यादों का,
दोस्तों की चटपटी बातों का,
और मां के दुलार का,
मन को बहुत कुछ याद आया,
उस सफ़र में।
छुक-छुक दौड़ रही थी गाड़ी
मेरे घर की ओर।
खेतों को सहलाती पवन,
खेल रही थी,
खेल कुछ और।
काली घटाओं से,
आच्छादित था अंबर,
शायद बारिश ही आने वाली थी।
वो शीतल समीर,
तन के हर हिस्से पर,
मरहम लगा रही थी।
मरहम, उस अकेलेपन पर,
जो उस सफ़र में,
दर्द बनकर कचोट रहा था।
याद दिला रहा था,
बीते हुए वक्त को
गोधुली बेला में, धूल के गुबार,
शांत पड़ने लगे थे,
रिमझिम फुहार सी, गिरने जो लगी थी,
आंचल फैलाई बारिश
सोंधी मिट्टी की खुशबू को
आगोश में लेने लगी थी।
खेतों के किनारे
उस माटी की मढ़इया से
कुछ आंखें, आकाश की ओर, निहार रहीं थीं
इस आस में,
कि और बारिश हो।
और बारिश होती भी रही
उस पूरे सफ़र भर।
लेकिन प्रकृति की माया अजीब है
कहीं धरा प्यासी है
तो कही जलजला है
नियति का खेल ही ऐसा है
कि ज़िदगी के सफ़र में
हर ख्वाहिश अधूरी है
और हर अधूरी, ख्वाहिश
जहां खुशी है
वहीं गम भी
और इनको जीने वाला
एक अच्छा हमसफ़र है...

शनिवार, 4 जुलाई 2009

वाह रे “वरुण पुराण”

गरुड़ पुराण के बारे में तो सबने सुन रखा होगा। ये 19 हजार श्लोकों का एक ऐसा पुलिंदा, जिसकी जरुरत तब पड़ती है। जब किसी की मृत्यु हो जाती है। तथाकथित जिस व्यक्ति की मृत्यु होती होती है, उसकी आत्मा को शांति प्रदान करने के लिए इस पुथन्ने का पाठ किया जाता है। घर के सभी सदस्यों के बीच कदाचित् राधे महाराज जैसे ही कुछ ज्ञाता इसका पाठ पढ़ते हैं।
ये तो रही बात गरुड़ पुराण की, लेकिन हाल ही में लॉंच हुआ वरुण पुराण बीजेपी का एक ऐसा एडीशन है, जिसकी प्रति आम चुनावों से पहले बेतरतीब बिकी। खूब ढोल बजा पुराण-ए-वरुण का। युवा पीढी़ को लीड करने वाले जवां गांधी की कारगुजारी खूब पसंद की जा रही थी। और पार्टी के आला अफसर भी उस जश्न में शामिल थे। सबको विश्वास था कि चुनाव बाद वरुण पुराण पार्टी की आत्मा को शांति देगा। यानि पार्टी, सबको चित कर विजय श्री हासिल करेगी। लेकिन क्या हुआ इसका ज़िक्र कुछ देर बाद किया जाए तो बेहतर होगा। उससे पहले ये जान लेना जरूरी है कि आखिर ये गरुड़ ....मेरा मतलब है वरुण पुराण है क्या ?
सात मार्च 2009 की ही बात है। जब पीलीभीत में आम जनता को संबोधित करते हुए वरुण गांधी के मुंह से ऐसे श्लोक निकले जो वरुण पुराण के लिए पहला पन्ना बने, इसके के बाद आठ मार्च को भी ऐसा ही हुआ। यहां भी पीलीभीत के बरखेड़ा गांव में वरुण आग उगलते नज़र आए। और ये आग थी वरुण पुराण का बाकी हिस्सा पूरा करने के लिए।
सबसे पहले पढ़वाते हैं पुराण के कुछ अंश। अगर कोई हिंदुओं की ओर हाथ बढ़ाता है, या फिर ये सोचता हो कि हिंदू नेतृत्वविहीन हैं, तो मैं गीता की कसम खाकर कहता हूँ, कि मैं उस हाथ को काट डालूंगा."। इन संवादों की आत्मा फिल्मों से प्रेरित है। ऐसा जान पड़ता है। क्योंकि अगर किसी सिनेमा में ये संवाद बोले जाते, तो ताबड़तोड़ तालियां पीटी जातीं। और गदर एक प्रेम कथा याद आ जाती।
अब कुछ अगले पन्नों के अंश। अपना लिखित वक्तव्य पढ़ते हुए उन्होंने कहा, "मैं एक गांधी हूँ और एक भारतीय हूँ और समान रुप से एक हिंदू हूँ." "मुझे अपने हिंदू होने पर गर्व है."राजनीतिक षड्यंत्र का आरोप लगाते हुए उन्होंने कहा, "यह मुझे सांप्रदायिक साबित करने की दुर्भावनापूर्ण कोशिश है." उन्होंने कहा, "मैं किसी संप्रदाय के ख़िलाफ़ नहीं हूँ.", "मैंने जो कुछ कहा उसका उद्देश्य किसी को भड़काना नहीं था. मेरे किसी भी संप्रदाय के ख़िलाफ़ होने का सवाल ही नहीं है. मेरी कोशिश एक ऐसे समुदाय के भीतर आत्मविश्वास पैदा करने की थी जो यह महसूस करती है कि वह अपने ही देश में बंधक है."
ये थे वरुण पुराण में लिखे गए लीपा-पोती के कुछ अंश । जो सबको बखूबी याद है। है कमाल की बात तो ये है की जिस गरुड़ पुराण की जरुरत हम सबको हमारी मौत के बाद पड़नी है उसका एक भी श्लोक हमें याद नहीं। लेकिन वरुण पुराण का हर एक श्लोक आत्मा तक में बस गया है। और वरुण पुराण की टीआरपी के तो क्या कहने । सारे चैनल पांच में से पांच सितारे ही दे रहे थे । इस फायरब्रांड युवा को । यानि एक दम मसाला पुराण बन गया था वरुण पुराण।
कुछ ऐसे भी थे जो बीजेपी के इस एडीशन के विरोध में थे । जाहिर सी बात है पहला नाम या तो बहिन जी का होता या कांग्रेस का । सो बहिन जी ने इस पुराण को सेंसर्ड कर दिया । पुराण को ए ग्रेड का सर्टिफिकेट गिफ्ट किया गया। यानि रासुका लगवा दी । पुराण को बक्से में बंद करवा दिया। मतलब वरुण को मखमल के बिस्तर से एटा जेल के दर्शन करवा दिए। जो अब तक शाही पनीर और कड़ाही पनीर खाते थे अब लौकी तोरई खाने को मजबूर थे। भई अब जेल के मोहनभोग तो ऐसे ही होते हैं। और ऐसे ही बहिन जी ने अपनी सारी खुन्नस निकाल ली। तो वहीं लालटेन के लाल बोले कि मैं इस पुराण रचयिता पर बुल्डोजर ही चलवा देता।
पुराण के विरोध जारी थे । लेकिन वरुण की टीआरपी नंबर बना रही थी। और बीजेपी को इसी पुराण की रचना के साथ ही मिला था। एक ऐसा नेता जो मोदी पुराण माना जा सकता था । जिसे संज्ञा भी दे डाली गई जूनियर मोदी पुराण की। बीजेपी के लिए तो ये भागते भूत की लंगोटी से कम न थी। आस थी की शायद यही लंगोटी यमुना पार लगा दे। सबको भरोसा था उस भड़काऊ पुराण पर, कि हमारे कुंवर साब खुद तो जीतेंगे ही, साथ साथ ही पार्टी की भी नैया पार लगा देंगे।
चुनाव से ठीक पहले वरुण को जमानत मिली। तो उनकी और जय-जय कार होने लगी। चहुंओर सिर्फ एक ही एक ही गूंज ही वरुण पुराण की। लेकिन पुराण रचयिता के मामा जो पीलीभीत में अच्छा खासा रसूख रखते थे। इस बार भी पुराने ढर्रे पर थे। मतलब उनका चुनावी बिगुल वरुण पुराण के खिलाफ फूंका गया था।
रिजल्ट आ गए। कोई जीता, कोई हारा। यहां भी वरुण बाबा की जीत हुई लेकिन वरुण पुराण हार गया । जिस सोच को लेकर इस पुराण को रचा गया । वो पार्टी के लिए एक छद्म साबित हुआ। और बीजेपी औंधे मुंह धड़ाम हो गई। अब सबके निशाने पर एक बार फिर वरुण पुराण ही था। कहा गया इसकी रचना ही गलत हुई। चुनाव से ठीक पहले जो बीजेपी के इस एडीशन को कंठस्य कर लेना चाहते थे, वही अब वरुण पुराण पर लाठी भांजने को उतारू थे। लेकिन कुछ भी हो पार्टी भले ही यमुना पार न लग पाई। लेकिन वरुण पहली बार संसद पहुंच कर अपने पुराण के लीड हीरो जरुर बन गई। वाह रे “वरुण पुराण” बीजेपी की आत्मा को कष्ट पहुंचाने के लिए।

बुधवार, 24 जून 2009

शराबनामा और दवानामा

दवा और दारु का संग बड़ा पुराना है। ज्यादा सुरा पान के बाद दवा पान की ही जरुरत पड़ती है। जिसने मधुपान नहीं किया वो जीवन के एक सुख से वंचित रह गया। ऐसा मैं नहीं कहता, पीने वाले खिलाड़ापीर कहते है। आरजू बानो कहती है कि पीना बहुत ज़रूरी है जीने के वास्ते। बचपन की कच्ची माटी में ये दर्शन गहरे पैठ बना बैठा। और बस, तब से ये सिलसिला बरबस ही जारी है, उनका। उनके लिए तो बस पीना बहुत जरुरी है जीने के वास्ते।
इस बार सूर्य देवता काफी कोपित नज़र आ रहे हैं। सो कोपभाजन हमें और आप को ही सहना पड़ रहा है। ऑफिस निकलने से पहले दस बार सोचना पड़ता है। और सोचते सोचते दोपहर 2 बजे की शिफ्ट में कब शाम के पांच बज जाते हैं। पता ही नहीं चलता। लेकिन उस समय भी नोएडा समेत पूरे एनसीआर में धूप दहाड़ें मारती नज़र आती है। किसी सिंह की तरह। अब शरीर के वो अंग काले पड़ चुके हैं। जिनपर कपड़ालत्ता नहीं होता। बेचारे इस भरी दोपहर में छिपकली से हो गए हैं।
लगभग पिछले सात आठ महिनों से एक ही रुट से ऑफिस जाना हो रहा है। सो जाहिर सी बात है जाने पहचाने चेहरे ही दीदार के लिए मिलते हैं। ऐसे ही कुछ मिलते हैं वो जिनके लिए पीना बहुत जरुरी है जीने के वास्ते। फिर चाहे गर्मी हो या सर्दी उन्हें तो एक घूंट में डकारनी है। बगैर डकार मारे। यानि मदिरा पान के लिए उनके मध्यप्रदेश (उदर) में काफी जगह है। साइड डिश के नाम पर वे हाजमोला से ही काम चला लेते हैं। एक हाजमोला में कब बोतल खत्म हो जाती है पता ही नहीं चलता । उसके बाद इस बदन जलाऊ गर्मी में वो जहां के तहां पड़े रहते हैं। न किसी के आने का पता न किसी के जाने का पता। बस अपनी ही धुन में रमें हैं।
चलिए अब आप को एक और जगह लेकर चलते हैं। ये वो जगह है जिसने मुझे ये ब्लॉग लिखने को प्रेरित किया। दिल्ली में एक जगह है जिसका नाम है कोंडली। मुझे एटीएम से गांधी बाबा निकालने थे सो वहां रुकना पड़ा। टेलर मशीन पर काफी संख्या में लोग मौजूद थे। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर बैंक ऑफ बड़ौदा के एटीएम पर इतनी भीड़ कैसे । क्या दिल्ली के सारे एटीएम रिक्त हो चले हैं। खैर मैं इधर-उधर फंटियाने लगा और अपनी बारी का इंतजार करने लगा।
एटीएम के ठीक पीछे जाने पर पता चलता है। कि मदिरालय के ठीक बगल में औषधालय है। अकस्तमात् ही मुख उवाच् उठा। बहुत सुंदर। मतलब एक तरफ दवा तो दूसरी तरफ दारु। वाह भई वाह । मदिरालय भी भरा हुआ। औषधालय भी । दोनो दुकानों पर भीड़ जबरदस्त थी। लोग दारु की दुकान से चवन्नी, अठन्नी खरीदते और फौरन औषधालय पहुंच जाते । दरअसल वो दवा की दुकान अब बन चुकी थी। दारु के बाद का सामान। प्लास्टिक के ग्लास, कुरकुरे, भुजिया, चिप्स, सिगरेट सब कुछ मौजूद था उस दुकान पर। ये तो सब मिल ही रहा था। साथ ही मिल रहा था। पीने वालों के दर्द दूर करने का सामान। यानि आफ्टर ड्रिंक। ताकि वहां से टल्ली होने के बाद लोग सही सलामत घर पहुंच सकें। कुछ लोग उस दुकान से वो दवाएं भी ले रहे थे जिससे उल्टी, सीधी हो जाए। यानि उल्टी निवारक दवा। देखते ही देखते भीड़ बढ़ने लगी। क्योंकि जैसे जैसे रात के दस बज रहे थे लोगों के मन में मदिरालय जाने का भूत कुलबुलाने लगता। वरना नोएडा से महंगी शराब जो खरीदनी पड़ती। इस होड़ में कोई पीछे नहीं रहना चाहता। साम, दाम, दंड, भेद सबका इस्तेमाल करके लोग मैदान मार कर ही औषधालय तक पहुंचते।
मन ही मन बुजुर्गों का वो संवाद याद आ रहा था। कि यदा कदा लोग कह दिया करते थे। कि और भई दवा दारु सब ठीक चल रहा है न। और मैं भी कह देता था। सब कुशल मंगल। हाए री संजीवनी बूटी की वो दुकान। अगर बजरंग बली होते तो बड़ा गुस्सा करते। लेकिन मुझे तो सब कुछ कॉमेडी ही लग रहा था । इसलिए लिख दिया। अगर आपको भी शराबनामे से दवानामे तक का ये निराला सफर तय करना है तो एक बार बॉब के उस एटीएम तक जरुर जाएं। आशा करता हूं सब कुछ वैसा ही होगा जैसा मैने देखा।

शुक्रवार, 5 जून 2009

मत काटो मेरे यौवन को

मैं हूं एक वृक्ष
देता हूं लोगों को छांव
मुझपर बसते हैं पंछी
बनाकर अपना गांव
चाह नहीं मेरी कुछ भी है
सिर्फ चाहता हरियाली
सर्दी, गर्मी हर मौसम में
मेरा जीवन खुशहाली
लेकिन एक दर्द है मुझको
मत काटो मेरे यौवन को
इतना अहसान करो मुझ पर भी
बख्शो मेरे जीवन को
(पर्यावरण दिवस पर समर्पित ये चंद पंक्तियां, वृक्षों को बचाने की एक पहल है, इस मुहिम में सभी का स्वागत है)