बुधवार, 24 जून 2009

शराबनामा और दवानामा

दवा और दारु का संग बड़ा पुराना है। ज्यादा सुरा पान के बाद दवा पान की ही जरुरत पड़ती है। जिसने मधुपान नहीं किया वो जीवन के एक सुख से वंचित रह गया। ऐसा मैं नहीं कहता, पीने वाले खिलाड़ापीर कहते है। आरजू बानो कहती है कि पीना बहुत ज़रूरी है जीने के वास्ते। बचपन की कच्ची माटी में ये दर्शन गहरे पैठ बना बैठा। और बस, तब से ये सिलसिला बरबस ही जारी है, उनका। उनके लिए तो बस पीना बहुत जरुरी है जीने के वास्ते।
इस बार सूर्य देवता काफी कोपित नज़र आ रहे हैं। सो कोपभाजन हमें और आप को ही सहना पड़ रहा है। ऑफिस निकलने से पहले दस बार सोचना पड़ता है। और सोचते सोचते दोपहर 2 बजे की शिफ्ट में कब शाम के पांच बज जाते हैं। पता ही नहीं चलता। लेकिन उस समय भी नोएडा समेत पूरे एनसीआर में धूप दहाड़ें मारती नज़र आती है। किसी सिंह की तरह। अब शरीर के वो अंग काले पड़ चुके हैं। जिनपर कपड़ालत्ता नहीं होता। बेचारे इस भरी दोपहर में छिपकली से हो गए हैं।
लगभग पिछले सात आठ महिनों से एक ही रुट से ऑफिस जाना हो रहा है। सो जाहिर सी बात है जाने पहचाने चेहरे ही दीदार के लिए मिलते हैं। ऐसे ही कुछ मिलते हैं वो जिनके लिए पीना बहुत जरुरी है जीने के वास्ते। फिर चाहे गर्मी हो या सर्दी उन्हें तो एक घूंट में डकारनी है। बगैर डकार मारे। यानि मदिरा पान के लिए उनके मध्यप्रदेश (उदर) में काफी जगह है। साइड डिश के नाम पर वे हाजमोला से ही काम चला लेते हैं। एक हाजमोला में कब बोतल खत्म हो जाती है पता ही नहीं चलता । उसके बाद इस बदन जलाऊ गर्मी में वो जहां के तहां पड़े रहते हैं। न किसी के आने का पता न किसी के जाने का पता। बस अपनी ही धुन में रमें हैं।
चलिए अब आप को एक और जगह लेकर चलते हैं। ये वो जगह है जिसने मुझे ये ब्लॉग लिखने को प्रेरित किया। दिल्ली में एक जगह है जिसका नाम है कोंडली। मुझे एटीएम से गांधी बाबा निकालने थे सो वहां रुकना पड़ा। टेलर मशीन पर काफी संख्या में लोग मौजूद थे। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर बैंक ऑफ बड़ौदा के एटीएम पर इतनी भीड़ कैसे । क्या दिल्ली के सारे एटीएम रिक्त हो चले हैं। खैर मैं इधर-उधर फंटियाने लगा और अपनी बारी का इंतजार करने लगा।
एटीएम के ठीक पीछे जाने पर पता चलता है। कि मदिरालय के ठीक बगल में औषधालय है। अकस्तमात् ही मुख उवाच् उठा। बहुत सुंदर। मतलब एक तरफ दवा तो दूसरी तरफ दारु। वाह भई वाह । मदिरालय भी भरा हुआ। औषधालय भी । दोनो दुकानों पर भीड़ जबरदस्त थी। लोग दारु की दुकान से चवन्नी, अठन्नी खरीदते और फौरन औषधालय पहुंच जाते । दरअसल वो दवा की दुकान अब बन चुकी थी। दारु के बाद का सामान। प्लास्टिक के ग्लास, कुरकुरे, भुजिया, चिप्स, सिगरेट सब कुछ मौजूद था उस दुकान पर। ये तो सब मिल ही रहा था। साथ ही मिल रहा था। पीने वालों के दर्द दूर करने का सामान। यानि आफ्टर ड्रिंक। ताकि वहां से टल्ली होने के बाद लोग सही सलामत घर पहुंच सकें। कुछ लोग उस दुकान से वो दवाएं भी ले रहे थे जिससे उल्टी, सीधी हो जाए। यानि उल्टी निवारक दवा। देखते ही देखते भीड़ बढ़ने लगी। क्योंकि जैसे जैसे रात के दस बज रहे थे लोगों के मन में मदिरालय जाने का भूत कुलबुलाने लगता। वरना नोएडा से महंगी शराब जो खरीदनी पड़ती। इस होड़ में कोई पीछे नहीं रहना चाहता। साम, दाम, दंड, भेद सबका इस्तेमाल करके लोग मैदान मार कर ही औषधालय तक पहुंचते।
मन ही मन बुजुर्गों का वो संवाद याद आ रहा था। कि यदा कदा लोग कह दिया करते थे। कि और भई दवा दारु सब ठीक चल रहा है न। और मैं भी कह देता था। सब कुशल मंगल। हाए री संजीवनी बूटी की वो दुकान। अगर बजरंग बली होते तो बड़ा गुस्सा करते। लेकिन मुझे तो सब कुछ कॉमेडी ही लग रहा था । इसलिए लिख दिया। अगर आपको भी शराबनामे से दवानामे तक का ये निराला सफर तय करना है तो एक बार बॉब के उस एटीएम तक जरुर जाएं। आशा करता हूं सब कुछ वैसा ही होगा जैसा मैने देखा।

शुक्रवार, 5 जून 2009

मत काटो मेरे यौवन को

मैं हूं एक वृक्ष
देता हूं लोगों को छांव
मुझपर बसते हैं पंछी
बनाकर अपना गांव
चाह नहीं मेरी कुछ भी है
सिर्फ चाहता हरियाली
सर्दी, गर्मी हर मौसम में
मेरा जीवन खुशहाली
लेकिन एक दर्द है मुझको
मत काटो मेरे यौवन को
इतना अहसान करो मुझ पर भी
बख्शो मेरे जीवन को
(पर्यावरण दिवस पर समर्पित ये चंद पंक्तियां, वृक्षों को बचाने की एक पहल है, इस मुहिम में सभी का स्वागत है)

मंगलवार, 26 मई 2009

वो चीफ प्रॉक्टर और वो चचेरा भाई

एक बार चीफ प्रॉक्टर ने विद्यालय में लगाया राउंड
लंबा था ग्राउंड
हाथ में डंडा
शक्ल से पंडा
रोबीला चेहरा देखकर
बच्चे सकपकाए
दौड़कर अपनी कक्षाओं में आए
किसी कक्षा में
कुछ बच्चे शोर कर रहे थे
और गालियों से अलंकृत कर रहे थे
चीफ प्रॉक्टर को गुस्सा आया
डंडा हिलाते हुए धमकाया
कि बोलो ये कुर्सियां किसने तोड़ीं
इस लड़के की खोपड़ी किसने फोड़ी
एक लड़का सीट पर तमतमा कर खड़ा हुआ
और बोला
गरुजी, डोनेशन चुकाया है
सीट पर बैठूंगा
अभी तो सर ही तोड़ा है
हाथ पैर तोड़ूगां
उस लड़के की उद्दंडता के पीछे कुछ राज़ था?
शायद किसी टीचर्स का ग्रुप उसके साथ था?
सभी टीचर्स चीफ प्रॉक्टर से खिन्न थे
उस छात्र की विलक्षण प्रतिभा के आगे प्रश्नचिन्ह थे?
एक बार चीफ प्रॉक्टर ने उस लड़के को
अपने ऑफिस में बुलाया
डंडा हिलाते हुए धमकाया
कि इस डंडे से सभी घबराते हैं
और प्रधानाचार्य जी थर्राते हैं
कि इस डंडे से सभी घबराते हैं
प्रधानाचार्य जी थर्राते हैं
लड़के ने हिम्मत दिखाई
ऑफिस में गोली चलाई
फायर हवाई था
वो और कोई नहीं
प्रधानाचार्य जी का चचेरा भाई था....
(नोट –ये कविता सत्य घटनाओं पर आधारित है)

शुक्रवार, 1 मई 2009

सत्यानासी काशी निवासी

प्रस्तुत होने वाली पंक्तियां मेरे पड़ोसी बर्बाद गुलिस्तां की पंडिताई से अवतरित हैं(नोट-बर्बाद गुलिस्तां माने पंडित का घर)। ये कहानी श्री-श्री 108 कदाचित् तामलोट लोटन प्रसाद सत्यानासी काशी निवासी पंडित राधेश्याम उपाध्याय की करतूतों से प्ररित होकर लिखी जा रही है। अपने आप को किसी की प्रेरणा का पात्र बनाने के लिए पंडित जी ने पूरे 60 बर्षों का कठोर तप किया है। किसी वन वगैरा में जाकर नहीं, बल्कि लोगों के घर में शादी से लेकर गरुण पुराण तक का इंतजाम कराने तक । कमाल के मैनेजर हैं पंडित जी। और वैसा ही कमाल की उनकी तोंद। जो उनकी पंडिताई के इतिहास की वीर गाथांएं सुनाती है। पेट का लंबा चौंड़ा घाट, कि जिस पर, बिछा लीजिए खाट। कुछ ऐसी ही सुंदर छवि है राधे महाराज की । नाम बेहद लंबा था पंडित जी का सो लोग उन्हें निकनेम से ही पुकारते हैं, जय हो राधे महाराज कहकर। अगर किसी को ज़ुबान दे दी तो कभी वापस नहीं ली, महाराज ने। बस पहुंच जाते हैं समय से एक घंटा पहले छप्पन भोग चटोरने। और अपने ज्ञान की गंगा बहाने। इस बार मैं उनसे पूरे एक साल बाद मिल रहा था। थोड़ा मैं भी बदल गया था । लेकिन वो कुछ ज्यादा ही बदल गए थे। इसलिए उनकी काया में थोड़ा संशोधन करके बता रहा हूं। पेट का लंबा चौंड़ा घाट कि जिस पर बिछा लीजिए एक बड़ी खाट। यानि पंडित जी की तोंद का साइज दिनों दिन तरक्की पर था। मंदी के दौर में जहां कॉरपोरेट जगत में पींगे लड़ाने वालों के गाल सूख चुके थे, वहीं पंडित जी के चेहरे पर बहार नज़र आ रही थी। पांच फिट सवा दो इंच लंबाई लिए पंडित जी जब फर्जी ज्ञान की गंगा बहाते । तो लोग उस बदबूमई गंगा स्नान करने से ना चूकते और तारीफों के पुल बांधने लगते और इस पल को देखते ही मेरा मन हमेशा की तरह बांकेलाल स्टाइल हो जाता(नोट-बाकेंलाल यानि कॉमेडी किंग, कॉमिक कैरेक्टर)। हाल ही की बात है एक विवाह समारोह में शिरकत करने आगरा गया था। फैमिली पंडित जी भी मौजूद थे। बरात चढ़ने से एक दिन पहले का समय था । दोपहर के 12 बजे होंगे। धूप उबाल मार रही थी। पसीना जलधारा बनकर निकल रहा था। इतने में शादी वाले घर पर राधे महाराज के कदम पड़ते हैं। अब पंडित जी पहले से ढाई गुना ज्यादा मोटे हो चुके थे और उनकी तोंद हमेशा की तरह गौरवमई इतिहास की गवाही दे रही थी। क्योंकि दरवाजे से अंदर जब वो आ रहे थे तो वो तो बाद में आए लेकिन उनका तोंद पहले घर में घुसकर अपनी प्रेजेंटेशन का अहसास करा चुकी थी।
जय हो राधे महाराज के संबोधन के साथ मैने उनका अभिवादन किया। जवाब भी मिला लेकिन अंजाना सा। शायद भूल चुके थे पंडित जी मुझ जैसे खुराफाती कैरेक्टर को । लेकिन मेरा ये सोचना गलत हो गया जब पंडित जी ने मुझे मेरे निकनेम से संबोधित कर कहा कि और नंदू भइया कइसे हौ ? कुशल मंगल महाराज। कुछ चाय पानी हो जाए क्या पंडित जी । मैने तो औपचारिकता मात्र पूछा था। लेकिन पंडित जी तो जैसे थाली चाटने को बेताब थे। बोले, भइया एक लोटा शीतल दूध ले आओ रुहआफजा डालकर। ओफ्फो आज तो लगता है आत्मा तृप्त करके ही दम लेंगे राधे महाराज। दूध प्रस्तुत किया गया । एक सांस में गटक गए पूरा एक लीटर दूध। ये तो शुरुआत थी क्योंकि अब तो भोजन भक्षण का खौफनाक आगाज होने वाला था। अरे ओ बड़े की बहू तनिक भोजन वोजन भी हो जाए। क्या लेंगे महाराज ? कुछ हल्का फुल्का जो बना हो वो ले आएं तो आनंदमंगल हो जाए। जी महाराज। भोजन के आते ही जुट पड़े राधे महाराज, ऐसा लग रहा था न जाने कितने जन्मों से भूखे हैं। जब खाने से छक गए तो अब बारी थी तोंद को तर करने की। पानी से कहां मानने वाले थे महाराज। कहा, बेटी अगर कुछ खीर जैसा बनाया हो तो दो वरना कोई बात नहीं। दरअसल पंडित जी को पूरा विश्वास था कि खीर बनी होगी। क्योंकि उनके पड़ोस में जो छोटा बच्चा खड़ा था उसका मुंह खीर की उपस्थिति की गवाही दे रहा था। और पंडित जी वो इतिहास पढ़ चुके थे। खैर उनकी वो मंशा भी पूरी हुई। और खीर से गले को तर किया गया। खाना खा चुके थे पंडित जी। अब बारी थी फलाहार की । मैं सोच रहा था कमाल की तोंद है इनकी कुछ पता ही नहीं चलता पता नहीं इतना खाना किस कोने में पहुंच गया। माया थी उनकी पंडिताई की जो बचपन से ही उनका पेट ज्यादा खाने की प्रैक्टिस में पारंगत था। इसी बीच फलाहार भी हुआ। बारी थी पूजा पाठ की जिसके लिए उन्हें अर्जेंट बुलाया गया था। वर पक्ष से दूल्हा तैयार था रस्मो रिवाज को। घर के आंगन में गड़े खंब के एक तरफ से राधे तो दूसरी तरफ थे भावी दूल्हा महाराज। और इन दोनो को घेरे हुए बैठी थी पूरी रिश्तेदार मंडली। पूजा पाठ आरंभ होता है (नोट-ये सारी रस्में शादी से एक दिन पहले की हैं) दूल्हे को प्रीपेयर करने के लिए पंडित जी पूरी तरह तैयार थे।
मंत्रोच्चार आरंभ होता है। ओइम गराणांत्वा गणपतिगोंगवा महे प्रियाणांत्वा प्रिय पति गोंगवा महे निधिनांत्वा निधिपति गोंगवा महे स्वाहा(स्पेलिंग मिस्टेक हो सकती है लेकिन मैं जैसा सुन रहा था वैसा ही लिख रहा हूं) । कलश के चारो ओर पान से जल प्रवाहित करें। दूल्हे से बोले राधे महाराज। और एक सौ एक रुपए भगवान के नाम चढा़ दें। दूल्हे की थाली में रखे हुए पैसों की ओर इशारा करते हुए हुए पंडित जी बोले । ओइम मंगलम भगवान विष्णु, मंगलम गरुणध्वजा, मंगलम पुंण्डरिकाछं, मंगलाय तर्णोहरि(स्पेलिंग मिस्टेक्स मे बी वो भी टू मच)। पुन: पैसे से भरी थाली की ओर इशारा करते हुए राधे महाराज ने 251 भगवान के नाम पर चढ़वा लिए। जैसे जैसे पंडित जी के वही रटे रटाए मंत्र बढ़ रहे थे। वैसे वैसे उनके ईश्वर अमीर होते जा रहे थे। लगभग बीस मिनट तक चले उस फर्जी मंत्रोच्चार ने भगवान को हजार पति तो बना ही दिया था। लेकिन दूल्हे महाराज बेफिक्र थे दनादन पैसों की बारिश कर रहे थे। आखिर जन्नत की सैर जो करने वाले थे कुछ ही घंटों बाद। उधर राधे महाराज पूजा समाप्त कर घर वापसी की तैयारी में थे। लेकिन उस बीस मिनट के पूजा सेशन में पंडित जी का पेट कुछ हल्का हो गया था। सो एक गिलास लस्सी की दरकार थी पंडित जी को। लस्सी का भी स्वाद चखा गया। और अब बारी थी पंडित जी की विदाई की । विदाई रस्म के अनुसार 501रु की तो बनती ही है। 501 रु लेकर ही माने काशीनिवासी राधे महाराज।
बारात वाला दिन। घर पर भीड़ बढ़ चुकी थी रिश्तेदारों की संख्या में ढ़ाई गुना इज़ाफा, घर पर तकरीबन अस्सी रिश्तेदार मौजूद थे। हर चीज़ के लिए अपनी बारी का इंतजार करना पड़ रहा था। चाहे बात फ्रेश ब्रश करने की हो, या फिर चाय नाश्ते की ही क्यों न हो। माहौल काफी कंजस्टेड हो चुका था। धीरे धीरे शाम हो चली थी। और बारात चढ़ने का समय करीब था।
मौका पाकर चौका मारने पंडित जी पधार चुके थे। इतने सारे रिश्तेदार देखकर पंडित जी की बांछें खिल गईं। मन ही मन जेब गरम करने के तरीके सोच रहे थे पंडित जी। आते ही आते रिश्ते में मेरे एक अंकल के हाथ टटोलने लगे। क्योंकि पिछली दफा उन्हीं अंकल से काशीनिवासी को बोनी हुई थी। मंशा इस बार भी कुछ ही थी । अरे जजमान इस बार तो आपके हाथ में एक नई रेखा जन्मी है। जो आने वाले 20 सालों तक आपके हाथ में राजयोग दिखा रही है। अंकल उनकी चालाकी से अंजान किंतु बेहद खुश। विदेश जाने का भी योग अतिशीघ्र बन रहा है। अंकल और खुश। पिछले 30 सालों से विदेश जाने की ही रट लगाए थे। हरबार पासपोर्ट और वीसा की दुहाई दिया करते थे। लेकिन इस बार तो पंडित जी ने उस पर हामी भी भर दी थी। और इस तरह पंडित जी की दिन की शुरुआत 251 रु से हो गई। देखा देखी में कई और लोग हाथ बढ़ाने लगे, फिर पंडित जी का वही पुराना प्रपंच शुरु हो जाता। मालूम हो कि कदाचित तामलोट महाराज लग्न मंडप में बैठने से पहले ही अपनी धोती काफी गरम कर चुके थे। जेब तो थी नहीं धोती में खूंट बांधकर पैसे रख रहे थे। खैर पुजापे का समय फिर चालू होता है। फर्जी ज्ञान के अंधकार में दिया जलाए बैठे पंडित जी पाल्थी मारकर मंडप में विराजमान होते हैं। वर-वधू तैयार हैं एक सात फेरे लेने के लिए और एक दूसरे को माला पहनाने के लिए। इतने में दूल्हे राजा के कानों में कुछ बुदबुदाने लगे पंडित जी। मैं समझ न पाया । लेकिन कुछ समय बाद दूल्हे के पिता की जेब से जो दान दक्षिणा बाहर आ रही थी। वो इस बात को चरितार्थ कर रही थी कि राधे महाराज ने क्या कहा होगा दूल्हे के कान में। कार्यक्रम आगे बढ़ता है। और वही पुराने मंत्रोच्चार जो एक दिन पहले मैं सुन चुका था । उन्ही की सीडी एक बार फिर रिपीट अवस्था में सुन रहा था। कई बार तो ऐसा होता कि न तो दूल्हे को मंत्र समझ आ रहे होते और न ही मुझे। पता नहीं कौन सी किताब पढ़ रहे हैं पंडित जी। सवालिया निशान तो बहुत सारे थे ।लेकिन टोकना उचित नहीं समझा। आखिर रिश्तेदार की शादी थी । गुस्से में कहीं उल्टे मंत्र पढ़ दिए तो पता नहीं क्या गजब हो जाए। और फिर दूल्हा ही जब इंटरफियर नहीं कर रहा तो मैं क्यों भांजी मारता। और हां एक बात तो बताना भूल ही गया इस बीच पंडित जी की करतूत जारी थी । वही बढ़ते मंत्र और बढ़ता पैसा। समय बीतता गया । पंडित जी का खूंट गर्म होता गया। अब तक तो लंबी चपत लगा चुके थे, सत्यानासी महाराज।
फेरों का कार्यक्रम समाप्त होता है। लेकिन पंडित जी का नहीं । वो वैसे ही जजमान नाम के एटीएम से गांधी जी बाहर निकालते रहे।
कहते हैं लालच बुरी बला है। लेकिन शायद सत्यानासी काशी निवासी पंडित राधेश्याम उपाध्याय के घर का नाम बर्बाद गुलिस्तां ऐसे ही थोड़े ही रखा था मैंने। क्योंकि उनके हालात भले ही सही हों लेकिन लोगों की हाय ले चुके महाराज की फैमिली में ऐसा कोई नहीं था जो समाज की ठेकेदारी न करता हो। सब एक से बढ़कर एक खुराफाती । पंडित जी कमाते थे और बीवी-बच्चे लुटाते थे। दूसरों को नोच-नोच कर प्लॉट बनाने वाले पंडित जी पता नहीं कब सुधरेंगे। ये तो नहीं कहा जा सकता लेकिन ये जरुर कहा जा सकता है। बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से खाए।
जो इतिहास काली स्याही से लिख दिया गया हो वो भला कैसे मिट सकता है। पंडित जी के साथ भी कुछ ऐसा ही था।

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

दइया रे दइया ‘बदल गई वो’

छरहरी काया, इठलाता बदन, बिल्कुल हिरणी के जैसा। आंखों में तीर सा चुभने वाला शार्प सा काजल, होंठों पर गुलाब की झलक। एक दम मादक सी हंसी। और उस पर गालों में पड़ने वाला भंवर। ओफ्फो एक अनूठी याद थी वो। लगता था कुदरत ने सारी फुरसत उसी पर उड़ेल दी हो। उसके बदन का हर एक पार्ट बड़े करीने से सजाया था खुदा ने। उस हूर का नूर कुछ ऐसा ही था। बस जहां से निकल जाए। हाएतौबा मच जाए। मार ही डालोगी, मर जांवा गुड़ खाके, मेरी दुकान पे आना मेरी जान, जैसे कमेंट उसे मिला करते थे । लेकिन उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता था। पता नहीं कौन सी मिट्टी से बनी थी। सबको कतार में ही रखती थी। किसी की सीट कंफर्म ना की उसने । और एक दिन न जाने कौन लंगूर उसे ले उड़ा। किसी को हवा तक न लगी। क्योंकि जिन गलियों से वो निकलती वहां से अब उसके बदन पर लगे इत्र की सुगंध भी न आती थी। कई दिन हो गए । लोग इंतज़ार करते करते थक गए। कि न जाने वो लाल दुपट्टे वाली कहां चली गई। उसी की राह तकते तकते छोटे की सात आठ चाय हो जाया करती थीं। लेकिन अब तो छोटे की दुकान भी सूनी सूनी रहती है। सब ऐसे उदास रहते जैसे उनकी अर्धांगिनी उन्हे किसी पराये मर्द के साथ भाग गई हो। पप्पू भइया तो उसके ग़म में ऐसे दीवाने हुए कि रामप्यारी का सेवन करने लगे। रात को जब उसका इंतजार करके घर लौट रहे होते तो कभी कभी हम लोग मिल जाया करते थे । बस शुरु हो जाती थी फ्रस्ट्रेटेड लवर की फ्रस्ट्रेटेड लव स्टोरी। यार वो चली गई। उसका इंतजार करते करते मेरे घर का बजट बिगड़ गया और वो है कि बिना बताए चली गई। हाय री बेवफा सनम। पप्पू की हालत देख कर एक जुमला बिल्कुल फिट बैठ रहा था। कि ‘पुतलियां पथरा गईं , और गर्क चहरा हो गया, डाल दो मुंह पर कफन, कह दो कि पर्दा हो गया’ । बेहद बुरे दौर से गुजर रहा था पप्पू। खैर रात गई बात गई। होली के आसपास की बात है। वो दिन हम सभी मित्रों को हमेशा याद रहेगा । सब रंग खेल रहे थे । छोटे की दुकान पर एक बार फिर जा पहुंचे । यादों को ताजा करने क्योंकि फिछली होली मैं भी घर नहीं जा पाया था। सो इस बार हम सब फिर साथ थे । पप्पू भी मौजूद थे। सब बेहद खुश थे। पुरानी यादें ताजा कर रहे थे। कि अचानक पड़ोस वाले मकान पर नज़र गई। उस मकान की छत पर लोग काफी लोग मौजूद थे। और उनके बीच मौजूद थी वो हुस्न ए बहार। शादी के बाद पता नहीं कब वापस आई। किसी को न पता चल पाया। सबकी निगाहें ऊपर ही थीं । टकटकी लगाए बस सारे के सारे छैला बिहारी निहारे चले जा रहे थे। इतने में वो नीचे उतर आई अपनी पुरानी सखियों के साथ। लेकिन जैसे ही वो नीचे आई। सबको झटका लगा। क्योंकि जिस हुस्न ने गली के 20 नौजवानों को मजनू बना दिया वो वो हूर कुछ और ही हो गया था। और अनायास ही पप्पू के मुंह से प्रस्फुटित हुआ ‘दइया रे दइया बदल गई वो’ । जिसकी जवानी के चर्चे चहुंओर से । वो शादी के बाद क्या हो गई। न तो वो छरहरी काया ही रही । न वो काजल । न वो गुलाब सी हंसी । सबकुछ मुरझाया सा लग रहा था। सब चकित थे । और एक दूसरे का मुंह ताक रहे थे। क्योंकि पहले तो उसकी त्वचा से उसकी उम्र का पता ही न चलता था । और अब है कि उम्र ही उम्र नज़र आती है। मेरा तो मन मान ही न रहा था । कभी मैदा की भेंड़ रही उस मनचली का रंग भी डाउन हो गया था। चूंकि पप्पू तो नशे में चूर था । और सब जानते हैं नशे में आदमी शेर होता है । किसी बात का डर नहीं होता। रोक ही लिया लड़की से आंटी हो चुकी श्रीमती जी को। एक ही सांस में सैकड़ों सवाल दाग डाले। और ये भी कह डाला हम से ही सेट हो जातीं तो क्या बिगड़ जाता । चली गईं लंगूर के पास। अब भला लंगूर की सोहबत में कोई इंसान रह सकता है क्या ? हीहीही....रामप्यारी का जोरदार भभका और फिर ये हंसी। और अचानक एक जोरदार साउंड। चांटा जड़ने का । बेचारे पप्पू का गाल हरे से गुलाबी हो गया। सब तितर-बितर हो गए उस एक विस्फोटक चांटे की बदौलत। लेकिन जिस चांटे का कहर पप्पू पर पड़ा। वो टस से मस न हुआ। नो डाउट ही वाज़ ए ब्रेब पर्सनालिटी। और फिर गिरते हैं शह सवार ही मैदान ए जंग में। लेकिन कुछ देर के लिए वातावरण शून्य हो गया था। लेकिन पप्पू की बात में वाकई सच था । उसकी ज़ुबान से उस दिन निकला एक एक शब्द उसकी उस व्यथा को बता रहे थे। जो उसने विरहा में बिताए थे। आज अचानक उसे देख मन का सारा गुब्बार सामने आया । जिसका रिज़ल्ट चांटे के रुप में पप्पू के गालों पर साफ दिखाई दे रहा था। खैर जो भी हो । वो वाकई अब वैसी नहीं रही थी । जिसकी बदौलत छोटे चाय कार्नर की का लाभ कभी-कभी 9000 रु प्रति माह को पार कर जाता था। उसके इंतजार में लोग चाय की रेलमपेल जो मचा देते थे। लेकिन फिर वही बात अब वो दिन कैसे लौटेंगें। अब लोग उसका इंतज़ार बिल्कुल नहीं करेंगे। क्योंकि ज़माने लद गये, जब पसीना गुलाब था, अब मलते हैं इत्र, पर बदबू नहीं जाती। और उसकी काया वाकई बदल गई है। सोच कर हैरत सी होती है। और लगता है अब किसी और का इंतज़ार करना पड़ेगा। लेकिन दुआ भी करनी होगी कि अब दइया रे दइया न हो। औऱ पप्पू की कोई घरवाली हो जाए।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

मिडिल क्लास भगवान

बारि मथे घृत होई, सिकता ते बरु तेल,।
बिनु हरि भजन न भव तरिअ, यह सिद्धांत अपेल ।।
महाकवि तुलसीदास ने रामचरित मानस के उत्तर कांड में इन पंक्तियों का ज़िक्र किया है। जिसका अर्थ है कि हवा को मथने से घी बन सकता है, और रेत से तेल निकल सकता है, लेकिन बिना ईश्वर को याद किए इंसान इस भवसागर रुपी संसार को पार नहीं कर सकता। यानि ईश्वर ही सब कुछ है। इसके बगैर इंसान कुछ नहीं। लेकिन बदला ज़माना, बदला परिवेश, बदले चेहरे, और बदल गया चरित्र । अब भवसागर पार करने के लिए भगवान की नहीं, दो घूंट बाटली की जरूरत होती । औऱ खुद आदमजात खुदा हो जाता है। इस खुदा को अगरबत्ती नहीं सिर्फ चार कश श्वेत दंडिका के चाहिए वो भी सुबह सुबह। अर्ली मॉर्निंग। आखिर प्रेशर का सवाल है। ये खुदा अब तकिया छोड़ अखबार पढ़ने को बेताब है। जल्दी जल्दी सारी ख़बरें चाट लेंते हैं, न जाने कितने चटोरे हैं भगवान। और इसी बीच चाय समोसे हो जाएं फिर तो समझो भगवान की लॉटरी लग गई। ओए होए मजा ही आ गया (ये भगवान की फीलिंग है मेरी नहीं) । मजे की बात ये भगवान मिडिल क्लास हैं। मतलब जिनकी मार कभी कभी राक्षस भी लगा जाते है। तो छोटे मोटे राक्षसों पर विजय पाकर ये भगवान अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते हैं। इन भगवान की एक धर्मध्वजा भी हैं। वो और देवियों की तरह शर्मीली सी नहीं दिखतीं कैलेंडर में। वो बेहद आधुनिक हॉट एंड सेक्सी दिखने की होड़ में कभी कभी मार्केट चली जाती हैं। तो बेचारे भगवान की दो जून की बाटली पर ही बन आती है। मिडिल क्लास भगवान की मिडिल क्साल धर्मध्वजा। वैसे भगवान की फैमली का ये छोटा सा लेखा जोखा था। खैर अब चाय समोसा हो चुका । टाइम है आवारागर्दी करने का । एक बात और इन दिनों ये मिडिल क्लास भगवान भी मंदी की चपेट में हैं। सो स्वर्ग लोक से धक्का देकर इन्हे कहीं और ही भेज दिया गया है। इस समय खाली हैं। जिन कपोलों पर कभी लालिमा सी हुआ करती थी । वो कपोल अब रामचंदर सूखे के गालों की तरह गर्त में जा चुके हैं( रामचंदर एक बहुत ही सूखा सींक सा व्यक्ति, ये व्यक्ति सिर्फ हमारे शाहजहांपुर में ही पाया जाता है ) । चूंकि दौरे आवारागर्दी है। लेकिन भगवान हैं। इज्जत का सवाल है। लोग टोंकेंगे कि कैसे भगवान हो खाली रहते हो। बस इन्ही सब वजहों से आजकल साइडबिजनेस और लोगों पर फर्जीवाड़े का रौब झाड़ने के लिए बमपुलिस की जमादारी का टेंडर हाथ में ले लिया है। छोटे मोटों को हड़का कर दाम कमा लेते हैं। और हाफटाइम ही काम करके घर लौटने की चिंता सताने लगती है। इस हाफटाइम में भी पूरी हरामखोरी रहती है। खैर भगवान का अब घर लौटने का समय हो चुका है । बेहद कम पैसे लेकर लौटे भगवान को इस बात का ज़रा भी इल्म ना था कि आज उनकी बेलन से मार होने वाली है (ध्यान रहे, कि भगवान कभी अंतर्यामी थे, उन पर कोई संकट आने वाला होता तो उन्हें पहले से ख़बर लग जाती, लेकिन मंदी के दौर में हाइकमान ने उनसे ये ताकत भी छीन ली, जिसके चलते उनकी अंतर्यामी होने की ताकत जाती रही)।और वो ख़तरे को भांप ही न सके जो उन पर आने वाला था। घर के दरवाजे खुलते हैं। आवारागर्दी के दौरान कुकर्म किए वो मुंह से महक के रुप में वापस आ रहे थे । घर में घुसे ही थे कि गालियों की बौछार से कैलेंडर वाली माता ने उनका स्वागत किया। आ गए पीके। कुत्ते, कमीने हरामजादे। घर में नहीं खाने को, और अम्मा चलीं भुनाने को । घर में ढेला नहीं है और तुमने दारु की अती कर रखी है। कम्बखत कहीं के । बड़े आए भगवान बनने । इसी दौरान एक बेलन भी फेंक कर मार दिया। जैसे तैसे खोपड़ी झुकाकर बच पाए मिडिल क्लास भगवान। दौर ए अब्यूज़ जारी है। कैलेंडर वाली माता कहती हैं, हमें तो एक साड़ी कभी न लाकर दी। खूंटी देवी पर तो बड़े मेहरबान होते हो। सारी ख़बर मुझे पता चल चुकी है। दिन में कहीं और रात में कहीं और । तुम्हारे सारे कुलच्छनों का चिट्ठा मेरे पास है। अगर आइंदा से मेरी सौतन के पास गए तो तुम्हारे प्राण हर लूंगी (मालूम हो कि स्वर्ग में भी महिलाओं की तरह देवियों को आरक्षण दिया गया है, इस आरक्षण की वजह से कैलेंडर वाली माता की सारी दिव्य शक्तियां अभी तक बरकरार है, यही कारण है कि उन्होंने भगवान से प्राण हरने वाली बात कही) । खैर जैसे-तैसे प्राणों की प्यासी कैलेंडर वाली माता से छुटकारा मिला । अगेन गम गलत करने ठेका कच्ची शराब की दुकान पर जा पहुंचे। एक पाउच में ही टल्ली हो गए। पहले से जो पी रखी थी। कैलेंडर वाली माता के सदमे से उबरने के लिए और दिल की भड़ास निकालने के लिए, लोगों को गलियाने लगे । पब्लिक प्लेस पर दारू और ऊपर से गलियाना किसी बडी़ मुसीबत को दावत देने जैसा ही था। एक बार फिर याद दिला दें कि ये भगवान अपनी सारी शक्तियां खो चुके हैं, जिसके चलते उन्हें ये अंदेसा ही नहीं रहा कि वो किस मुसीबत में फंसने वाले है। पुलिस आई और बजाए चार पांच बेंत पिछवाड़े पर। अब भगवान लगे गिड़गिड़ाने। कैलेंडर वाली माता की दुहाई देने लगे। रिश्वतखोरों ने कुछ ले देकर छोड़ दिया। भगवान सोच रहे थे । आज ससुरा कुछ दिन ही अच्छा नहीं है। पहले धर्मध्वजा से पिटा और अब पुलिस से। अभी भी मानने को तैयार नहीं एक बीड़ी का बंडल खरीद ही लिया। घर के बाहर खड़े होकर आसमान में देखने लगे । सोच रहे थे कि शायद हाइकमान से बुलाबा आ जाए और मेरी स्वर्ग में फिर से बहाली हो जाए। इतने में उनके पुराने दोस्त रहे मान न मान मैं तेरा मेहमानाचार्य ऋषी टपक पड़े। कष्ट से घिरे भगवान को देखकर दारुण हो उठे। बोले भगवन अगर आप कहें तो में दुश्कर्मा जी से बात करुं वो ही आपकी बात ऊपर तक पहुंचा सकते हैं ( आपको पता होना चाहिए कि गर्मी के मौसम में मान न मान मैं तेरा मेहमानाचार्य ऋषी हमेशा छुट्टी पर निकलते हैं, इसी दौरान घूमते हुए उन्हे उनके पुराने मित्र मिले,­ ऋषी काफी सोर्स फुल हैं, अपनी पंडिताई के बल पर इन्होंने परलोक में एक नया फ्लैट लिया है वो भी कैश इन हैंड देकर) । उधर मिडिल क्लास भगवान पर कृपादृष्टि करने को आतुर ऋषी ने इतनी देर में कई सुझाव दे डाले। लेकिन उन्हे कोई रास न आया । उन्हे तो बस एक ही धुन थी। कि कैसे भी उनकी वो ताकतें वापस आ जाएं। जो खो चुकी थीं। लेकिन मंदी से त्रस्त स्वर्ग लोक उनका नाम रजिस्टर में लिखने को तैयार ही न था। क्योंकि भगवान की लतों के बारे में सब जानते थे । उनका खर्चा कौन संभालता। जब स्वर्ग लोक में थे तो बिल्कुल कुंवर साहब बनकर रहते थे उस समय कपोल भी लाल-लाल टमाटर से थे। एक दम हस्ठ पुष्ठ। मिडिल क्लास भगवान। अब कोई सुनवाई को तैयार न था बेचारे कुंवरसाब की कहने का मतलब है भगवान की सुनवाई को कोई तैयार नहीं था। अपनों में बेगाने से नज़र आते थे। हर कोई दुश्मन लगता था। लेकिन समझने वाली बात ये है वो तो भगवान थे । लेकिन हम तो आम हैं ऐसे में हमारी क्या दुर्दशा होती। जब भगवान ने भगवान को न छोड़ा तो हमारी क्या औकात। इसलिए ज़रा संभल कर भगवान बनने की कोशिश करें। नहीं तो खुदा के फेर में ज़िंदगी से जुदा न होना पड़ जाए। जय बजरंग बली।

बुधवार, 8 अप्रैल 2009

भाषा तो ऐसी होती है (शाहजहांपुर के गंवार से दिल्ली की ‘खड़ी बोली’तक)

सतत्, निरंतर, लगातार, यही परिभाषा है समय की। जो न कभी थकता है, न किसी का इंतज़ार करता है, और न ही किसी का मोहताज है। सबको इसी के हिसाब से चलना पड़ता है। मिट्टी की खुशबू हमेशा ज़हन में बसी रहती है सो आज भी वही सुगंध एक बार फिर हिलोरें मारने लगी। और खुशनुमा मौसम ने उस सुगंध और भी महक उड़ेल दी है। कुछ लिखने का मन करने लगा, सोचा बदलते मौसम के साथ, “भाषा और बदलते परिवेश” पर ही लिख दूं। ये सफर शाहजहांपुर से दिल्ली तक की कहानी बयां करता है। कि दिल्ली आया एक युवा समय के बदलाव का कैसे शिकार हुआ। चलिए पहले आपको शाहजहांपुर लिए चलते हैं। दिल्ली से 330 किलोमीटर दूर ये शहर मुगल कालीन सभ्यता का परिचायक शहर रहा है। इस शहर को क्रांतिकारियों का शहर भी कहा जाता है। रामप्रसाद बिस्मिल, ठाकुर रोशन सिंह और अशफाक उल्ला जैसे क्रांतिकारियों की कर्मभूमि रही है शाहजहांपुर की मिट्टी। भाषा भी बेहद निराली है यहां की । अगर बड़े बूढ़ों के बीच बैठ जाएं तो जो गंवई अंदाज़ ए बयां होता है। वो वाकई अनूठा अहसास कराता है। और यदि शहर से सटे गांव चले जाएं तो और भी आनंदमंगल । गांव के एक स्कूल में एक बहनजी (बीएड-बीटीसी मार्का) बच्चो को पढ़ा रही हैं। अब सुनिए शहर की बहन जी और गांव के बच्चों के बीच संवाद। हाजरी का समय है। सारे बच्चे अपने नाम का इंतज़ार कर रहे हैं। कुछ कपड़े पहने हैं तो कुछ बिचारे नंगे पुंगे हैं, बिना नहाए धोए स्कूल में बिछी टाट पर आकर बैठ जाते है। हाजरी शुरु होती है। रामलाल, जी बहिनजी। कल्लू, जी बहिन जी। कलट्टर, आए हैं बहिन जी कहूं गए हैं ( कलट्टर की गैरमौजूदगी में संतरा बोलीं) । संतरा एक लड़की का नाम। हाजरी जारी है। दरोगा, जी मदम ( अंग्रेजी बोलने की पुरजोर कोशिश की दरोगा ने फिर भी मैडम को मदम ही बोल पाया) । कथा, जी बहिन जी। रुमाली, जी बहिन जी। हाजरी लगती रही। इसी बीच कलट्टर आ गए जो हाजरी के दौरान गायब थे। बहिन जी ने पूछा कहां रई गए थे( कहां रह गए थे)। कहूं नाई बहिन जी हमारे गोरु कहूं भाजि गए थे(कहीं नहीं हमारे जानवर कहीं भाग गए थे) । उन्हई का पठऊन गए थे घरई ( उन्हे घर भेजने गए थे) । गोरू चरइयू कि पढ़ियऊ भी ( जानवर ही चराते रहोगे या पढ़ोगे भी) । बहिन जी बप्पा नाई मान्त का करईं ( बहिन जी बाप नहीं मानते क्या करें)। भोर होत से बहिरार भेजि देत, हम घास छोरईं की पढ़ईं, तुमई बताबऊ (सुबह होते ही मुझे घास छीलने के लिए खेत पर जाना होता है तुम ही बताओ घास छीलूं की पढूं)। सो ता हइय ( बहिन जी ने सिर हिलाते हुए कहा ये तो है ही) । इस बीच हाजरी एक बच्चे की तो रह ही गई। नाम था नपोरा। तो बहिन जी बोली नपोरा का संबोधन करते हुए नपोरा । चेहरे पर सत्तर तरीके के बल पढ़ गए बहिन जी के । जी बहिन जी(यानि नपोरा प्रेजेंट) अब नपोरा को बुलाया गया अपनो नाम काहे नाई बदलबाऊत। नाई बहिन जी हमारी अम्मा ने रखो। हम नाई बदलबईं। चलऊ अपने बप्पा का पठऊ । उनसे कहिई कि कहूं अइसो नामऊ होत। नपोरा अपने पापा को बुला लाता है। जी बहिन जी का बात है। देखऊ नपोरा गारी होत अऊ तुम जा नाम को बदरबाबऊ। नाई तउ नाम काटि दौ जइही( बहिन जी ने धौस दिखाते हुए हड़काया कहा नपोरा गाली होती है, नाम बदलबाओ नहीं तो नाम काट दिया जाएगा) लेकिन नपोरा के बापू कहां मानने वाले थे। कहते हैं, नाई बहिन जी हम कतई नाई नाम बदरिहीं, नाम चाहे रहई या नाई रहई( हम नाम कतई नहीं बदलेंगे, नाम चाहें कटे या बच रहे) हें नाई तौउ (हा नहीं तो) बचपनई मां नाम रक्खि लओ( छोटे पर से ही नाम रख लिया था) । सारे गौंतरिया नपोराई कहत( सारे रिश्तेदार उसे नपोरा ही कहते हैं)। हम नाई बदरिहीं कतई ( हम नहीं बदलेंगे कतई)। और आखिर उसका नाम नपोरा ही रहा वो आज काफी बड़ा हो चुका है लेकिन वो आज भी नपोरा ही है। ये सब सुनकर एक अद्भुत अनुभव की प्राप्ति हो रही थी । क्योंकि जो शब्द संचार मैं स्कूल में सुन रहा था, वही शब्द संचार मैं अपने दादी, बाबा, पापा और मित्रमंडली से करता था। वही ठेठ गंवई अंदाज़। मजा आ जाता था सचमुच। और मिट्टी की खुशबू तो आपको पता ही है कैसी होती है। “देश की माटी माटी चंदन, मस्तक इसे लगा लें हम”। लेकिन उस गंवई भाषा ने भी बदलाव का दौर देखा । मैं दिल्ली पहुंचा, द्रुतगामी गति से चलने वाली मीडिया का पत्रकार बनने। इस दौर ए पत्रकारिता ने मेरा भाषा संचार कुछ ऐसा कर दिया कि बस पूछिए मत। जो शब्द कभी “हम” हुआ करता था वो “ मैं” में बदल गया, “आप” बदल गया “तू” में। खड़ी बोली का ऐसा भूत सवार हुआ कि अब जब घर पहुंचता हूं तो बमुश्किल ही गंवई अंदाज़ बाहर आ पाता है। बिल्कुल बनावटी सा। मजे की बात तो ये है कि यही दिल्ली मेड भाषा अब गले का हार बनकर सोभायमान होती है । डिलाइट्स के बीच ये भाषा मुझे उन जैसा ही बनावटी बना देती है। छोले कुल्चे सी टिकाऊ ये भाषा बदलते परिवेश के बीच मुझे वो ताकत देती है कि अब मैं उनके बीच ठगा सा नहीं महसूस करता । जब शुरु में दिल्ली आया तो लोग बड़ी आसानी से मेरी भाषा को पहचान लेते थे कि बेचारा कहीं यूपी व्यूपी का होगा । ठग लोग साले को। और कई बार भाषा के चलते ठगा गया। कभी अपनों से तो, कभी परायों से। लेकिन आज पूरे पांच साल का अनुभव हो चुका है इस दिल्ली मार्का लैंग्वेज का । यानी पूरा पोस्ट ग्रेजुएट कर चुका हूं, इस भाषा में, देखते हैं अब कौन ससुरा ठगता है। अब तो मैं ही ठग लूं ससुरों को। लेकिन बनावट के तड़के से लबरेज इस भाषा में वो स्वाद नहीं है। जो मेरी ठेठ गंवई भाषा में था । आज भी उन शब्दों में बातें करने को कसमसाता हूं। कि काश कोई अपना मिल जाए, और बदलते परिवेश में मुझे अपनों सा अहसास करा दे। और फिर वही गांव का स्कूल याद आ जाए। वो बहिन जी जो अब मां जी हो चुकी होंगी, वो कलट्टर जो चपरासी भी न बन पाया होगा, वो संतरा जिसके छिलके छिल कर सूख चुके होंगे और वो नपोरा जो आज भी नपोरा ही होगा। शायद समय के कुछ परिवर्तन से बदले होंगे लेकिन फिर भी वैसे ही होंगे। आज के लिए इतना ही।