गुरुवार, 31 मई 2012
कौड़ियों के भाव...
ज़िंदगी के सौदे में
बिके हैं कई बार
पर कौड़ियों के भाव
पर कौड़ियों के भाव
नीलाम हुनर भी हुआ
पर कौड़ियों के भाव
पर कौड़ियों के भाव
तिजारतों में बिक गया
रगों का खून भी
पर कौड़ियों के भाव
पर कौड़ियों के भाव
लिखते मगर सच्चाइयां
बचते हैं सचों से
उनकी गली में हो गया
इंसान कत्ल भी
पर कौड़ियों के भाव
पर कौड़ियों के भाव
मजदूर कहीं वो बने
श्रम बेचते रहे
कीमत लगाई थी
पर कौड़ियों के भाव
पर कौड़ियों के भाव
सजते रहे शरीरों पर
बन किराए ए नगीना
राशि मुश्त भी चुकाई
पर कौड़ियों के भाव
पर कौड़ियों के भाव
दो जून की जुगाड़ों में
कट गए दिन रात
झुलसते रहे बदन
पर छांव न मिली
वेतन दिया उसे भी
बड़ा सोच समझ कर
पर कौड़ियों के भाव
पर कौड़ियों के भाव
न मोल था जज़्बात का
बेमोल थी हंसी
थोड़े रहम से बिक गया
उनका शरीर भी
पर कौड़ियों के भाव
पर कौड़ियों के भाव
शनिवार, 19 मई 2012
अलग हैं वो लोग...
नाकाबिलों की बस्ती अलग है। बेगैरतों की दुनिया अलग है। अलग हैं वो लोग, जो हुनर को जानते हैं। अलग हैं वो लोग, जो मलिन बस्तियों को पहचानते हैं। अलग हैं वो लोग, जो ईर्ष्यालु हैं। अलग हैं वो लोग, जो किसी दीन के दयाल हैं। अलग अहंकार है, अलग अभिमान है। अलग हैं वो लोग जो कूटनीति करते हैं, अलग हैं वो लोग जो राजनीति करते हैं। अलग हैं वो लोग जो अहित किया करते हैं, अलग हैं वो लोग जो हित की बात करते हैं। अलग सच्चाई है, अलग वो झूठ है। अलग हैं वो लोग जो फिरकापरस्त हैं, अलग हैं वो लोग जो सीधे और सच्चे हैं। अलग हैं वो लोग जो साज़िशों को जानते हैं, अलग हैं वो लोग जो साज़िशें पहचानते हैं। अलग हैं वो लोग जो सीख दिया करते हैं, अलग हैं वो लोग जो सीख लिया करते हैं। अलग हैं ज़मीनें भी, अलग आसमान भी। अलग हैं वो लोग जो बेदर्द हुआ करते हैं, अलग हैं वो लोग जो दर्द सहा करते हैं। अलग हैं वो लोग जो मां बाप को ठुकराते हैं, अलग हैं वो लोग जो गैरों को अपनाते हैं। अलग हैं वो लोग जो सच से बचा करते हैं, अलग हैं वो लोग जो झूठों से बचा करते हैं। अलग अपनत्व है, अलग घृणत्व है। अलग हैं वो लोग, जो समाज को ठुकराते हैं। अलग हैं वो लोग, जो रंक को अपनाते हैं। अलग हैं वो लोग, जो मोहताज हैं सफलता के, अलग हैं वो लोग जो अपनी राहों को बनाते हैं। अलग हैं वो लोग, जो ज़िंदगी दिया करते हैं। अलग हैं वो लोग जो ज़िंदगी लिया करते हैं। अलग हैं वो लोग, जो रिश्तों को तोड़ा करते हैं। अलग हैं वो लोग जो रिश्तों को जोड़ा करते हैं। अलग हैं वो लोग जो बैर को समझाते हैं, अलग हैं वो लोग जो दुश्मनी निभाते हैं। अलग हैं वो लोग जो चाटुकार बना करते हैं, अलग हैं वो लोग जो ईमान हुआ करते हैं। अलग हैं वो लोग, जो संघर्ष को पहचानते हैं, अलग हैं वो लोग, जो संघर्ष नहीं करते हैं। अलग हैं वो लोग जो संदेश दिया करते हैं। अलग हैं वो लोग जो संदेश बना करते हैं। अलग हैं वो लोग, मर्म को पहचानते हैं। अलग हैं वो लोग, जो कर्म को जानते हैं। अलग हैं वो लोग, जो इंसानियत को जानते हैं। अलग हैं वो लोग, जो सिर्फ हैवानियत पहचानते हैं। अलग दिन है, अलग रात है। अलग हैं वो लोग, जो कुटिलता अपनाते हैं। अलग हैं वो लोग, जो सदाचार को अपनाते हैं। अलग हैं वो लोग, मुगालतों में रहते हैं। अलग हैं वो लोग जो ज़मी पर चला करते हैं। अलग हैं वो लोग जो गरीब को पहचानते हैं। अलग हैं वो लोग, जो गरीबी पर हंसा करते हैं। अलग हैं वो लोग, जो आईना दिखाते हैं। अलग हैं वो लोग, जो आईना बना करते हैं। अलग हैं वो लोग, जो दूर होकर भी पास हुआ करते हैं। अलग हैं वो लोग, जो पास होकर भी दूर होते हैं। अलग सुशासन है, अलग कुशासन है। अलग हैं वो लोग, जो वादों को किया करते हैं। अलग हैं वो लोग, जो वादे पूरा किया करते हैं। अलग वो लोग हैं, जो कांटों पर जिया करते हैं। अलग हैं वो लोग, जिन्हें मखमली पसंद है। अलग हैं वो लोग, जो आवाज़ को उठाते हैं। अलग हैं वो लोग जो आवाज़ को दबाते हैं। अलग विचार है। अलग व्यभिचार है। अलग हैं वो लोग, जो मुफलिसी के मारे हैं। अलग हैं वो लोग, जो रईसज़ादे हैं। अलग हैं वो लोग, जो शहर को बसाते हैं। अलग हैं वो लोग, जो श्मशान को बनाते हैं। अलग हैं वो लोग, जो सिस्टम से हुआ करते हैं। अलग हैं वो लोग जो सिस्टम से लड़ा करते हैं। अलग हैं वो लोग, जो सरकार को बदलते हैं। अलग हैं वो लोग, जो सरकार हुआ करते हैं। अलग है अलविदा, अलग है अल्लाह को विदा।
शनिवार, 14 अप्रैल 2012
लौट आओ प्रियतमा लौट आओ
प्रिये तुम मायके क्या गईं। मेरी ज़िंदगी कालाहारी रेगिस्तान सी हो गई। एक दम वीरान। प्रिये तुम्हारी तस्वीर देखता हूं। तो उदासी की लाली छंट जाती है। हया से गाल लाल हो जाते हैं। घर की रसोई की तरफ देखता हूं तो बर्तन बजते से सुनाई और दिखाई देते हैं। मानों कह रहे हों, बनाते क्यों नहीं खाना आकर ? तुम्हारी चूड़ियों की खनक सुने एक सप्ताह हो गया। विरहा की अग्नि मुझे झुलसाने लगी है। प्रिये क्या तुमको नहीं लगता तुम्हारी नाराज़गी के ये सात दिन मेरे जीवन की अग्निपरीक्षा बन गए हैं। तुम तो आदत बन गईं इन चंद सालों में। ऐसे कोई नाराज़ होकर कहीं जाता है क्या ? मैं मानता हूं कि मेरा अभिमान कई बार तुम्हारी आन पर भारी पड़ जाता है। लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं कि मैं तुमसे प्रेम नहीं करता। मेरे कठोर ह्दय में भी एक ह्दय है जहां सिर्फ तुम्हारे लिए मैने दस मंजिला मकान बना रखा है। इन दसों मंजिलों पर तुम रहा करती हो। लेकिन अब दिल का यही अपार्टमेंट आज खाली सा लग रहा है। ऐसा लग रहा है कि अकेलेपन के अहसासों ने अब इस दिल के आशियाने को जबरन किराये पर ले लिया हो। कहीं ऐसा न हो ये निर्दयी अहसास मुझ पर कब्ज़ा कर लें, मुझे अपनी जंजीरों में बांध लें। इससे पहले तुम लौट आओ । मुझे पता है तुम ये पंक्तियां पढ़ कर अपने गुलाब सी पंखुड़ियों वाले होंठों से मुस्कुरा रही होगी। मुझे पता है तुम ये पत्र उस कमरे में पढ़ रही हो। जहां न बाबू जी हैं और न मां। आ जाओ शीघ्र आ जाओ। क्योंकि।
हमारा रिश्ता अटूट है। मैं भ्रमर, तुम पुष्प हो। आंख तुम अश्क हो। मैं रग तुम रुधिर हो। मैं दिल, तुम धड़कन। मैं सावन, तुम हो बसंत। मैं बालू, तुम गंगा । मैं शब्द, तुम स्याही। मैं पथ, तुम राही। मैं चूल्हा तुम फुंकनी । मैं ब्लैक बोर्ड, तुम डस्टर हो । मैं रेता तुम अभ्रक हो। मैं चूना तुम फिटनी हो। मैं बीयर तुम बर्फ। मैं सोडा, हाला हो। मैं एलईडी तुम डीवीडी। मैं प्रसंग तुम उपसंहार। मैं गद्य प्रिये तुम हो कविता। मैं चॉकलेट, तुम कैंडी हो। मैं कंचा तुम, पिल्लू हो। मैं डंडा तुम गिल्ली हो।मै पराकाष्ठा व्यंग विधा, तुम समालोचना जननी हो। मैं खानाबदोश सा पत्रकार, संघर्षशील तुम लेखक हो। मैं नीति नियति तुम राजनीति। मैं शासन तुम, सत्ता हो। मैं जिजीविषा, तुम आशा हो। मैं जनसंख्या, तुम जगजननी। मैं छाया हूं बरगद की तो तुम पीपल की डाली हो। मैं सिस्टम सरकारी सा, तुम आंधी निजीकरण की हो। मैं होठों की गाली तो तुम सुंदर शब्दों की सिरहन हो। मैं मनरेगा तुम रोजगार। मैं बीपीएल, तुम एपीएल। मैं मलिहाबादी आम प्रिये, तुम लौटा गुड़ का ड्राम प्रिये। मैं पाइप तुम पानी हो। मैं नाना तुम नानी हो। मैं बॉलीवुड की रात प्रिये, तुम हॉलीवुड हंगामा हो। मैं प्रश्नपत्र तुम कुंजी हो। मैं विस्मय तुम बोधक हो। मैं किंतु परंतु तुम लेकिन हो। मैं कंचनजंगा की बर्फ प्रिये, तुम एवरेस्ट की ठंडक हो। मैं पापी तुम पुण्य प्रिये। मैं अभिप्राय, तुम आशय हो। मैं पगडंडी तुम मेढ़ प्रिये। मैं श्वेत श्याम तुम मैदा की भेड़ प्रिये। मैं सर्कस के जोकर सा, तुम अदाकार स्पेशल हो। मैं राशि मुआवज़े वाली हूं, तुम सरकारी अनुकंपा हो। मै तमिलनाडु का डोसा हूं, तुम बंगाली रसगुल्ला हो। मैं चाइना की चाऊमीन, तुम जापानी तरकारी हो। मैं मिथ्यावर्णन की बात प्रिये, तुम सच्चाई की मूरत हो। मैं युद्ध भूमि का धनुष बाण और तुम मेरी प्रत्यंचा हो। मैं दशरथ का राम सही पर तुम मेरी रामायण हो। मैं कलयुग का कान्हा हूं, और तुम ही मेरी गीता हो। मैं राम, तुम सीता हो।
प्रिये न जाने क्या हो गया तुम्हारे जाने के बाद। मैं कवि नहीं था, पर कविता लिखने लगा हूं। गायक नहीं था, किंतु गज़ल लिखने लगा हूं। सामाजिक नहीं था, किंतु समाज को समझने लगा हूं। सरकारी मुलाज़िम नहीं था, किंतु सरकार को समझने लगा हूं। प्रेमी नहीं था, प्रेम को समझने लगा हूं। वैरागी नहीं था, किंतु वियोग को समझने लगा हूं। प्रिये तुम्हारे जाने के बाद मैं आंटा दाल का भाव भी समझने लगा हूं। तुम्हारे जाने के बाद से मैं कुप्रबंधन का शिकार हो गया हूं, कब उठता हूं, कब सोता हूं, कब खाता हूं, कुछ पता नहीं। अब कभी नाराज़ नहीं होउंगा। अब कभी तुम्हें सताऊंगा नहीं। कभी फोन पर देर रात बतिआऊंगा नहीं। तुम आ जाओ। बड़ी शिद्दत से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा हूं। मेरे प्यारे से पत्र का जवाब जरुर देना । तुम नहीं आईं तो मैं फिर एक पत्र लिखूंगा। अब और इंतज़ार बर्दाश्त नहीं होता। हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी, तुम देखी सीता मृग नयनी। तुम्हारे इंतज़ार में...
शुक्रवार, 30 मार्च 2012
रेडियो नहीं रोटी (सरकारी रहम से रोटी की जुगाड़)
सुशासन बाबू संचार क्रांति हमें क्या देगी ? अब ऐसा एक सवाल बिहार के महादलित अपने नेता नीतीश कुमार से पूछ रहे हैं। आपके दिमाग में सवाल जरुर आया होगा कि सिर्फ महादलित ही ऐसा क्यों सोच रहे होंगे ? तो इसका जवाब है कि बिहार सरकार ने दूसरे राज्यों की तरह उनके उद्धार के लिए कई योजनाएं चला रखी हैं। मसलन कई तरीकों के रंग बिरंगे कार्डों की योजनाएं महादलितों के सपनों की दुनिया को रंगीन करने के लिए रजिस्टरों में दर्ज कराई गईं हैं।लेकिन ऐसे लाल नीले पीले कार्डों से किसी की दुनिया में रंग भरे नहीं जा सकते। वो भी तब तक, जब तक कि किसी योजना को धरातल पर न उतार दिया गया हो। ये बात भी अलग है कि धरातल पर उतरने के बाद भी ये योजनाएं आज बिचौलियों की भेंट चढ़ती जा रही हैं।
बिहार महादलित विकास मिशन करीब 89 लाख 90 हज़ार महादलितों का उद्धार करने के लिए बिहार के 37 ज़िलों में काम कर रहा है। सूबे की 21 महादलित जातियों पर किया जाने वाले दफ्तरी कार्य बेहद सराहनीय है। इन सभी महादलितों के लिए सरकार ने कुछ न कुछ सोच रखा है। एक ऐसी ही योजना है महादलितों को रेडियो मुहैया कराने की। महादलितों को मुख्यधारा में लाने एवम् प्रभावी जीवन दृष्टि बनाने के लिए इस योजना के तहत प्रत्येक परिवार को रेडियो खरीदने के लिए लिए 400/- रु0 दिया गया। यहां सरकार का मकसद था कि सूबे के उन पिछड़े राज्यों तक संचार क्रांति को पहुंचाया जाए। जहां अब तक विकास की रोशनी नहीं पहुंच सकी है। कम से कम महादलित इस बात पर तो इतरा ही सकें कि उनके घर में संचार क्रांति के नाम पर एक रेडियो सरकार द्वारा पहुंचा दिया गया है।
रेडियो की इसी योजना के साथ महादलितों की पीर शुरु होती है। आपको यकीन तो न होगा कि कोई सरकारी योजना किसी के लिए पीर कैसे बन सकती है? लेकिन ये कड़वे घूंट की ऐसी सच्चाई है जिसे महादलित हर रात पिया करते हैं। दरअसल नीतीश सरकार ने जिन महादलितों को रेडियो बांटे हैं उन महादलितों के पास इतने भी पैसे नहीं हैं कि वे अपनी दिन भर की रोटी की जुगाड़ कर सके।
दिन भर अपने हाड़ को गलाते महादलित जैसे तैसे अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं। ऐसी स्थिति में जब बात रेडियो में सेल डालने की आती है। तो जिनके रेडियो के सेल जवाब दे गए । उन रेडियो में सेल आज तक पड़े ही नहीं। इसलिए रेडियो बेंचकर लोग रोटी की जुगाड़ कर रहे हैं। जो रेडियो सेलविहीन हो चुका है वो बच्चों के हाथ में महज़ एक खिलौने की तरह शोभा बढ़ाता दिखाई दे रहा है। यहां भी कहानी में एक पेंच है, जो रेडियो सरकार ने महादलितों के बीच बंटवाए हैं वो आधुनिकता के हिसाब से बेहद भारी और उनका मेंटिनेंस बहुत ज्यादा है। हर महीने उन रेडियो में तीस रुपए के सेल लगाने पड़ते हैं। महादलितों के लिए तीस रुपए की ये राशि एक दिन की रोटी की व्यवस्था कर देती है। इस लिहाज़ से रेडियो की ये योजना महादलितों के लिए अभिषाप जैसी बन गई है।
हो सकता है कि जब आपकी ये लुभावनी योजना महादलितों तक पहुंची हो तो सभी के चेहरों पर खुशी का माहौल दिखा हो। लेकिन नीतीश जी आज आपका सरकारी रहम इन महादलितों के काम नहीं आ रहा है। भूखा पेट कोई भजन नहीं सुनना चाहता। जब महादलितों को भूख लगेगी तो संचार क्रांति काम नहीं आएगी। वैसे भी जिस संचार क्रांति को आपने रेडियो के ज़रिए गांव गावं तक पहुंचाने की कोशिश की है वो संचार क्रांति महादलितों को बहुत महंगी पड़ रही है। एक महादलित औरत से जब रेडियो के बारे में कुछ पूछा जाता है। तो उसका पहला जवाब यही होता है कि रोटी की व्यवस्था करें, या रेडियो की मरम्मत कराएं। ऐसी स्थिति बेहद भयानक है। कि जिस राज्य में मुफलिसों पर सरकारें रहम करती हैं। उसी रहम को बेंचकर वो लोग अपने लिए एक दो दिन की रोटी का इंतज़ाम कर लेते हैं।
बिहार के हाकिम आपको ये बात समझनी होगी कि रेडियो से पेट नहीं भरता, अगर पेट किसी का भरना है तो उन्हें रोजगार देना होगा। ये हम नहीं वो लोग भी कह रहे हैं जिनकी ज़िंदगी अभावों के चलते जहन्नुम बन गई है। ये ठीक है कि आप (नीतीश) उनके बारे में सूचना क्रांति के नज़रिए से देखते हैं। लेकिन ऐसी सूचना क्रांति का कोई क्या खाक करेगा जब पेट फाकों को मजबूर होगा। हुजूर आप अपने सरकारी रहम की गत देखिए। सोचिए कि ये महादलित लोग आपके रहम को बेंचकर रोटी की जुगाड़ कर रहे हैं। बस इतना समझिए कि ये अपनी शिकायतें आप तक कभी नहीं पहुंचा सकेंगे। हम तो बस एक ज़रिया भर हैं। तय आपको करना है कि हाकिम अपनी रियाया को अब कितना करीब से जानेगा। क्योंकि ये बात याद रखिए लोग सरकारी रहम से रोटी की जुगाड़ कर रहे हैं।
शनिवार, 17 मार्च 2012
हे धरती के भगवान
हे धरती के भगवान।
तुमको मेरा कमर को आधार मानकर 45 डिग्री पर प्रणाम। पुतलियां पथरा गई थीं अरसे से टीवी देख देख कर । और तुम्हारे रनों का टोटा हर रोज़ मेरी चांद को टिपियाता। मैं झल्लाता । लेकिन तुम्हें मेरी झल्लाहट पर रहम न आता। लेकिन आज मैं सारे निजी कार्यों से निवृत्त होकर तुम्हारी अर्चना में जुटा था। सुबह से धूप दीव नैवेद्य के साथ तुम्हारी ईश्वर स्वरुप महिमा मंडित बल्ला उठाऊ तस्वीर का पूजन कर रहा था। पड़ोस से पंडित श्री श्री 108 कदाचित तामलोट लोटन प्रसाद सत्यानासी काशी निवासी पंडित राधे श्याम उपाध्याय को भी बुलवाया था। इस आशा में कि कहीं मुझसे पूजा में कोई मंत्र पढ़ गया तो तुम फिर शतक से चूक जाओगे। और मैं अपनी टांट को टिपियाता फिरुंगा। लेकिन तुम हे धरती के भगवान आज बरेली रोजा पैसेंजर की तरह जब चल निकले तो फिर बरेली से चलने के बाद रोजा ही रुके। तुमने वो महा सुस्त शतक बना ही डाला। जिसका इंतज़ार पिछले एक साल से आपके भक्त कर रहे थे। हे सट्टेबाजों के ईष्ट तुम मेरे घनिष्ट हो अब मुझे ये पता चल गया है। क्योंकि जिस धैर्यपूर्वक पारी में तुमने अपनी जीवटता की मिसाल पेश की है उसकी आशा किसी बुज़ुर्ग खिलाड़ी से ही की जा सकती है। तुमने 147 गेंदों का संहार किया। तब जाकर बड़ी मुश्किल से 114 रन जुटा सके। हे धरती के भगवान तुम्हारे धैर्य को मेरा फिर उसी डिग्री पर प्रणाम। हे क्रिकेट जगत के राजहंस तुम इस युग के ईसा हो। क्योंकि ईसा भी अपने विरोधियों के लिए कहा करते थे कि हे भगवान इन्हें क्षमा करना ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं। तुम भी तो यही कहते हो। लोग तुम्हारी आलोचना करते हैं। और तुम उनसे कुछ नहीं कहते अपना बड़प्पन दिखाकर उन्हें माफ कर देते हो। हे सचिन प्रभू आज तुम्हारे ही महा सुस्त शतक की बदौलत भारत बांग्लादेश जैसी पिद्दी टीम के सामने 289 बनाने लायक हुआ। लेकिन प्रभू की तो लीला अपरंपार होती है। देखिए कैसे झोली में गिर गया मैच बांग्लादेश की। हे दीन दुखियारे सटोरियों के महा प्रभू तुम्हारे महाशतक को मेरा महा प्रणाम। तुम ऐसे ही सतत खेलते जाना। किसी की न सुनना। साल में एक सैकड़ा मार देना। साल भर लोग तुम्हारी आलोचना करेंगे उसके बाद जब तुम शतक वीर बनोगे। तो टीवी पर ब्रेकिंग चलेगी। अखबार में मोटी मोटी सुर्खियां छपेंगी। क्रिकेट का बूढ़ा भगवान आज भी महान। तुम ऐसे ही क्रिक्रेट खेलोगे तो एक दिन तुम्हारा औसत कोर्टनी वॉल्श सा हो जाएगा। 42 से घटकर तुम्हारा औसत 4.2 तक आ जाएगा। तुम यहां भी रिकॉर्ड बना दोगे। क्योंकि तुम्हें सचिन रिकॉर्ड तेंदुलकर भगवान भी तो कहा जाता है। हे देवी अंजलि के देवता अब तुम्हारी संतान के क्रिक्रेट खेलने का वक्त आ गया है। तुम आदेश दोगे तो मैं उसके लिए भी अगरबत्ती जलाऊंगा । पंडित राधेश्याम को बुलवाऊंगा। लेकिन अब मेरी तुमसे एक गुहार है तुम क्रिकेट के सन्यासी हो जाओ। कुछ दिन घर बैठो । परिवार के साथ घूमो-फिरो। और फिर कुछ दिन बाद हमें कमेंट्री बॉक्स में दिखो। कृपया मेरी किसी भी बात को अन्यथा न लेना। मैं तो बस तुमसे विनम्र निवेदन कर रहा हूं। कहीं तुम नाराज़ न हो जाना। मैं तुम्हारी नाराज़गी को बर्दाश्त न कर पाऊंगा। सालों से क्रिकेट देख रहा हूं। तुम्हें मैने भगवान के रुप में पाया है। भगवान को कोई कुछ कहता है तो मुझे बुरा लगता है। इसलिए मेरी भी इज्जत का ख्याल रखना। एशिया कप के बाद मैदान में दिखाई न देना। मैं तो अपने भगवान को अब कमेंट्री बॉक्स में देखना चाहता हूं। हे दयानिधान मेरी गुहार पर गौर फरमाना। क्योंकि कमेंट्री बॉक्स में भी रोजगार के बड़े साधन है। इतना ही कहूंगा । ज्यादा वक्त न मेरे पास है और न ही तुम्हारे पास। चिट्ठी पहुंच जाए तो जवाब जरुर देना। भूल चूक लेनी देनी। तुम्हारा बनवारी लाल। इतिश्री फिलहाल।
तुमको मेरा कमर को आधार मानकर 45 डिग्री पर प्रणाम। पुतलियां पथरा गई थीं अरसे से टीवी देख देख कर । और तुम्हारे रनों का टोटा हर रोज़ मेरी चांद को टिपियाता। मैं झल्लाता । लेकिन तुम्हें मेरी झल्लाहट पर रहम न आता। लेकिन आज मैं सारे निजी कार्यों से निवृत्त होकर तुम्हारी अर्चना में जुटा था। सुबह से धूप दीव नैवेद्य के साथ तुम्हारी ईश्वर स्वरुप महिमा मंडित बल्ला उठाऊ तस्वीर का पूजन कर रहा था। पड़ोस से पंडित श्री श्री 108 कदाचित तामलोट लोटन प्रसाद सत्यानासी काशी निवासी पंडित राधे श्याम उपाध्याय को भी बुलवाया था। इस आशा में कि कहीं मुझसे पूजा में कोई मंत्र पढ़ गया तो तुम फिर शतक से चूक जाओगे। और मैं अपनी टांट को टिपियाता फिरुंगा। लेकिन तुम हे धरती के भगवान आज बरेली रोजा पैसेंजर की तरह जब चल निकले तो फिर बरेली से चलने के बाद रोजा ही रुके। तुमने वो महा सुस्त शतक बना ही डाला। जिसका इंतज़ार पिछले एक साल से आपके भक्त कर रहे थे। हे सट्टेबाजों के ईष्ट तुम मेरे घनिष्ट हो अब मुझे ये पता चल गया है। क्योंकि जिस धैर्यपूर्वक पारी में तुमने अपनी जीवटता की मिसाल पेश की है उसकी आशा किसी बुज़ुर्ग खिलाड़ी से ही की जा सकती है। तुमने 147 गेंदों का संहार किया। तब जाकर बड़ी मुश्किल से 114 रन जुटा सके। हे धरती के भगवान तुम्हारे धैर्य को मेरा फिर उसी डिग्री पर प्रणाम। हे क्रिकेट जगत के राजहंस तुम इस युग के ईसा हो। क्योंकि ईसा भी अपने विरोधियों के लिए कहा करते थे कि हे भगवान इन्हें क्षमा करना ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं। तुम भी तो यही कहते हो। लोग तुम्हारी आलोचना करते हैं। और तुम उनसे कुछ नहीं कहते अपना बड़प्पन दिखाकर उन्हें माफ कर देते हो। हे सचिन प्रभू आज तुम्हारे ही महा सुस्त शतक की बदौलत भारत बांग्लादेश जैसी पिद्दी टीम के सामने 289 बनाने लायक हुआ। लेकिन प्रभू की तो लीला अपरंपार होती है। देखिए कैसे झोली में गिर गया मैच बांग्लादेश की। हे दीन दुखियारे सटोरियों के महा प्रभू तुम्हारे महाशतक को मेरा महा प्रणाम। तुम ऐसे ही सतत खेलते जाना। किसी की न सुनना। साल में एक सैकड़ा मार देना। साल भर लोग तुम्हारी आलोचना करेंगे उसके बाद जब तुम शतक वीर बनोगे। तो टीवी पर ब्रेकिंग चलेगी। अखबार में मोटी मोटी सुर्खियां छपेंगी। क्रिकेट का बूढ़ा भगवान आज भी महान। तुम ऐसे ही क्रिक्रेट खेलोगे तो एक दिन तुम्हारा औसत कोर्टनी वॉल्श सा हो जाएगा। 42 से घटकर तुम्हारा औसत 4.2 तक आ जाएगा। तुम यहां भी रिकॉर्ड बना दोगे। क्योंकि तुम्हें सचिन रिकॉर्ड तेंदुलकर भगवान भी तो कहा जाता है। हे देवी अंजलि के देवता अब तुम्हारी संतान के क्रिक्रेट खेलने का वक्त आ गया है। तुम आदेश दोगे तो मैं उसके लिए भी अगरबत्ती जलाऊंगा । पंडित राधेश्याम को बुलवाऊंगा। लेकिन अब मेरी तुमसे एक गुहार है तुम क्रिकेट के सन्यासी हो जाओ। कुछ दिन घर बैठो । परिवार के साथ घूमो-फिरो। और फिर कुछ दिन बाद हमें कमेंट्री बॉक्स में दिखो। कृपया मेरी किसी भी बात को अन्यथा न लेना। मैं तो बस तुमसे विनम्र निवेदन कर रहा हूं। कहीं तुम नाराज़ न हो जाना। मैं तुम्हारी नाराज़गी को बर्दाश्त न कर पाऊंगा। सालों से क्रिकेट देख रहा हूं। तुम्हें मैने भगवान के रुप में पाया है। भगवान को कोई कुछ कहता है तो मुझे बुरा लगता है। इसलिए मेरी भी इज्जत का ख्याल रखना। एशिया कप के बाद मैदान में दिखाई न देना। मैं तो अपने भगवान को अब कमेंट्री बॉक्स में देखना चाहता हूं। हे दयानिधान मेरी गुहार पर गौर फरमाना। क्योंकि कमेंट्री बॉक्स में भी रोजगार के बड़े साधन है। इतना ही कहूंगा । ज्यादा वक्त न मेरे पास है और न ही तुम्हारे पास। चिट्ठी पहुंच जाए तो जवाब जरुर देना। भूल चूक लेनी देनी। तुम्हारा बनवारी लाल। इतिश्री फिलहाल।
बुधवार, 14 मार्च 2012
फेसबुक, फलाने सिंह और मेरी फीलिंग
ऑफिस में काम की छीछालेदर से मुक्ति पाई तो बैठ गया चंद पलों के लिए फेसबुक पर फंटियाने। हमारे यहां मध्य यूपी में फंटियाने से आशय होता है एक निठल्ले द्वारा निकम्मेपन का किया जाने वाला कार्य। इसलिए कार्यमुक्ति के बाद मैं ऑफीसरी नियम कानून के मुताबिक निठल्ला हो गया था। फेसबुक से ज्यादा पारिवारिक नहीं होने की वजह से मैं बहुत ज्यादा उसका इस्तेमाल नहीं करता। लेकिन ऑफिस में एक बार फेसबुक जरुर खोल लेता हूं, और कोशिश कर रहा हूं, कि इस डिजिटल रईसी से अपनी रिश्तेदारियां बढ़ा लूं।
अभी अपना खाता खोलने ही वाला था कि कम्प्यूटर चीख कर बोला आपके द्वारा भरा गया कूट शब्द गलत है, या फिर उपभोक्ता का नाम त्रुतिपूर्ण ढंग से दर्ज करवाया गया है। ऐसा एक बार नहीं तीन बार हुआ। बार बार यही जवाब थूथ पोथी के ज़रिए दिया जा रहा था। सब कुछ ठीक। लेकिन फिर भी फेसबुक मुझे स्वीकार नहीं कर रही थी। दिमाग भन्ना गया । कि सहसा मेरी नज़र कैप्स लॉक वाले बटन पर पड़ी। जो बेफिक्री के साथ खुला हुआ था। मैने उसको बंद किया और उसके बाद दोबारा लॉगिन किया। एक कोड को रिक्त स्थान में भरने के उपरांत चटाक से खाता खुल गया। फेसबुक के चारों कोनों में झांकने की कोशिश की गई। पाया कि फेसबुक पर न तो कहीं लाल निशान दिखाई दे रहा है, और न ही कहीं हरा निशान दिख रहा है। लेकिन कंप्यूटर स्क्रीन पर उल्टे हाथ की तरफ लगातार आने वाला एक अदृश्य सा संदेश बार बार ये कह रहा था । कि आपके मित्र फलाने सिंह के खाते पर किसी के द्वारा टिप्पणी की गई। किसी ने फलाने सिंह के खाते को पसंद किया। किसी ने फलाने सिंह को पोक किया। किसी ने टैग । किसी ने शेयर । तो किसी ने उनकी दीवार पर लिख दिया आपको जन्मदिन की पूर्वदत्त बधाई। जबकि फलाने सिंह का जन्मदिन दो दिन बाद था। फिर भी फलाने सिंह को किसी ने वक्त की कमी के चलते पहले ही बधाई दे दी थी। डिजिटल दोस्ती में बधाई संदेशों का ये बेहद द्रुतगामी तरीका है।
फलाने के लिए लगातार संदेश आये जा रहे थे। और बार बार उनके प्रालेख पर भेजे गए संदेशों की बत्ती मेरे प्रालेख पर चमक रही थी। फेसबुक पर फलाने सिंह के पांच हज़ार से ज्यादा मित्र हैं। इस लिहाज़ से उन्हें फेसबुक का करोड़पति तो आंका ही जा सकता है। फलाने एक घटिया शेर फेंकते हैं। तो एक झटके में सौ टिप्पणियां आ जाती हैं। जब बेहतरीन शेर फेंकते होंगे तो कितने आते होंगे मैं तो यही सोंचता रहता और जलता रहता। पड़ोसियों का सुख ही पड़ोसियों की जलन का कारण बनता है। खैर छोड़िए। इस बार फलाने सिंह ने एक ऐसा चोरी का शेर दे मारा है कि टिप्पणियों की बरसात हो गई। रुसवाई की पीड़ा से विकलांग हो चुके इस शेर पर लोग दनादन टिप्पणियां दिये जा रहे थे। कुछ लोग ऐसे भी थे जो उस शेर को पसंद भी कर रहे थे। ऐसा नहीं था कि पसंद करने वालों ने उस शेर पर टिप्पणी नहीं दी थी। कुछ ने टिप्पणी भी दी और पसंद भी किया। ये प्रक्रिया बताती थी, डिजिटल दोस्ती में फलाने सिंह ने काफी साख बना रखी है। वो जो लिखते हैं, उस पर टिप्पणियां दी जाती है, जो लिखते हैं, उसे पसंद किया जाता है। कई बार तो ऐसा भी होता कि जब कोई उनकी स्थिति पर पसंद का चिन्ह नहीं लगाता, और टिप्पणी नहीं देता, तो वो खुद अपने आप को पसंद कर लिया करते । संतोषम् परम् सुखम।
लेकिन कुछ भी हो मैं फलाने की फेसबुक प्रणाली से काफी प्रेरित था। और इसीलिए कई बार देखा देखी में ही फेसबुक खोल लिया करता था। फलाने सिंह गूगल खोलते। उस पर गालिब लिखते । गालिब का कोई शेर मिलता, तो उसमें थोड़ा संपादन करते, और फेसबुक पर स्टेटस के डब्बे में ठेल देते । फलाने के लिए इस तरह की चोरी कोई गुनाह नहीं थी। क्योंकि उन्हें पता है, वो जो लिखते हैं, उसे पसंद किया जाता है, जो विचार प्रस्तुत करते हैं, उस पर टिप्पणी दी जाती है। अगर फेसबुक पर पांच हज़ार से ज्यादा मित्रों वाले इंसान को पांच सौ से ज्यादा कमेंट आते हैं तो उसे फेसबुक का करोड़ पति आंका जाएगा। ऐसा मैं नहीं फलाने सिंह सोचते हैं।
शायद भारत में जब से फेसबुक का उदय हुआ था, तभी से फलाने सिंह फेसबुक पर बड़े ही धर्मनिरपेक्ष अंदाज़ में मित्रता के हाथ बढ़ाए हुए थे। इसीलिए उनके डिजिटल दोस्त पांच हज़ार से ज्यादा थे। और मेरे सिर्फ चार सौ कुछ। एक दिन मैने फलाने से उनके संदेशों पर आने वाली टिप्पणियों का राज़ पूछा तो उन्होने बड़े ही सरल अंदाज़ में बताया।
पहले एक काम करो।
नियमित अपना खाता खोलो।
खाते पर कोई निमंत्रण आये उसे स्वीकार करो।
निमंत्रण न भी आये तो तुम लोगों को अपनी तरफ से निमंत्रण भेजो।
रोज़ाना एक घंटे फेसबुक पर बैठने की प्रैक्टिस करो।
जो भी दिखे, उसे अपनी तरफ से निमंत्रण भेज दो।
कोई भी अपने स्थिति विवरण में सुधार करे तो उस पर तुरंत टिप्पणी दो।
कोई भी शोक गीत से लेकर प्रेम गीत तक लिखे उसे तुरंत पसंद करो।
जितना शीघ्र किसी पर टिप्पणी करोगे, या उसे पसंद करोगे, उतनी ही शीघ्रता से तुम्हारे मित्रों की संख्या बढ़ने लगेगी।
किसी का स्थिति विवरण बहुत अच्छा लगे, तो उसे लोगों में बांट दो।
ऐसा करने से लोग तुम्हारे मुरीद हो जाएंगे, और तुम फेसबुक के शहंशाह हो जाओगे।
फलाने सिंह की ये बात मुझे बड़ी ही अच्छी लगी, कि अगर डिजिटल दोस्तों की संख्या बढ़ानी है तो सिर्फ एक घंटे का श्रम करना है, और बस चंद गालिब के शेरों की चोरी कर उनका संपादन करना है।
वाह भई वाह
कमाल का विचार है।
हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा।
अब तो हम भइया ऐसे ही दोस्त बनाएंगे। पांच हज़ार नहीं पूरे दस हजार करके दिखाएंगे। क्योंकि फलाने सिंह की तरह हम फेसबुक पर एक घंटा नहीं पूरे दो घंटे बिताएंगे। फिर बताएंगे कि कैसे इतराया जाता है फेसबुक की टिप्पणियों पर। हुंह। जाओ सनीचर मेरे बंगला से। अब क्यों राखी देर लगाये। बड़े आए फलाने सिंह।
अभी अपना खाता खोलने ही वाला था कि कम्प्यूटर चीख कर बोला आपके द्वारा भरा गया कूट शब्द गलत है, या फिर उपभोक्ता का नाम त्रुतिपूर्ण ढंग से दर्ज करवाया गया है। ऐसा एक बार नहीं तीन बार हुआ। बार बार यही जवाब थूथ पोथी के ज़रिए दिया जा रहा था। सब कुछ ठीक। लेकिन फिर भी फेसबुक मुझे स्वीकार नहीं कर रही थी। दिमाग भन्ना गया । कि सहसा मेरी नज़र कैप्स लॉक वाले बटन पर पड़ी। जो बेफिक्री के साथ खुला हुआ था। मैने उसको बंद किया और उसके बाद दोबारा लॉगिन किया। एक कोड को रिक्त स्थान में भरने के उपरांत चटाक से खाता खुल गया। फेसबुक के चारों कोनों में झांकने की कोशिश की गई। पाया कि फेसबुक पर न तो कहीं लाल निशान दिखाई दे रहा है, और न ही कहीं हरा निशान दिख रहा है। लेकिन कंप्यूटर स्क्रीन पर उल्टे हाथ की तरफ लगातार आने वाला एक अदृश्य सा संदेश बार बार ये कह रहा था । कि आपके मित्र फलाने सिंह के खाते पर किसी के द्वारा टिप्पणी की गई। किसी ने फलाने सिंह के खाते को पसंद किया। किसी ने फलाने सिंह को पोक किया। किसी ने टैग । किसी ने शेयर । तो किसी ने उनकी दीवार पर लिख दिया आपको जन्मदिन की पूर्वदत्त बधाई। जबकि फलाने सिंह का जन्मदिन दो दिन बाद था। फिर भी फलाने सिंह को किसी ने वक्त की कमी के चलते पहले ही बधाई दे दी थी। डिजिटल दोस्ती में बधाई संदेशों का ये बेहद द्रुतगामी तरीका है।
फलाने के लिए लगातार संदेश आये जा रहे थे। और बार बार उनके प्रालेख पर भेजे गए संदेशों की बत्ती मेरे प्रालेख पर चमक रही थी। फेसबुक पर फलाने सिंह के पांच हज़ार से ज्यादा मित्र हैं। इस लिहाज़ से उन्हें फेसबुक का करोड़पति तो आंका ही जा सकता है। फलाने एक घटिया शेर फेंकते हैं। तो एक झटके में सौ टिप्पणियां आ जाती हैं। जब बेहतरीन शेर फेंकते होंगे तो कितने आते होंगे मैं तो यही सोंचता रहता और जलता रहता। पड़ोसियों का सुख ही पड़ोसियों की जलन का कारण बनता है। खैर छोड़िए। इस बार फलाने सिंह ने एक ऐसा चोरी का शेर दे मारा है कि टिप्पणियों की बरसात हो गई। रुसवाई की पीड़ा से विकलांग हो चुके इस शेर पर लोग दनादन टिप्पणियां दिये जा रहे थे। कुछ लोग ऐसे भी थे जो उस शेर को पसंद भी कर रहे थे। ऐसा नहीं था कि पसंद करने वालों ने उस शेर पर टिप्पणी नहीं दी थी। कुछ ने टिप्पणी भी दी और पसंद भी किया। ये प्रक्रिया बताती थी, डिजिटल दोस्ती में फलाने सिंह ने काफी साख बना रखी है। वो जो लिखते हैं, उस पर टिप्पणियां दी जाती है, जो लिखते हैं, उसे पसंद किया जाता है। कई बार तो ऐसा भी होता कि जब कोई उनकी स्थिति पर पसंद का चिन्ह नहीं लगाता, और टिप्पणी नहीं देता, तो वो खुद अपने आप को पसंद कर लिया करते । संतोषम् परम् सुखम।
लेकिन कुछ भी हो मैं फलाने की फेसबुक प्रणाली से काफी प्रेरित था। और इसीलिए कई बार देखा देखी में ही फेसबुक खोल लिया करता था। फलाने सिंह गूगल खोलते। उस पर गालिब लिखते । गालिब का कोई शेर मिलता, तो उसमें थोड़ा संपादन करते, और फेसबुक पर स्टेटस के डब्बे में ठेल देते । फलाने के लिए इस तरह की चोरी कोई गुनाह नहीं थी। क्योंकि उन्हें पता है, वो जो लिखते हैं, उसे पसंद किया जाता है, जो विचार प्रस्तुत करते हैं, उस पर टिप्पणी दी जाती है। अगर फेसबुक पर पांच हज़ार से ज्यादा मित्रों वाले इंसान को पांच सौ से ज्यादा कमेंट आते हैं तो उसे फेसबुक का करोड़ पति आंका जाएगा। ऐसा मैं नहीं फलाने सिंह सोचते हैं।
शायद भारत में जब से फेसबुक का उदय हुआ था, तभी से फलाने सिंह फेसबुक पर बड़े ही धर्मनिरपेक्ष अंदाज़ में मित्रता के हाथ बढ़ाए हुए थे। इसीलिए उनके डिजिटल दोस्त पांच हज़ार से ज्यादा थे। और मेरे सिर्फ चार सौ कुछ। एक दिन मैने फलाने से उनके संदेशों पर आने वाली टिप्पणियों का राज़ पूछा तो उन्होने बड़े ही सरल अंदाज़ में बताया।
पहले एक काम करो।
नियमित अपना खाता खोलो।
खाते पर कोई निमंत्रण आये उसे स्वीकार करो।
निमंत्रण न भी आये तो तुम लोगों को अपनी तरफ से निमंत्रण भेजो।
रोज़ाना एक घंटे फेसबुक पर बैठने की प्रैक्टिस करो।
जो भी दिखे, उसे अपनी तरफ से निमंत्रण भेज दो।
कोई भी अपने स्थिति विवरण में सुधार करे तो उस पर तुरंत टिप्पणी दो।
कोई भी शोक गीत से लेकर प्रेम गीत तक लिखे उसे तुरंत पसंद करो।
जितना शीघ्र किसी पर टिप्पणी करोगे, या उसे पसंद करोगे, उतनी ही शीघ्रता से तुम्हारे मित्रों की संख्या बढ़ने लगेगी।
किसी का स्थिति विवरण बहुत अच्छा लगे, तो उसे लोगों में बांट दो।
ऐसा करने से लोग तुम्हारे मुरीद हो जाएंगे, और तुम फेसबुक के शहंशाह हो जाओगे।
फलाने सिंह की ये बात मुझे बड़ी ही अच्छी लगी, कि अगर डिजिटल दोस्तों की संख्या बढ़ानी है तो सिर्फ एक घंटे का श्रम करना है, और बस चंद गालिब के शेरों की चोरी कर उनका संपादन करना है।
वाह भई वाह
कमाल का विचार है।
हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा।
अब तो हम भइया ऐसे ही दोस्त बनाएंगे। पांच हज़ार नहीं पूरे दस हजार करके दिखाएंगे। क्योंकि फलाने सिंह की तरह हम फेसबुक पर एक घंटा नहीं पूरे दो घंटे बिताएंगे। फिर बताएंगे कि कैसे इतराया जाता है फेसबुक की टिप्पणियों पर। हुंह। जाओ सनीचर मेरे बंगला से। अब क्यों राखी देर लगाये। बड़े आए फलाने सिंह।
शनिवार, 18 फ़रवरी 2012
संडे सिंन्ड्रोम (पति पत्नी की वेदना)
पूरे 6 दिन बाद फिर से संडे आ गया
छुट्टी का दिन, फुरसत का लम्हा
आज फिर 6 दिन बाद एक दंपति देर से सोकर उठे हैं
बेफिक्र हैं
जाड़े के मौसम में बिस्तर पर अंगड़ाइयां ले रहे हैं
कमरे से बाहर
आज बूढ़ी मां के झाड़ू लगाने का मौका है
अस्सी साल की ये झुकी हुई पीठ
पूरा आंगन बहोरती है
शनय शनय मां की तकलीफें सर्दी से कांपते होठों पर आ जाती हैं
धीरे धीरे वो बड़बड़ाने लगती है
लेकिन इस तरीके से कि कोई सुन ना सके
इधर नौकरी पेशा दंपति का हाल ज्यों का त्यों है
वो अभी भी अपने आप को थका हारा महसूस कर रहे हैं
इसलिए बिस्तर पर ही आराम कर रहे हैं
कि अचानक पति ने कमरे से बाहर नज़र डाली
तो पाया कि मां कुछ बुदबुदाकर झाड़ू लगाने में व्यस्त है
आखिर आज का ही तो दिन है जब उसे काम करना है
ये सोचकर उस मां का बेटा फिर सो गया
पत्नी पहले से सो रही थी
घड़ी का छोटा कांटा 9 तक पहुंच चुका था, जबकि बड़ा ठीक 12 पर था।
गुनगुनी धूप कमरे के भीतर प्रवेश कर गई
इतने में दंपति की आंख खुल गई
आंखों को दोनो मलते हुए, हाथों से योग करते हुए, दोनो खड़े हुए
पत्नी ने अपने हाथों से बिस्तर को तहाया
फिर पति से अकड़कर बोली
तू इतनी देर से उठा अब तक क्यों नहीं नहाया ?
पति बोला
डार्लिंग आपको बोला तो था आज संडे है
थोड़ा देर तक सोने दो
पत्नी बोली
जानते हो तुम्हारे चक्कर में मैं कितना लेट हो गई
हर रोज़ 6 बजे उठती हूं
आज 6 को तुमने उल्टा
सब तुम्हारी गलती है
तुम्हें पता है ना मां कहती है
चाय नहीं बनी, नाश्ता नहीं बना, खाना कब बनाओगी
क्या बिस्तर में पड़ी सोती ही रहोगी
काम की ना काज की नौ मन अनाज की
पति बेचारा पहले ही काम के बोझ का मारा
पत्नि से एक बार फिर सकुचा कर बोला
जानू वो हमारी मां है, और वो जो खाट पर बैठे हैं वो हमारे बाप हैं
क्या इनकी बातें तुम्हें ताने सी लगती हैं
सोचो इन्होंने तो तुम्हारे पति को पाला है
इन्हीं के पास अपनी किस्मत का ताला है
पत्नी बोली
चलो बातें न बनाओ आज संडे है काम करने दो
खुद तो देर से सोकर उठते हैं मेरी भी आदत खराब करते हैं
इतने में दरवाज़े पर दस्तक हुई
पत्नी ने अपने बिखरे बालों को पीछे समेटने की कोशिश की
और पहुंच गई दरवाज़े तक
गोपाल आज तुम भी बहुत लेट आए हो ?
क्या दूध में पानी मिलाकर लाये हो
अरे नहीं बीबीजी आज देर से सोकर उठा था
संडे था ना इसलिए
वैसे आज हिसाब हो जाता तो ठीक रहता
कुल महीने के 700 रुपए होते हैं
चलो ठीक है, अगर दूध पनीला हुआ तो पैसे न दूंगी
अरे बीबीजी गरीब के पेट पर लात काहे मारती हैं
चलो चलो अच्छा ठीक है आती हूं पैसे लेकर
इधर पति दैनिक क्रिया से निवृत्त होने के लिए अटैच बाथरुम में चला गया था
अखबार अपने साथ ले गया था
पत्नी बोली
अरे क्या आज संडे के दिन अखबार नहीं आया
बाथरुम से गूंजती हुई एक आवाज़ आई
आया है मेरी रुपमती मेरे पास है
हां हां और कोई जगह नहीं मिली अखबार पढ़ने के लिए
तुम कहो तो तुम्हारा नाश्ता भी वहीं भिजवा दूं
खाते रहना, निकालते रहना
डार्लिंग तुम तो मसखरी करती है
देखो !
खून न जलाओ मेरा
एक तो वैसे भी इतना काम पड़ा है
बाहर दूध वाला पैसे लेने पर अड़ा है
मेरी जेब से निकाल कर दे दो ना कल ही तो सेलरी अकाउंट में आई थी
पत्नी ने जेब से 700 रुपए निकाले
और दूध वाले की ओर बढ़ा दिये
दूध वाला शुक्रिया अदा करते हुए आगे बढ़ गया
अरे सुनते हो, दस बज गया है
क्या वहीं बैठे रहोगे या हमारी सौतन से गप्पें लड़ा रहे हो
पति बोला
सौतन से गप्पें लड़ानी होंगी
तो पखाने के बजाय पार्क नहीं जाऊंगा
फालतू में शक करती हो
कल बताया नहीं था कब्ज़ियत हो गई है
चलो चलो जल्दी निकलो मुझे भी जाना है
उसके बाद ससुर के लिए दलिया, सास के लिए साबूदाना
और तुम्हारा लिए सिंगट्टा पकाना है
डार्लिंग तुम तो हमेशा झगड़ती रहती हो
काम कौन सा ढंग का करते हो झगड़ूं नहीं तो क्या करुं
तौलिया से सिर को पोछता हुआ पति बाहर आया
तो पत्नी अटैच बाथरुम के भीतर चली गई
जाते हुए पति को आदेश दे गई
एक काम करना 15 मिनट बाद चाय चढ़ा देना
मम्मी पापा के लिए बिना चीनी की
और बाकी तो तुम समझदार होना डार्लिंग
करीब डेढ़ घंटे बाद जब पति ने पत्नी के मुख से डार्लिंग सुना
तो उसका दिल भर आया
उसने प्रेम रस में भीगे शब्दों से कहा
ठीक है जान
निकल कर तो आओ तुम्हारे लिए चाय क्या नाश्ता भी बना दूंगा
हां हां ठीक है ठीक है
बाथरुम से निकलकर ताने की एक लहर पति के कानों तक पहुंची
हां पता है कितना बना लोगे नाश्ता
चाय ही बना लो तो बड़ी बात है
याद है ना पिछले संडे का शक्कर के बूरे की जगह नमक डाल दिया था
अरे जान उस दिन तो किचन में अंधेरा था
कुछ समझ ही नहीं आ रहा था
खैर पति ने गैस पर कुछ देर बाद चाय को चढ़ाया
और उस चाय को अपने बूढ़े मां बाप तक पहुंचाया
चाय की गर्मी पहुंचते ही जैसे बूढ़े दंपति के सीने को कुछ राहत मिली
वो अपनी रजाई में अब दुबके हुए थे
इस इंतज़ार में कि कब दलिया आएगा, कब साबूदाना आएगा
पति ने पत्नी के हिस्से की चाय केटली में रख दी
इस आस में कि पत्नी जब नहा धोकर निकलेगी तो चाय देखकर खुश हो जाएगी
लेकिन नहाकर निकली पत्नी के तेवर बदले हुए थे
बोली
गीजर में गर्म पानी क्यों नहीं बचाया था
पता है ठंडे पानी से नहाकर मेरी हालत खराब है
और तुम हो कि तुम्हें अखबार पढ़ने से फुर्सत नहीं
बहुत ठंड लग रही है
जल्दी से चाय बनाओ
पति फिर प्रेम से बोला
चाय हाज़िर है मेरी बेगम
ज्यादा होशियार न बनो
केटली में रखी चाय देते हो जाओ ताजी बनाकर लाओ
पति पत्नी के इस झगड़े में 12 बज गए
गुनगुनी धूप अब कुछ ज्यादा उबल रही थी
इसलिए बेटे ने मां और पिता जी की खाट को बाहर धूप में डाल दिया
जाड़े की ये दोपहर बुज़ुर्ग दंपति के लिए बड़ी सुहानी थी
इधर कमरे में नहा धोकर ताजी चाय पीकर पत्नी तैयार हो चुकी थी
अब उसे नाश्ते और खाने की ड्यूटी निभानी थी
बोली एजी सुनते हो
चूंकि पति अपने मां बाप के पास बैठे अखबार पढ़ रहा था
इसलिए पत्नि की आवाज़ को सुन न सका
पत्नी फिर बोली
एजी सुनते हो
पड़ोस के जेनरेटर की आवाज़ में ये आवाज़ फिर सुनाई न दी
इसलिए इस बार बेगम साहिबा का सुर बदल गया
एजी सुनते हो कहां मर गए
अरे आया आया कहो क्या कह रही हो
कितनी देर से बुलाती हूं
क्या तुमको समझ नहीं आता
बारह बज गए अभी तक नाश्ता नहीं बना
हाए रे फूटी किस्मत ऐसा पति मिला
शास्त्री जी ठीक ही कहते थे
कि तुम्हारा पति निठल्ला होगा
न नाश्ते की सुध, न खाने की सुध
चलो एक काम करो ये मैने लिस्ट बना दी है
जाओ बाज़ार से हफ्ते भर का राशन लेकर आओ
और हां ज़रा जल्दी आना
खाना बनाने में मेरी मदद करनी है, मैं तब तक नाश्ता बनाती हूं
ठीक है डार्लिंग मैं यूं गया और यूं आया
अब पत्नी किचन में जाती है
दो छोटे कूकर में बुज़ुर्गों का नाश्ता बनाती है
एक में दलिया, एक में साबू दाना है
दोनों के पकने का इंतज़ार करती है
करीब दस मिनट बाद ये नाश्ता उन बुज़ुर्गों को परोसा जाता है।
जाड़े की धूप में करीब साढ़े बारह बजे मिला ये नाश्ता
जन्नत सा अहसास कराता है
दोनों बिना दांतों के जबड़ों से नाश्ते की जुगाली करते हैं
सुबह 6 बजे के उठे ये बूढ़े दोपहर साढ़े बारह बजे नाश्ता करते हैं
पड़ोस के बनिये से हफ्ते भर का राशन लेकर पति घर आ गया था
पत्नी उस वक्त नाश्ता कर रही थी
इसलिए पति ने किचन में खुद जाकर सामान को रखा
पत्नी बोली
नाश्ता रखा है कढ़ाई में ले लेना अब मैं कहां किचन में आऊंगी
आजाओ बाहर ही लॉन में बैठकर साथ खाते हैं
नहीं मैं मम्मी पापा के पास बैठकर कर लूंगा
तुम उधर ही कर लो नाश्ता
हफ्ते भर बाद तो वक्त मिलता है इनके पास बैठने का
चलो ठीक है और हां उनसे पूछ लेना कि अगर और दलिया चाहिए तो किचन में रखा है
परोस देना
ठीक है।
करीब दस मिनट बाद पत्नी आवाज़ लगाती है
अतुल एक काम करना
तनिक सब्ज़ी काटने में मेरी मदद करना
कल दफ्तर से आते वक्त मेरे पैर में कांच चुभ गया था तो अब तक दर्द हो रहा है
हाए दईया मर गई
पत्नी ने शनिवार को चुभी उस कांच की वेदना प्रकट की
तो पति का गला भर आया
क्या हो गया मेरी जान
तुमने कल तो कुछ नहीं बताया
क्या बताती
तुम बेकार ही परेशान होते
आखिर मैं पति हूं तुम्हारा
तुम्हारे दुख दर्द का साथी हूं
मुझे नहीं तो किसे बताओगी
क्या यूं ही हर तकलीफ मुझसे छिपाओगी
पति के ये इमोशनल सवाल पत्नी के गले उतर गए
उसने कहा नहीं बस ऐसा कुछ नहीं
मैं तो बस मजाक कर रही थी
मैने सोचा इसी बहाने कुछ काम में हाथ बंट जाएगा
तुम और मैं कुछ देर साथ रहेंगे सब्ज़ी काटने के बहाने
अगर ऐसा ही था
तो ये चोट का नाटक क्यों ?
पत्नी बोली
तुम्हें सब्ज़ी काटनी है तो काटो वरना चलते बनो
सारा काम मैं ही कर लूंगी
पत्नी ने गुस्से से चाकू उठाया
और तेजी से सब्ज़ी पर चलाने लगी
मानो नाज़ियों की सेना यहूदियों का संहार कर रही हो
चाकू और सब्ज़ी के बीच हुई इस जंग में चाकू जीत गया
चित्रलेखा की उंगली कट गई
खून बेतरतीबी से बहा जा रहा था
और चित्रलेखा की आंखों से अश्रुओं का सैलाब बह रहा था
अतुल की नज़र जैसे ही चित्रलेखा की कटी उंगली पर पड़ी
उसने फौरन उस उंगली को अपने मुंह में रख लिया।
मानो वो उस खून को बहने न देना चाहता हो
अतुल को यूं देख चित्रलेखा बोली
क्या तुम मुझसे बहुत प्यार करते हो
पति आंखों में आंखें डालकर मसखरे अंदाज़ में बोला
नहीं तुम्हारी सौतन को बहुत प्यार करता हूं
ये मसखरा अंदाज़ पत्नी भांप न सकी
और बोली
तो जाओ जाते क्यों नहीं उस मीना कुमारी मधुबाला के पास
उसी की काटना उसी की चूसना
अब घर आए तो बताए देती हूं
पति अपनी पत्नी के तेवर देखकर बोला
अरे मैने तो मज़ाक में कहा था
तो मैं कौन सा सीरियस हूं
डार्लिंग तुम भी ना
पति के सॉफ्ट कॉर्नर का पत्नी ने फायदा उठाया
और बोली अच्छा एक काम करना
मैने सब्ज़ी काट दी है
अब तुम इसे गैस पर चढ़ा देना
आटा माढ़ दिया है रोटी बना देना
चावल भिगो दिये हैं
कूकर में पका लेना
मैं सोने जा रही हूं, दो घंटे बाद उठा लेना
मेरे तो बहुत दर्द हो रहा है
आज संडे के दिन बहुत काम हो जाता है
चाय बनाओ
नाश्ता बनाओ
खाना बनाओ
क्या क्या करें ???
अब थोड़ा काम तुम कर लो मैं सोने जा रही हूं प्लीज़
छुट्टी का दिन, फुरसत का लम्हा
आज फिर 6 दिन बाद एक दंपति देर से सोकर उठे हैं
बेफिक्र हैं
जाड़े के मौसम में बिस्तर पर अंगड़ाइयां ले रहे हैं
कमरे से बाहर
आज बूढ़ी मां के झाड़ू लगाने का मौका है
अस्सी साल की ये झुकी हुई पीठ
पूरा आंगन बहोरती है
शनय शनय मां की तकलीफें सर्दी से कांपते होठों पर आ जाती हैं
धीरे धीरे वो बड़बड़ाने लगती है
लेकिन इस तरीके से कि कोई सुन ना सके
इधर नौकरी पेशा दंपति का हाल ज्यों का त्यों है
वो अभी भी अपने आप को थका हारा महसूस कर रहे हैं
इसलिए बिस्तर पर ही आराम कर रहे हैं
कि अचानक पति ने कमरे से बाहर नज़र डाली
तो पाया कि मां कुछ बुदबुदाकर झाड़ू लगाने में व्यस्त है
आखिर आज का ही तो दिन है जब उसे काम करना है
ये सोचकर उस मां का बेटा फिर सो गया
पत्नी पहले से सो रही थी
घड़ी का छोटा कांटा 9 तक पहुंच चुका था, जबकि बड़ा ठीक 12 पर था।
गुनगुनी धूप कमरे के भीतर प्रवेश कर गई
इतने में दंपति की आंख खुल गई
आंखों को दोनो मलते हुए, हाथों से योग करते हुए, दोनो खड़े हुए
पत्नी ने अपने हाथों से बिस्तर को तहाया
फिर पति से अकड़कर बोली
तू इतनी देर से उठा अब तक क्यों नहीं नहाया ?
पति बोला
डार्लिंग आपको बोला तो था आज संडे है
थोड़ा देर तक सोने दो
पत्नी बोली
जानते हो तुम्हारे चक्कर में मैं कितना लेट हो गई
हर रोज़ 6 बजे उठती हूं
आज 6 को तुमने उल्टा
सब तुम्हारी गलती है
तुम्हें पता है ना मां कहती है
चाय नहीं बनी, नाश्ता नहीं बना, खाना कब बनाओगी
क्या बिस्तर में पड़ी सोती ही रहोगी
काम की ना काज की नौ मन अनाज की
पति बेचारा पहले ही काम के बोझ का मारा
पत्नि से एक बार फिर सकुचा कर बोला
जानू वो हमारी मां है, और वो जो खाट पर बैठे हैं वो हमारे बाप हैं
क्या इनकी बातें तुम्हें ताने सी लगती हैं
सोचो इन्होंने तो तुम्हारे पति को पाला है
इन्हीं के पास अपनी किस्मत का ताला है
पत्नी बोली
चलो बातें न बनाओ आज संडे है काम करने दो
खुद तो देर से सोकर उठते हैं मेरी भी आदत खराब करते हैं
इतने में दरवाज़े पर दस्तक हुई
पत्नी ने अपने बिखरे बालों को पीछे समेटने की कोशिश की
और पहुंच गई दरवाज़े तक
गोपाल आज तुम भी बहुत लेट आए हो ?
क्या दूध में पानी मिलाकर लाये हो
अरे नहीं बीबीजी आज देर से सोकर उठा था
संडे था ना इसलिए
वैसे आज हिसाब हो जाता तो ठीक रहता
कुल महीने के 700 रुपए होते हैं
चलो ठीक है, अगर दूध पनीला हुआ तो पैसे न दूंगी
अरे बीबीजी गरीब के पेट पर लात काहे मारती हैं
चलो चलो अच्छा ठीक है आती हूं पैसे लेकर
इधर पति दैनिक क्रिया से निवृत्त होने के लिए अटैच बाथरुम में चला गया था
अखबार अपने साथ ले गया था
पत्नी बोली
अरे क्या आज संडे के दिन अखबार नहीं आया
बाथरुम से गूंजती हुई एक आवाज़ आई
आया है मेरी रुपमती मेरे पास है
हां हां और कोई जगह नहीं मिली अखबार पढ़ने के लिए
तुम कहो तो तुम्हारा नाश्ता भी वहीं भिजवा दूं
खाते रहना, निकालते रहना
डार्लिंग तुम तो मसखरी करती है
देखो !
खून न जलाओ मेरा
एक तो वैसे भी इतना काम पड़ा है
बाहर दूध वाला पैसे लेने पर अड़ा है
मेरी जेब से निकाल कर दे दो ना कल ही तो सेलरी अकाउंट में आई थी
पत्नी ने जेब से 700 रुपए निकाले
और दूध वाले की ओर बढ़ा दिये
दूध वाला शुक्रिया अदा करते हुए आगे बढ़ गया
अरे सुनते हो, दस बज गया है
क्या वहीं बैठे रहोगे या हमारी सौतन से गप्पें लड़ा रहे हो
पति बोला
सौतन से गप्पें लड़ानी होंगी
तो पखाने के बजाय पार्क नहीं जाऊंगा
फालतू में शक करती हो
कल बताया नहीं था कब्ज़ियत हो गई है
चलो चलो जल्दी निकलो मुझे भी जाना है
उसके बाद ससुर के लिए दलिया, सास के लिए साबूदाना
और तुम्हारा लिए सिंगट्टा पकाना है
डार्लिंग तुम तो हमेशा झगड़ती रहती हो
काम कौन सा ढंग का करते हो झगड़ूं नहीं तो क्या करुं
तौलिया से सिर को पोछता हुआ पति बाहर आया
तो पत्नी अटैच बाथरुम के भीतर चली गई
जाते हुए पति को आदेश दे गई
एक काम करना 15 मिनट बाद चाय चढ़ा देना
मम्मी पापा के लिए बिना चीनी की
और बाकी तो तुम समझदार होना डार्लिंग
करीब डेढ़ घंटे बाद जब पति ने पत्नी के मुख से डार्लिंग सुना
तो उसका दिल भर आया
उसने प्रेम रस में भीगे शब्दों से कहा
ठीक है जान
निकल कर तो आओ तुम्हारे लिए चाय क्या नाश्ता भी बना दूंगा
हां हां ठीक है ठीक है
बाथरुम से निकलकर ताने की एक लहर पति के कानों तक पहुंची
हां पता है कितना बना लोगे नाश्ता
चाय ही बना लो तो बड़ी बात है
याद है ना पिछले संडे का शक्कर के बूरे की जगह नमक डाल दिया था
अरे जान उस दिन तो किचन में अंधेरा था
कुछ समझ ही नहीं आ रहा था
खैर पति ने गैस पर कुछ देर बाद चाय को चढ़ाया
और उस चाय को अपने बूढ़े मां बाप तक पहुंचाया
चाय की गर्मी पहुंचते ही जैसे बूढ़े दंपति के सीने को कुछ राहत मिली
वो अपनी रजाई में अब दुबके हुए थे
इस इंतज़ार में कि कब दलिया आएगा, कब साबूदाना आएगा
पति ने पत्नी के हिस्से की चाय केटली में रख दी
इस आस में कि पत्नी जब नहा धोकर निकलेगी तो चाय देखकर खुश हो जाएगी
लेकिन नहाकर निकली पत्नी के तेवर बदले हुए थे
बोली
गीजर में गर्म पानी क्यों नहीं बचाया था
पता है ठंडे पानी से नहाकर मेरी हालत खराब है
और तुम हो कि तुम्हें अखबार पढ़ने से फुर्सत नहीं
बहुत ठंड लग रही है
जल्दी से चाय बनाओ
पति फिर प्रेम से बोला
चाय हाज़िर है मेरी बेगम
ज्यादा होशियार न बनो
केटली में रखी चाय देते हो जाओ ताजी बनाकर लाओ
पति पत्नी के इस झगड़े में 12 बज गए
गुनगुनी धूप अब कुछ ज्यादा उबल रही थी
इसलिए बेटे ने मां और पिता जी की खाट को बाहर धूप में डाल दिया
जाड़े की ये दोपहर बुज़ुर्ग दंपति के लिए बड़ी सुहानी थी
इधर कमरे में नहा धोकर ताजी चाय पीकर पत्नी तैयार हो चुकी थी
अब उसे नाश्ते और खाने की ड्यूटी निभानी थी
बोली एजी सुनते हो
चूंकि पति अपने मां बाप के पास बैठे अखबार पढ़ रहा था
इसलिए पत्नि की आवाज़ को सुन न सका
पत्नी फिर बोली
एजी सुनते हो
पड़ोस के जेनरेटर की आवाज़ में ये आवाज़ फिर सुनाई न दी
इसलिए इस बार बेगम साहिबा का सुर बदल गया
एजी सुनते हो कहां मर गए
अरे आया आया कहो क्या कह रही हो
कितनी देर से बुलाती हूं
क्या तुमको समझ नहीं आता
बारह बज गए अभी तक नाश्ता नहीं बना
हाए रे फूटी किस्मत ऐसा पति मिला
शास्त्री जी ठीक ही कहते थे
कि तुम्हारा पति निठल्ला होगा
न नाश्ते की सुध, न खाने की सुध
चलो एक काम करो ये मैने लिस्ट बना दी है
जाओ बाज़ार से हफ्ते भर का राशन लेकर आओ
और हां ज़रा जल्दी आना
खाना बनाने में मेरी मदद करनी है, मैं तब तक नाश्ता बनाती हूं
ठीक है डार्लिंग मैं यूं गया और यूं आया
अब पत्नी किचन में जाती है
दो छोटे कूकर में बुज़ुर्गों का नाश्ता बनाती है
एक में दलिया, एक में साबू दाना है
दोनों के पकने का इंतज़ार करती है
करीब दस मिनट बाद ये नाश्ता उन बुज़ुर्गों को परोसा जाता है।
जाड़े की धूप में करीब साढ़े बारह बजे मिला ये नाश्ता
जन्नत सा अहसास कराता है
दोनों बिना दांतों के जबड़ों से नाश्ते की जुगाली करते हैं
सुबह 6 बजे के उठे ये बूढ़े दोपहर साढ़े बारह बजे नाश्ता करते हैं
पड़ोस के बनिये से हफ्ते भर का राशन लेकर पति घर आ गया था
पत्नी उस वक्त नाश्ता कर रही थी
इसलिए पति ने किचन में खुद जाकर सामान को रखा
पत्नी बोली
नाश्ता रखा है कढ़ाई में ले लेना अब मैं कहां किचन में आऊंगी
आजाओ बाहर ही लॉन में बैठकर साथ खाते हैं
नहीं मैं मम्मी पापा के पास बैठकर कर लूंगा
तुम उधर ही कर लो नाश्ता
हफ्ते भर बाद तो वक्त मिलता है इनके पास बैठने का
चलो ठीक है और हां उनसे पूछ लेना कि अगर और दलिया चाहिए तो किचन में रखा है
परोस देना
ठीक है।
करीब दस मिनट बाद पत्नी आवाज़ लगाती है
अतुल एक काम करना
तनिक सब्ज़ी काटने में मेरी मदद करना
कल दफ्तर से आते वक्त मेरे पैर में कांच चुभ गया था तो अब तक दर्द हो रहा है
हाए दईया मर गई
पत्नी ने शनिवार को चुभी उस कांच की वेदना प्रकट की
तो पति का गला भर आया
क्या हो गया मेरी जान
तुमने कल तो कुछ नहीं बताया
क्या बताती
तुम बेकार ही परेशान होते
आखिर मैं पति हूं तुम्हारा
तुम्हारे दुख दर्द का साथी हूं
मुझे नहीं तो किसे बताओगी
क्या यूं ही हर तकलीफ मुझसे छिपाओगी
पति के ये इमोशनल सवाल पत्नी के गले उतर गए
उसने कहा नहीं बस ऐसा कुछ नहीं
मैं तो बस मजाक कर रही थी
मैने सोचा इसी बहाने कुछ काम में हाथ बंट जाएगा
तुम और मैं कुछ देर साथ रहेंगे सब्ज़ी काटने के बहाने
अगर ऐसा ही था
तो ये चोट का नाटक क्यों ?
पत्नी बोली
तुम्हें सब्ज़ी काटनी है तो काटो वरना चलते बनो
सारा काम मैं ही कर लूंगी
पत्नी ने गुस्से से चाकू उठाया
और तेजी से सब्ज़ी पर चलाने लगी
मानो नाज़ियों की सेना यहूदियों का संहार कर रही हो
चाकू और सब्ज़ी के बीच हुई इस जंग में चाकू जीत गया
चित्रलेखा की उंगली कट गई
खून बेतरतीबी से बहा जा रहा था
और चित्रलेखा की आंखों से अश्रुओं का सैलाब बह रहा था
अतुल की नज़र जैसे ही चित्रलेखा की कटी उंगली पर पड़ी
उसने फौरन उस उंगली को अपने मुंह में रख लिया।
मानो वो उस खून को बहने न देना चाहता हो
अतुल को यूं देख चित्रलेखा बोली
क्या तुम मुझसे बहुत प्यार करते हो
पति आंखों में आंखें डालकर मसखरे अंदाज़ में बोला
नहीं तुम्हारी सौतन को बहुत प्यार करता हूं
ये मसखरा अंदाज़ पत्नी भांप न सकी
और बोली
तो जाओ जाते क्यों नहीं उस मीना कुमारी मधुबाला के पास
उसी की काटना उसी की चूसना
अब घर आए तो बताए देती हूं
पति अपनी पत्नी के तेवर देखकर बोला
अरे मैने तो मज़ाक में कहा था
तो मैं कौन सा सीरियस हूं
डार्लिंग तुम भी ना
पति के सॉफ्ट कॉर्नर का पत्नी ने फायदा उठाया
और बोली अच्छा एक काम करना
मैने सब्ज़ी काट दी है
अब तुम इसे गैस पर चढ़ा देना
आटा माढ़ दिया है रोटी बना देना
चावल भिगो दिये हैं
कूकर में पका लेना
मैं सोने जा रही हूं, दो घंटे बाद उठा लेना
मेरे तो बहुत दर्द हो रहा है
आज संडे के दिन बहुत काम हो जाता है
चाय बनाओ
नाश्ता बनाओ
खाना बनाओ
क्या क्या करें ???
अब थोड़ा काम तुम कर लो मैं सोने जा रही हूं प्लीज़
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