शुक्रवार, 30 मार्च 2012
रेडियो नहीं रोटी (सरकारी रहम से रोटी की जुगाड़)
सुशासन बाबू संचार क्रांति हमें क्या देगी ? अब ऐसा एक सवाल बिहार के महादलित अपने नेता नीतीश कुमार से पूछ रहे हैं। आपके दिमाग में सवाल जरुर आया होगा कि सिर्फ महादलित ही ऐसा क्यों सोच रहे होंगे ? तो इसका जवाब है कि बिहार सरकार ने दूसरे राज्यों की तरह उनके उद्धार के लिए कई योजनाएं चला रखी हैं। मसलन कई तरीकों के रंग बिरंगे कार्डों की योजनाएं महादलितों के सपनों की दुनिया को रंगीन करने के लिए रजिस्टरों में दर्ज कराई गईं हैं।लेकिन ऐसे लाल नीले पीले कार्डों से किसी की दुनिया में रंग भरे नहीं जा सकते। वो भी तब तक, जब तक कि किसी योजना को धरातल पर न उतार दिया गया हो। ये बात भी अलग है कि धरातल पर उतरने के बाद भी ये योजनाएं आज बिचौलियों की भेंट चढ़ती जा रही हैं।
बिहार महादलित विकास मिशन करीब 89 लाख 90 हज़ार महादलितों का उद्धार करने के लिए बिहार के 37 ज़िलों में काम कर रहा है। सूबे की 21 महादलित जातियों पर किया जाने वाले दफ्तरी कार्य बेहद सराहनीय है। इन सभी महादलितों के लिए सरकार ने कुछ न कुछ सोच रखा है। एक ऐसी ही योजना है महादलितों को रेडियो मुहैया कराने की। महादलितों को मुख्यधारा में लाने एवम् प्रभावी जीवन दृष्टि बनाने के लिए इस योजना के तहत प्रत्येक परिवार को रेडियो खरीदने के लिए लिए 400/- रु0 दिया गया। यहां सरकार का मकसद था कि सूबे के उन पिछड़े राज्यों तक संचार क्रांति को पहुंचाया जाए। जहां अब तक विकास की रोशनी नहीं पहुंच सकी है। कम से कम महादलित इस बात पर तो इतरा ही सकें कि उनके घर में संचार क्रांति के नाम पर एक रेडियो सरकार द्वारा पहुंचा दिया गया है।
रेडियो की इसी योजना के साथ महादलितों की पीर शुरु होती है। आपको यकीन तो न होगा कि कोई सरकारी योजना किसी के लिए पीर कैसे बन सकती है? लेकिन ये कड़वे घूंट की ऐसी सच्चाई है जिसे महादलित हर रात पिया करते हैं। दरअसल नीतीश सरकार ने जिन महादलितों को रेडियो बांटे हैं उन महादलितों के पास इतने भी पैसे नहीं हैं कि वे अपनी दिन भर की रोटी की जुगाड़ कर सके।
दिन भर अपने हाड़ को गलाते महादलित जैसे तैसे अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं। ऐसी स्थिति में जब बात रेडियो में सेल डालने की आती है। तो जिनके रेडियो के सेल जवाब दे गए । उन रेडियो में सेल आज तक पड़े ही नहीं। इसलिए रेडियो बेंचकर लोग रोटी की जुगाड़ कर रहे हैं। जो रेडियो सेलविहीन हो चुका है वो बच्चों के हाथ में महज़ एक खिलौने की तरह शोभा बढ़ाता दिखाई दे रहा है। यहां भी कहानी में एक पेंच है, जो रेडियो सरकार ने महादलितों के बीच बंटवाए हैं वो आधुनिकता के हिसाब से बेहद भारी और उनका मेंटिनेंस बहुत ज्यादा है। हर महीने उन रेडियो में तीस रुपए के सेल लगाने पड़ते हैं। महादलितों के लिए तीस रुपए की ये राशि एक दिन की रोटी की व्यवस्था कर देती है। इस लिहाज़ से रेडियो की ये योजना महादलितों के लिए अभिषाप जैसी बन गई है।
हो सकता है कि जब आपकी ये लुभावनी योजना महादलितों तक पहुंची हो तो सभी के चेहरों पर खुशी का माहौल दिखा हो। लेकिन नीतीश जी आज आपका सरकारी रहम इन महादलितों के काम नहीं आ रहा है। भूखा पेट कोई भजन नहीं सुनना चाहता। जब महादलितों को भूख लगेगी तो संचार क्रांति काम नहीं आएगी। वैसे भी जिस संचार क्रांति को आपने रेडियो के ज़रिए गांव गावं तक पहुंचाने की कोशिश की है वो संचार क्रांति महादलितों को बहुत महंगी पड़ रही है। एक महादलित औरत से जब रेडियो के बारे में कुछ पूछा जाता है। तो उसका पहला जवाब यही होता है कि रोटी की व्यवस्था करें, या रेडियो की मरम्मत कराएं। ऐसी स्थिति बेहद भयानक है। कि जिस राज्य में मुफलिसों पर सरकारें रहम करती हैं। उसी रहम को बेंचकर वो लोग अपने लिए एक दो दिन की रोटी का इंतज़ाम कर लेते हैं।
बिहार के हाकिम आपको ये बात समझनी होगी कि रेडियो से पेट नहीं भरता, अगर पेट किसी का भरना है तो उन्हें रोजगार देना होगा। ये हम नहीं वो लोग भी कह रहे हैं जिनकी ज़िंदगी अभावों के चलते जहन्नुम बन गई है। ये ठीक है कि आप (नीतीश) उनके बारे में सूचना क्रांति के नज़रिए से देखते हैं। लेकिन ऐसी सूचना क्रांति का कोई क्या खाक करेगा जब पेट फाकों को मजबूर होगा। हुजूर आप अपने सरकारी रहम की गत देखिए। सोचिए कि ये महादलित लोग आपके रहम को बेंचकर रोटी की जुगाड़ कर रहे हैं। बस इतना समझिए कि ये अपनी शिकायतें आप तक कभी नहीं पहुंचा सकेंगे। हम तो बस एक ज़रिया भर हैं। तय आपको करना है कि हाकिम अपनी रियाया को अब कितना करीब से जानेगा। क्योंकि ये बात याद रखिए लोग सरकारी रहम से रोटी की जुगाड़ कर रहे हैं।
शनिवार, 17 मार्च 2012
हे धरती के भगवान
हे धरती के भगवान।
तुमको मेरा कमर को आधार मानकर 45 डिग्री पर प्रणाम। पुतलियां पथरा गई थीं अरसे से टीवी देख देख कर । और तुम्हारे रनों का टोटा हर रोज़ मेरी चांद को टिपियाता। मैं झल्लाता । लेकिन तुम्हें मेरी झल्लाहट पर रहम न आता। लेकिन आज मैं सारे निजी कार्यों से निवृत्त होकर तुम्हारी अर्चना में जुटा था। सुबह से धूप दीव नैवेद्य के साथ तुम्हारी ईश्वर स्वरुप महिमा मंडित बल्ला उठाऊ तस्वीर का पूजन कर रहा था। पड़ोस से पंडित श्री श्री 108 कदाचित तामलोट लोटन प्रसाद सत्यानासी काशी निवासी पंडित राधे श्याम उपाध्याय को भी बुलवाया था। इस आशा में कि कहीं मुझसे पूजा में कोई मंत्र पढ़ गया तो तुम फिर शतक से चूक जाओगे। और मैं अपनी टांट को टिपियाता फिरुंगा। लेकिन तुम हे धरती के भगवान आज बरेली रोजा पैसेंजर की तरह जब चल निकले तो फिर बरेली से चलने के बाद रोजा ही रुके। तुमने वो महा सुस्त शतक बना ही डाला। जिसका इंतज़ार पिछले एक साल से आपके भक्त कर रहे थे। हे सट्टेबाजों के ईष्ट तुम मेरे घनिष्ट हो अब मुझे ये पता चल गया है। क्योंकि जिस धैर्यपूर्वक पारी में तुमने अपनी जीवटता की मिसाल पेश की है उसकी आशा किसी बुज़ुर्ग खिलाड़ी से ही की जा सकती है। तुमने 147 गेंदों का संहार किया। तब जाकर बड़ी मुश्किल से 114 रन जुटा सके। हे धरती के भगवान तुम्हारे धैर्य को मेरा फिर उसी डिग्री पर प्रणाम। हे क्रिकेट जगत के राजहंस तुम इस युग के ईसा हो। क्योंकि ईसा भी अपने विरोधियों के लिए कहा करते थे कि हे भगवान इन्हें क्षमा करना ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं। तुम भी तो यही कहते हो। लोग तुम्हारी आलोचना करते हैं। और तुम उनसे कुछ नहीं कहते अपना बड़प्पन दिखाकर उन्हें माफ कर देते हो। हे सचिन प्रभू आज तुम्हारे ही महा सुस्त शतक की बदौलत भारत बांग्लादेश जैसी पिद्दी टीम के सामने 289 बनाने लायक हुआ। लेकिन प्रभू की तो लीला अपरंपार होती है। देखिए कैसे झोली में गिर गया मैच बांग्लादेश की। हे दीन दुखियारे सटोरियों के महा प्रभू तुम्हारे महाशतक को मेरा महा प्रणाम। तुम ऐसे ही सतत खेलते जाना। किसी की न सुनना। साल में एक सैकड़ा मार देना। साल भर लोग तुम्हारी आलोचना करेंगे उसके बाद जब तुम शतक वीर बनोगे। तो टीवी पर ब्रेकिंग चलेगी। अखबार में मोटी मोटी सुर्खियां छपेंगी। क्रिकेट का बूढ़ा भगवान आज भी महान। तुम ऐसे ही क्रिक्रेट खेलोगे तो एक दिन तुम्हारा औसत कोर्टनी वॉल्श सा हो जाएगा। 42 से घटकर तुम्हारा औसत 4.2 तक आ जाएगा। तुम यहां भी रिकॉर्ड बना दोगे। क्योंकि तुम्हें सचिन रिकॉर्ड तेंदुलकर भगवान भी तो कहा जाता है। हे देवी अंजलि के देवता अब तुम्हारी संतान के क्रिक्रेट खेलने का वक्त आ गया है। तुम आदेश दोगे तो मैं उसके लिए भी अगरबत्ती जलाऊंगा । पंडित राधेश्याम को बुलवाऊंगा। लेकिन अब मेरी तुमसे एक गुहार है तुम क्रिकेट के सन्यासी हो जाओ। कुछ दिन घर बैठो । परिवार के साथ घूमो-फिरो। और फिर कुछ दिन बाद हमें कमेंट्री बॉक्स में दिखो। कृपया मेरी किसी भी बात को अन्यथा न लेना। मैं तो बस तुमसे विनम्र निवेदन कर रहा हूं। कहीं तुम नाराज़ न हो जाना। मैं तुम्हारी नाराज़गी को बर्दाश्त न कर पाऊंगा। सालों से क्रिकेट देख रहा हूं। तुम्हें मैने भगवान के रुप में पाया है। भगवान को कोई कुछ कहता है तो मुझे बुरा लगता है। इसलिए मेरी भी इज्जत का ख्याल रखना। एशिया कप के बाद मैदान में दिखाई न देना। मैं तो अपने भगवान को अब कमेंट्री बॉक्स में देखना चाहता हूं। हे दयानिधान मेरी गुहार पर गौर फरमाना। क्योंकि कमेंट्री बॉक्स में भी रोजगार के बड़े साधन है। इतना ही कहूंगा । ज्यादा वक्त न मेरे पास है और न ही तुम्हारे पास। चिट्ठी पहुंच जाए तो जवाब जरुर देना। भूल चूक लेनी देनी। तुम्हारा बनवारी लाल। इतिश्री फिलहाल।
तुमको मेरा कमर को आधार मानकर 45 डिग्री पर प्रणाम। पुतलियां पथरा गई थीं अरसे से टीवी देख देख कर । और तुम्हारे रनों का टोटा हर रोज़ मेरी चांद को टिपियाता। मैं झल्लाता । लेकिन तुम्हें मेरी झल्लाहट पर रहम न आता। लेकिन आज मैं सारे निजी कार्यों से निवृत्त होकर तुम्हारी अर्चना में जुटा था। सुबह से धूप दीव नैवेद्य के साथ तुम्हारी ईश्वर स्वरुप महिमा मंडित बल्ला उठाऊ तस्वीर का पूजन कर रहा था। पड़ोस से पंडित श्री श्री 108 कदाचित तामलोट लोटन प्रसाद सत्यानासी काशी निवासी पंडित राधे श्याम उपाध्याय को भी बुलवाया था। इस आशा में कि कहीं मुझसे पूजा में कोई मंत्र पढ़ गया तो तुम फिर शतक से चूक जाओगे। और मैं अपनी टांट को टिपियाता फिरुंगा। लेकिन तुम हे धरती के भगवान आज बरेली रोजा पैसेंजर की तरह जब चल निकले तो फिर बरेली से चलने के बाद रोजा ही रुके। तुमने वो महा सुस्त शतक बना ही डाला। जिसका इंतज़ार पिछले एक साल से आपके भक्त कर रहे थे। हे सट्टेबाजों के ईष्ट तुम मेरे घनिष्ट हो अब मुझे ये पता चल गया है। क्योंकि जिस धैर्यपूर्वक पारी में तुमने अपनी जीवटता की मिसाल पेश की है उसकी आशा किसी बुज़ुर्ग खिलाड़ी से ही की जा सकती है। तुमने 147 गेंदों का संहार किया। तब जाकर बड़ी मुश्किल से 114 रन जुटा सके। हे धरती के भगवान तुम्हारे धैर्य को मेरा फिर उसी डिग्री पर प्रणाम। हे क्रिकेट जगत के राजहंस तुम इस युग के ईसा हो। क्योंकि ईसा भी अपने विरोधियों के लिए कहा करते थे कि हे भगवान इन्हें क्षमा करना ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं। तुम भी तो यही कहते हो। लोग तुम्हारी आलोचना करते हैं। और तुम उनसे कुछ नहीं कहते अपना बड़प्पन दिखाकर उन्हें माफ कर देते हो। हे सचिन प्रभू आज तुम्हारे ही महा सुस्त शतक की बदौलत भारत बांग्लादेश जैसी पिद्दी टीम के सामने 289 बनाने लायक हुआ। लेकिन प्रभू की तो लीला अपरंपार होती है। देखिए कैसे झोली में गिर गया मैच बांग्लादेश की। हे दीन दुखियारे सटोरियों के महा प्रभू तुम्हारे महाशतक को मेरा महा प्रणाम। तुम ऐसे ही सतत खेलते जाना। किसी की न सुनना। साल में एक सैकड़ा मार देना। साल भर लोग तुम्हारी आलोचना करेंगे उसके बाद जब तुम शतक वीर बनोगे। तो टीवी पर ब्रेकिंग चलेगी। अखबार में मोटी मोटी सुर्खियां छपेंगी। क्रिकेट का बूढ़ा भगवान आज भी महान। तुम ऐसे ही क्रिक्रेट खेलोगे तो एक दिन तुम्हारा औसत कोर्टनी वॉल्श सा हो जाएगा। 42 से घटकर तुम्हारा औसत 4.2 तक आ जाएगा। तुम यहां भी रिकॉर्ड बना दोगे। क्योंकि तुम्हें सचिन रिकॉर्ड तेंदुलकर भगवान भी तो कहा जाता है। हे देवी अंजलि के देवता अब तुम्हारी संतान के क्रिक्रेट खेलने का वक्त आ गया है। तुम आदेश दोगे तो मैं उसके लिए भी अगरबत्ती जलाऊंगा । पंडित राधेश्याम को बुलवाऊंगा। लेकिन अब मेरी तुमसे एक गुहार है तुम क्रिकेट के सन्यासी हो जाओ। कुछ दिन घर बैठो । परिवार के साथ घूमो-फिरो। और फिर कुछ दिन बाद हमें कमेंट्री बॉक्स में दिखो। कृपया मेरी किसी भी बात को अन्यथा न लेना। मैं तो बस तुमसे विनम्र निवेदन कर रहा हूं। कहीं तुम नाराज़ न हो जाना। मैं तुम्हारी नाराज़गी को बर्दाश्त न कर पाऊंगा। सालों से क्रिकेट देख रहा हूं। तुम्हें मैने भगवान के रुप में पाया है। भगवान को कोई कुछ कहता है तो मुझे बुरा लगता है। इसलिए मेरी भी इज्जत का ख्याल रखना। एशिया कप के बाद मैदान में दिखाई न देना। मैं तो अपने भगवान को अब कमेंट्री बॉक्स में देखना चाहता हूं। हे दयानिधान मेरी गुहार पर गौर फरमाना। क्योंकि कमेंट्री बॉक्स में भी रोजगार के बड़े साधन है। इतना ही कहूंगा । ज्यादा वक्त न मेरे पास है और न ही तुम्हारे पास। चिट्ठी पहुंच जाए तो जवाब जरुर देना। भूल चूक लेनी देनी। तुम्हारा बनवारी लाल। इतिश्री फिलहाल।
बुधवार, 14 मार्च 2012
फेसबुक, फलाने सिंह और मेरी फीलिंग
ऑफिस में काम की छीछालेदर से मुक्ति पाई तो बैठ गया चंद पलों के लिए फेसबुक पर फंटियाने। हमारे यहां मध्य यूपी में फंटियाने से आशय होता है एक निठल्ले द्वारा निकम्मेपन का किया जाने वाला कार्य। इसलिए कार्यमुक्ति के बाद मैं ऑफीसरी नियम कानून के मुताबिक निठल्ला हो गया था। फेसबुक से ज्यादा पारिवारिक नहीं होने की वजह से मैं बहुत ज्यादा उसका इस्तेमाल नहीं करता। लेकिन ऑफिस में एक बार फेसबुक जरुर खोल लेता हूं, और कोशिश कर रहा हूं, कि इस डिजिटल रईसी से अपनी रिश्तेदारियां बढ़ा लूं।
अभी अपना खाता खोलने ही वाला था कि कम्प्यूटर चीख कर बोला आपके द्वारा भरा गया कूट शब्द गलत है, या फिर उपभोक्ता का नाम त्रुतिपूर्ण ढंग से दर्ज करवाया गया है। ऐसा एक बार नहीं तीन बार हुआ। बार बार यही जवाब थूथ पोथी के ज़रिए दिया जा रहा था। सब कुछ ठीक। लेकिन फिर भी फेसबुक मुझे स्वीकार नहीं कर रही थी। दिमाग भन्ना गया । कि सहसा मेरी नज़र कैप्स लॉक वाले बटन पर पड़ी। जो बेफिक्री के साथ खुला हुआ था। मैने उसको बंद किया और उसके बाद दोबारा लॉगिन किया। एक कोड को रिक्त स्थान में भरने के उपरांत चटाक से खाता खुल गया। फेसबुक के चारों कोनों में झांकने की कोशिश की गई। पाया कि फेसबुक पर न तो कहीं लाल निशान दिखाई दे रहा है, और न ही कहीं हरा निशान दिख रहा है। लेकिन कंप्यूटर स्क्रीन पर उल्टे हाथ की तरफ लगातार आने वाला एक अदृश्य सा संदेश बार बार ये कह रहा था । कि आपके मित्र फलाने सिंह के खाते पर किसी के द्वारा टिप्पणी की गई। किसी ने फलाने सिंह के खाते को पसंद किया। किसी ने फलाने सिंह को पोक किया। किसी ने टैग । किसी ने शेयर । तो किसी ने उनकी दीवार पर लिख दिया आपको जन्मदिन की पूर्वदत्त बधाई। जबकि फलाने सिंह का जन्मदिन दो दिन बाद था। फिर भी फलाने सिंह को किसी ने वक्त की कमी के चलते पहले ही बधाई दे दी थी। डिजिटल दोस्ती में बधाई संदेशों का ये बेहद द्रुतगामी तरीका है।
फलाने के लिए लगातार संदेश आये जा रहे थे। और बार बार उनके प्रालेख पर भेजे गए संदेशों की बत्ती मेरे प्रालेख पर चमक रही थी। फेसबुक पर फलाने सिंह के पांच हज़ार से ज्यादा मित्र हैं। इस लिहाज़ से उन्हें फेसबुक का करोड़पति तो आंका ही जा सकता है। फलाने एक घटिया शेर फेंकते हैं। तो एक झटके में सौ टिप्पणियां आ जाती हैं। जब बेहतरीन शेर फेंकते होंगे तो कितने आते होंगे मैं तो यही सोंचता रहता और जलता रहता। पड़ोसियों का सुख ही पड़ोसियों की जलन का कारण बनता है। खैर छोड़िए। इस बार फलाने सिंह ने एक ऐसा चोरी का शेर दे मारा है कि टिप्पणियों की बरसात हो गई। रुसवाई की पीड़ा से विकलांग हो चुके इस शेर पर लोग दनादन टिप्पणियां दिये जा रहे थे। कुछ लोग ऐसे भी थे जो उस शेर को पसंद भी कर रहे थे। ऐसा नहीं था कि पसंद करने वालों ने उस शेर पर टिप्पणी नहीं दी थी। कुछ ने टिप्पणी भी दी और पसंद भी किया। ये प्रक्रिया बताती थी, डिजिटल दोस्ती में फलाने सिंह ने काफी साख बना रखी है। वो जो लिखते हैं, उस पर टिप्पणियां दी जाती है, जो लिखते हैं, उसे पसंद किया जाता है। कई बार तो ऐसा भी होता कि जब कोई उनकी स्थिति पर पसंद का चिन्ह नहीं लगाता, और टिप्पणी नहीं देता, तो वो खुद अपने आप को पसंद कर लिया करते । संतोषम् परम् सुखम।
लेकिन कुछ भी हो मैं फलाने की फेसबुक प्रणाली से काफी प्रेरित था। और इसीलिए कई बार देखा देखी में ही फेसबुक खोल लिया करता था। फलाने सिंह गूगल खोलते। उस पर गालिब लिखते । गालिब का कोई शेर मिलता, तो उसमें थोड़ा संपादन करते, और फेसबुक पर स्टेटस के डब्बे में ठेल देते । फलाने के लिए इस तरह की चोरी कोई गुनाह नहीं थी। क्योंकि उन्हें पता है, वो जो लिखते हैं, उसे पसंद किया जाता है, जो विचार प्रस्तुत करते हैं, उस पर टिप्पणी दी जाती है। अगर फेसबुक पर पांच हज़ार से ज्यादा मित्रों वाले इंसान को पांच सौ से ज्यादा कमेंट आते हैं तो उसे फेसबुक का करोड़ पति आंका जाएगा। ऐसा मैं नहीं फलाने सिंह सोचते हैं।
शायद भारत में जब से फेसबुक का उदय हुआ था, तभी से फलाने सिंह फेसबुक पर बड़े ही धर्मनिरपेक्ष अंदाज़ में मित्रता के हाथ बढ़ाए हुए थे। इसीलिए उनके डिजिटल दोस्त पांच हज़ार से ज्यादा थे। और मेरे सिर्फ चार सौ कुछ। एक दिन मैने फलाने से उनके संदेशों पर आने वाली टिप्पणियों का राज़ पूछा तो उन्होने बड़े ही सरल अंदाज़ में बताया।
पहले एक काम करो।
नियमित अपना खाता खोलो।
खाते पर कोई निमंत्रण आये उसे स्वीकार करो।
निमंत्रण न भी आये तो तुम लोगों को अपनी तरफ से निमंत्रण भेजो।
रोज़ाना एक घंटे फेसबुक पर बैठने की प्रैक्टिस करो।
जो भी दिखे, उसे अपनी तरफ से निमंत्रण भेज दो।
कोई भी अपने स्थिति विवरण में सुधार करे तो उस पर तुरंत टिप्पणी दो।
कोई भी शोक गीत से लेकर प्रेम गीत तक लिखे उसे तुरंत पसंद करो।
जितना शीघ्र किसी पर टिप्पणी करोगे, या उसे पसंद करोगे, उतनी ही शीघ्रता से तुम्हारे मित्रों की संख्या बढ़ने लगेगी।
किसी का स्थिति विवरण बहुत अच्छा लगे, तो उसे लोगों में बांट दो।
ऐसा करने से लोग तुम्हारे मुरीद हो जाएंगे, और तुम फेसबुक के शहंशाह हो जाओगे।
फलाने सिंह की ये बात मुझे बड़ी ही अच्छी लगी, कि अगर डिजिटल दोस्तों की संख्या बढ़ानी है तो सिर्फ एक घंटे का श्रम करना है, और बस चंद गालिब के शेरों की चोरी कर उनका संपादन करना है।
वाह भई वाह
कमाल का विचार है।
हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा।
अब तो हम भइया ऐसे ही दोस्त बनाएंगे। पांच हज़ार नहीं पूरे दस हजार करके दिखाएंगे। क्योंकि फलाने सिंह की तरह हम फेसबुक पर एक घंटा नहीं पूरे दो घंटे बिताएंगे। फिर बताएंगे कि कैसे इतराया जाता है फेसबुक की टिप्पणियों पर। हुंह। जाओ सनीचर मेरे बंगला से। अब क्यों राखी देर लगाये। बड़े आए फलाने सिंह।
अभी अपना खाता खोलने ही वाला था कि कम्प्यूटर चीख कर बोला आपके द्वारा भरा गया कूट शब्द गलत है, या फिर उपभोक्ता का नाम त्रुतिपूर्ण ढंग से दर्ज करवाया गया है। ऐसा एक बार नहीं तीन बार हुआ। बार बार यही जवाब थूथ पोथी के ज़रिए दिया जा रहा था। सब कुछ ठीक। लेकिन फिर भी फेसबुक मुझे स्वीकार नहीं कर रही थी। दिमाग भन्ना गया । कि सहसा मेरी नज़र कैप्स लॉक वाले बटन पर पड़ी। जो बेफिक्री के साथ खुला हुआ था। मैने उसको बंद किया और उसके बाद दोबारा लॉगिन किया। एक कोड को रिक्त स्थान में भरने के उपरांत चटाक से खाता खुल गया। फेसबुक के चारों कोनों में झांकने की कोशिश की गई। पाया कि फेसबुक पर न तो कहीं लाल निशान दिखाई दे रहा है, और न ही कहीं हरा निशान दिख रहा है। लेकिन कंप्यूटर स्क्रीन पर उल्टे हाथ की तरफ लगातार आने वाला एक अदृश्य सा संदेश बार बार ये कह रहा था । कि आपके मित्र फलाने सिंह के खाते पर किसी के द्वारा टिप्पणी की गई। किसी ने फलाने सिंह के खाते को पसंद किया। किसी ने फलाने सिंह को पोक किया। किसी ने टैग । किसी ने शेयर । तो किसी ने उनकी दीवार पर लिख दिया आपको जन्मदिन की पूर्वदत्त बधाई। जबकि फलाने सिंह का जन्मदिन दो दिन बाद था। फिर भी फलाने सिंह को किसी ने वक्त की कमी के चलते पहले ही बधाई दे दी थी। डिजिटल दोस्ती में बधाई संदेशों का ये बेहद द्रुतगामी तरीका है।
फलाने के लिए लगातार संदेश आये जा रहे थे। और बार बार उनके प्रालेख पर भेजे गए संदेशों की बत्ती मेरे प्रालेख पर चमक रही थी। फेसबुक पर फलाने सिंह के पांच हज़ार से ज्यादा मित्र हैं। इस लिहाज़ से उन्हें फेसबुक का करोड़पति तो आंका ही जा सकता है। फलाने एक घटिया शेर फेंकते हैं। तो एक झटके में सौ टिप्पणियां आ जाती हैं। जब बेहतरीन शेर फेंकते होंगे तो कितने आते होंगे मैं तो यही सोंचता रहता और जलता रहता। पड़ोसियों का सुख ही पड़ोसियों की जलन का कारण बनता है। खैर छोड़िए। इस बार फलाने सिंह ने एक ऐसा चोरी का शेर दे मारा है कि टिप्पणियों की बरसात हो गई। रुसवाई की पीड़ा से विकलांग हो चुके इस शेर पर लोग दनादन टिप्पणियां दिये जा रहे थे। कुछ लोग ऐसे भी थे जो उस शेर को पसंद भी कर रहे थे। ऐसा नहीं था कि पसंद करने वालों ने उस शेर पर टिप्पणी नहीं दी थी। कुछ ने टिप्पणी भी दी और पसंद भी किया। ये प्रक्रिया बताती थी, डिजिटल दोस्ती में फलाने सिंह ने काफी साख बना रखी है। वो जो लिखते हैं, उस पर टिप्पणियां दी जाती है, जो लिखते हैं, उसे पसंद किया जाता है। कई बार तो ऐसा भी होता कि जब कोई उनकी स्थिति पर पसंद का चिन्ह नहीं लगाता, और टिप्पणी नहीं देता, तो वो खुद अपने आप को पसंद कर लिया करते । संतोषम् परम् सुखम।
लेकिन कुछ भी हो मैं फलाने की फेसबुक प्रणाली से काफी प्रेरित था। और इसीलिए कई बार देखा देखी में ही फेसबुक खोल लिया करता था। फलाने सिंह गूगल खोलते। उस पर गालिब लिखते । गालिब का कोई शेर मिलता, तो उसमें थोड़ा संपादन करते, और फेसबुक पर स्टेटस के डब्बे में ठेल देते । फलाने के लिए इस तरह की चोरी कोई गुनाह नहीं थी। क्योंकि उन्हें पता है, वो जो लिखते हैं, उसे पसंद किया जाता है, जो विचार प्रस्तुत करते हैं, उस पर टिप्पणी दी जाती है। अगर फेसबुक पर पांच हज़ार से ज्यादा मित्रों वाले इंसान को पांच सौ से ज्यादा कमेंट आते हैं तो उसे फेसबुक का करोड़ पति आंका जाएगा। ऐसा मैं नहीं फलाने सिंह सोचते हैं।
शायद भारत में जब से फेसबुक का उदय हुआ था, तभी से फलाने सिंह फेसबुक पर बड़े ही धर्मनिरपेक्ष अंदाज़ में मित्रता के हाथ बढ़ाए हुए थे। इसीलिए उनके डिजिटल दोस्त पांच हज़ार से ज्यादा थे। और मेरे सिर्फ चार सौ कुछ। एक दिन मैने फलाने से उनके संदेशों पर आने वाली टिप्पणियों का राज़ पूछा तो उन्होने बड़े ही सरल अंदाज़ में बताया।
पहले एक काम करो।
नियमित अपना खाता खोलो।
खाते पर कोई निमंत्रण आये उसे स्वीकार करो।
निमंत्रण न भी आये तो तुम लोगों को अपनी तरफ से निमंत्रण भेजो।
रोज़ाना एक घंटे फेसबुक पर बैठने की प्रैक्टिस करो।
जो भी दिखे, उसे अपनी तरफ से निमंत्रण भेज दो।
कोई भी अपने स्थिति विवरण में सुधार करे तो उस पर तुरंत टिप्पणी दो।
कोई भी शोक गीत से लेकर प्रेम गीत तक लिखे उसे तुरंत पसंद करो।
जितना शीघ्र किसी पर टिप्पणी करोगे, या उसे पसंद करोगे, उतनी ही शीघ्रता से तुम्हारे मित्रों की संख्या बढ़ने लगेगी।
किसी का स्थिति विवरण बहुत अच्छा लगे, तो उसे लोगों में बांट दो।
ऐसा करने से लोग तुम्हारे मुरीद हो जाएंगे, और तुम फेसबुक के शहंशाह हो जाओगे।
फलाने सिंह की ये बात मुझे बड़ी ही अच्छी लगी, कि अगर डिजिटल दोस्तों की संख्या बढ़ानी है तो सिर्फ एक घंटे का श्रम करना है, और बस चंद गालिब के शेरों की चोरी कर उनका संपादन करना है।
वाह भई वाह
कमाल का विचार है।
हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा।
अब तो हम भइया ऐसे ही दोस्त बनाएंगे। पांच हज़ार नहीं पूरे दस हजार करके दिखाएंगे। क्योंकि फलाने सिंह की तरह हम फेसबुक पर एक घंटा नहीं पूरे दो घंटे बिताएंगे। फिर बताएंगे कि कैसे इतराया जाता है फेसबुक की टिप्पणियों पर। हुंह। जाओ सनीचर मेरे बंगला से। अब क्यों राखी देर लगाये। बड़े आए फलाने सिंह।
शनिवार, 18 फ़रवरी 2012
संडे सिंन्ड्रोम (पति पत्नी की वेदना)
पूरे 6 दिन बाद फिर से संडे आ गया
छुट्टी का दिन, फुरसत का लम्हा
आज फिर 6 दिन बाद एक दंपति देर से सोकर उठे हैं
बेफिक्र हैं
जाड़े के मौसम में बिस्तर पर अंगड़ाइयां ले रहे हैं
कमरे से बाहर
आज बूढ़ी मां के झाड़ू लगाने का मौका है
अस्सी साल की ये झुकी हुई पीठ
पूरा आंगन बहोरती है
शनय शनय मां की तकलीफें सर्दी से कांपते होठों पर आ जाती हैं
धीरे धीरे वो बड़बड़ाने लगती है
लेकिन इस तरीके से कि कोई सुन ना सके
इधर नौकरी पेशा दंपति का हाल ज्यों का त्यों है
वो अभी भी अपने आप को थका हारा महसूस कर रहे हैं
इसलिए बिस्तर पर ही आराम कर रहे हैं
कि अचानक पति ने कमरे से बाहर नज़र डाली
तो पाया कि मां कुछ बुदबुदाकर झाड़ू लगाने में व्यस्त है
आखिर आज का ही तो दिन है जब उसे काम करना है
ये सोचकर उस मां का बेटा फिर सो गया
पत्नी पहले से सो रही थी
घड़ी का छोटा कांटा 9 तक पहुंच चुका था, जबकि बड़ा ठीक 12 पर था।
गुनगुनी धूप कमरे के भीतर प्रवेश कर गई
इतने में दंपति की आंख खुल गई
आंखों को दोनो मलते हुए, हाथों से योग करते हुए, दोनो खड़े हुए
पत्नी ने अपने हाथों से बिस्तर को तहाया
फिर पति से अकड़कर बोली
तू इतनी देर से उठा अब तक क्यों नहीं नहाया ?
पति बोला
डार्लिंग आपको बोला तो था आज संडे है
थोड़ा देर तक सोने दो
पत्नी बोली
जानते हो तुम्हारे चक्कर में मैं कितना लेट हो गई
हर रोज़ 6 बजे उठती हूं
आज 6 को तुमने उल्टा
सब तुम्हारी गलती है
तुम्हें पता है ना मां कहती है
चाय नहीं बनी, नाश्ता नहीं बना, खाना कब बनाओगी
क्या बिस्तर में पड़ी सोती ही रहोगी
काम की ना काज की नौ मन अनाज की
पति बेचारा पहले ही काम के बोझ का मारा
पत्नि से एक बार फिर सकुचा कर बोला
जानू वो हमारी मां है, और वो जो खाट पर बैठे हैं वो हमारे बाप हैं
क्या इनकी बातें तुम्हें ताने सी लगती हैं
सोचो इन्होंने तो तुम्हारे पति को पाला है
इन्हीं के पास अपनी किस्मत का ताला है
पत्नी बोली
चलो बातें न बनाओ आज संडे है काम करने दो
खुद तो देर से सोकर उठते हैं मेरी भी आदत खराब करते हैं
इतने में दरवाज़े पर दस्तक हुई
पत्नी ने अपने बिखरे बालों को पीछे समेटने की कोशिश की
और पहुंच गई दरवाज़े तक
गोपाल आज तुम भी बहुत लेट आए हो ?
क्या दूध में पानी मिलाकर लाये हो
अरे नहीं बीबीजी आज देर से सोकर उठा था
संडे था ना इसलिए
वैसे आज हिसाब हो जाता तो ठीक रहता
कुल महीने के 700 रुपए होते हैं
चलो ठीक है, अगर दूध पनीला हुआ तो पैसे न दूंगी
अरे बीबीजी गरीब के पेट पर लात काहे मारती हैं
चलो चलो अच्छा ठीक है आती हूं पैसे लेकर
इधर पति दैनिक क्रिया से निवृत्त होने के लिए अटैच बाथरुम में चला गया था
अखबार अपने साथ ले गया था
पत्नी बोली
अरे क्या आज संडे के दिन अखबार नहीं आया
बाथरुम से गूंजती हुई एक आवाज़ आई
आया है मेरी रुपमती मेरे पास है
हां हां और कोई जगह नहीं मिली अखबार पढ़ने के लिए
तुम कहो तो तुम्हारा नाश्ता भी वहीं भिजवा दूं
खाते रहना, निकालते रहना
डार्लिंग तुम तो मसखरी करती है
देखो !
खून न जलाओ मेरा
एक तो वैसे भी इतना काम पड़ा है
बाहर दूध वाला पैसे लेने पर अड़ा है
मेरी जेब से निकाल कर दे दो ना कल ही तो सेलरी अकाउंट में आई थी
पत्नी ने जेब से 700 रुपए निकाले
और दूध वाले की ओर बढ़ा दिये
दूध वाला शुक्रिया अदा करते हुए आगे बढ़ गया
अरे सुनते हो, दस बज गया है
क्या वहीं बैठे रहोगे या हमारी सौतन से गप्पें लड़ा रहे हो
पति बोला
सौतन से गप्पें लड़ानी होंगी
तो पखाने के बजाय पार्क नहीं जाऊंगा
फालतू में शक करती हो
कल बताया नहीं था कब्ज़ियत हो गई है
चलो चलो जल्दी निकलो मुझे भी जाना है
उसके बाद ससुर के लिए दलिया, सास के लिए साबूदाना
और तुम्हारा लिए सिंगट्टा पकाना है
डार्लिंग तुम तो हमेशा झगड़ती रहती हो
काम कौन सा ढंग का करते हो झगड़ूं नहीं तो क्या करुं
तौलिया से सिर को पोछता हुआ पति बाहर आया
तो पत्नी अटैच बाथरुम के भीतर चली गई
जाते हुए पति को आदेश दे गई
एक काम करना 15 मिनट बाद चाय चढ़ा देना
मम्मी पापा के लिए बिना चीनी की
और बाकी तो तुम समझदार होना डार्लिंग
करीब डेढ़ घंटे बाद जब पति ने पत्नी के मुख से डार्लिंग सुना
तो उसका दिल भर आया
उसने प्रेम रस में भीगे शब्दों से कहा
ठीक है जान
निकल कर तो आओ तुम्हारे लिए चाय क्या नाश्ता भी बना दूंगा
हां हां ठीक है ठीक है
बाथरुम से निकलकर ताने की एक लहर पति के कानों तक पहुंची
हां पता है कितना बना लोगे नाश्ता
चाय ही बना लो तो बड़ी बात है
याद है ना पिछले संडे का शक्कर के बूरे की जगह नमक डाल दिया था
अरे जान उस दिन तो किचन में अंधेरा था
कुछ समझ ही नहीं आ रहा था
खैर पति ने गैस पर कुछ देर बाद चाय को चढ़ाया
और उस चाय को अपने बूढ़े मां बाप तक पहुंचाया
चाय की गर्मी पहुंचते ही जैसे बूढ़े दंपति के सीने को कुछ राहत मिली
वो अपनी रजाई में अब दुबके हुए थे
इस इंतज़ार में कि कब दलिया आएगा, कब साबूदाना आएगा
पति ने पत्नी के हिस्से की चाय केटली में रख दी
इस आस में कि पत्नी जब नहा धोकर निकलेगी तो चाय देखकर खुश हो जाएगी
लेकिन नहाकर निकली पत्नी के तेवर बदले हुए थे
बोली
गीजर में गर्म पानी क्यों नहीं बचाया था
पता है ठंडे पानी से नहाकर मेरी हालत खराब है
और तुम हो कि तुम्हें अखबार पढ़ने से फुर्सत नहीं
बहुत ठंड लग रही है
जल्दी से चाय बनाओ
पति फिर प्रेम से बोला
चाय हाज़िर है मेरी बेगम
ज्यादा होशियार न बनो
केटली में रखी चाय देते हो जाओ ताजी बनाकर लाओ
पति पत्नी के इस झगड़े में 12 बज गए
गुनगुनी धूप अब कुछ ज्यादा उबल रही थी
इसलिए बेटे ने मां और पिता जी की खाट को बाहर धूप में डाल दिया
जाड़े की ये दोपहर बुज़ुर्ग दंपति के लिए बड़ी सुहानी थी
इधर कमरे में नहा धोकर ताजी चाय पीकर पत्नी तैयार हो चुकी थी
अब उसे नाश्ते और खाने की ड्यूटी निभानी थी
बोली एजी सुनते हो
चूंकि पति अपने मां बाप के पास बैठे अखबार पढ़ रहा था
इसलिए पत्नि की आवाज़ को सुन न सका
पत्नी फिर बोली
एजी सुनते हो
पड़ोस के जेनरेटर की आवाज़ में ये आवाज़ फिर सुनाई न दी
इसलिए इस बार बेगम साहिबा का सुर बदल गया
एजी सुनते हो कहां मर गए
अरे आया आया कहो क्या कह रही हो
कितनी देर से बुलाती हूं
क्या तुमको समझ नहीं आता
बारह बज गए अभी तक नाश्ता नहीं बना
हाए रे फूटी किस्मत ऐसा पति मिला
शास्त्री जी ठीक ही कहते थे
कि तुम्हारा पति निठल्ला होगा
न नाश्ते की सुध, न खाने की सुध
चलो एक काम करो ये मैने लिस्ट बना दी है
जाओ बाज़ार से हफ्ते भर का राशन लेकर आओ
और हां ज़रा जल्दी आना
खाना बनाने में मेरी मदद करनी है, मैं तब तक नाश्ता बनाती हूं
ठीक है डार्लिंग मैं यूं गया और यूं आया
अब पत्नी किचन में जाती है
दो छोटे कूकर में बुज़ुर्गों का नाश्ता बनाती है
एक में दलिया, एक में साबू दाना है
दोनों के पकने का इंतज़ार करती है
करीब दस मिनट बाद ये नाश्ता उन बुज़ुर्गों को परोसा जाता है।
जाड़े की धूप में करीब साढ़े बारह बजे मिला ये नाश्ता
जन्नत सा अहसास कराता है
दोनों बिना दांतों के जबड़ों से नाश्ते की जुगाली करते हैं
सुबह 6 बजे के उठे ये बूढ़े दोपहर साढ़े बारह बजे नाश्ता करते हैं
पड़ोस के बनिये से हफ्ते भर का राशन लेकर पति घर आ गया था
पत्नी उस वक्त नाश्ता कर रही थी
इसलिए पति ने किचन में खुद जाकर सामान को रखा
पत्नी बोली
नाश्ता रखा है कढ़ाई में ले लेना अब मैं कहां किचन में आऊंगी
आजाओ बाहर ही लॉन में बैठकर साथ खाते हैं
नहीं मैं मम्मी पापा के पास बैठकर कर लूंगा
तुम उधर ही कर लो नाश्ता
हफ्ते भर बाद तो वक्त मिलता है इनके पास बैठने का
चलो ठीक है और हां उनसे पूछ लेना कि अगर और दलिया चाहिए तो किचन में रखा है
परोस देना
ठीक है।
करीब दस मिनट बाद पत्नी आवाज़ लगाती है
अतुल एक काम करना
तनिक सब्ज़ी काटने में मेरी मदद करना
कल दफ्तर से आते वक्त मेरे पैर में कांच चुभ गया था तो अब तक दर्द हो रहा है
हाए दईया मर गई
पत्नी ने शनिवार को चुभी उस कांच की वेदना प्रकट की
तो पति का गला भर आया
क्या हो गया मेरी जान
तुमने कल तो कुछ नहीं बताया
क्या बताती
तुम बेकार ही परेशान होते
आखिर मैं पति हूं तुम्हारा
तुम्हारे दुख दर्द का साथी हूं
मुझे नहीं तो किसे बताओगी
क्या यूं ही हर तकलीफ मुझसे छिपाओगी
पति के ये इमोशनल सवाल पत्नी के गले उतर गए
उसने कहा नहीं बस ऐसा कुछ नहीं
मैं तो बस मजाक कर रही थी
मैने सोचा इसी बहाने कुछ काम में हाथ बंट जाएगा
तुम और मैं कुछ देर साथ रहेंगे सब्ज़ी काटने के बहाने
अगर ऐसा ही था
तो ये चोट का नाटक क्यों ?
पत्नी बोली
तुम्हें सब्ज़ी काटनी है तो काटो वरना चलते बनो
सारा काम मैं ही कर लूंगी
पत्नी ने गुस्से से चाकू उठाया
और तेजी से सब्ज़ी पर चलाने लगी
मानो नाज़ियों की सेना यहूदियों का संहार कर रही हो
चाकू और सब्ज़ी के बीच हुई इस जंग में चाकू जीत गया
चित्रलेखा की उंगली कट गई
खून बेतरतीबी से बहा जा रहा था
और चित्रलेखा की आंखों से अश्रुओं का सैलाब बह रहा था
अतुल की नज़र जैसे ही चित्रलेखा की कटी उंगली पर पड़ी
उसने फौरन उस उंगली को अपने मुंह में रख लिया।
मानो वो उस खून को बहने न देना चाहता हो
अतुल को यूं देख चित्रलेखा बोली
क्या तुम मुझसे बहुत प्यार करते हो
पति आंखों में आंखें डालकर मसखरे अंदाज़ में बोला
नहीं तुम्हारी सौतन को बहुत प्यार करता हूं
ये मसखरा अंदाज़ पत्नी भांप न सकी
और बोली
तो जाओ जाते क्यों नहीं उस मीना कुमारी मधुबाला के पास
उसी की काटना उसी की चूसना
अब घर आए तो बताए देती हूं
पति अपनी पत्नी के तेवर देखकर बोला
अरे मैने तो मज़ाक में कहा था
तो मैं कौन सा सीरियस हूं
डार्लिंग तुम भी ना
पति के सॉफ्ट कॉर्नर का पत्नी ने फायदा उठाया
और बोली अच्छा एक काम करना
मैने सब्ज़ी काट दी है
अब तुम इसे गैस पर चढ़ा देना
आटा माढ़ दिया है रोटी बना देना
चावल भिगो दिये हैं
कूकर में पका लेना
मैं सोने जा रही हूं, दो घंटे बाद उठा लेना
मेरे तो बहुत दर्द हो रहा है
आज संडे के दिन बहुत काम हो जाता है
चाय बनाओ
नाश्ता बनाओ
खाना बनाओ
क्या क्या करें ???
अब थोड़ा काम तुम कर लो मैं सोने जा रही हूं प्लीज़
छुट्टी का दिन, फुरसत का लम्हा
आज फिर 6 दिन बाद एक दंपति देर से सोकर उठे हैं
बेफिक्र हैं
जाड़े के मौसम में बिस्तर पर अंगड़ाइयां ले रहे हैं
कमरे से बाहर
आज बूढ़ी मां के झाड़ू लगाने का मौका है
अस्सी साल की ये झुकी हुई पीठ
पूरा आंगन बहोरती है
शनय शनय मां की तकलीफें सर्दी से कांपते होठों पर आ जाती हैं
धीरे धीरे वो बड़बड़ाने लगती है
लेकिन इस तरीके से कि कोई सुन ना सके
इधर नौकरी पेशा दंपति का हाल ज्यों का त्यों है
वो अभी भी अपने आप को थका हारा महसूस कर रहे हैं
इसलिए बिस्तर पर ही आराम कर रहे हैं
कि अचानक पति ने कमरे से बाहर नज़र डाली
तो पाया कि मां कुछ बुदबुदाकर झाड़ू लगाने में व्यस्त है
आखिर आज का ही तो दिन है जब उसे काम करना है
ये सोचकर उस मां का बेटा फिर सो गया
पत्नी पहले से सो रही थी
घड़ी का छोटा कांटा 9 तक पहुंच चुका था, जबकि बड़ा ठीक 12 पर था।
गुनगुनी धूप कमरे के भीतर प्रवेश कर गई
इतने में दंपति की आंख खुल गई
आंखों को दोनो मलते हुए, हाथों से योग करते हुए, दोनो खड़े हुए
पत्नी ने अपने हाथों से बिस्तर को तहाया
फिर पति से अकड़कर बोली
तू इतनी देर से उठा अब तक क्यों नहीं नहाया ?
पति बोला
डार्लिंग आपको बोला तो था आज संडे है
थोड़ा देर तक सोने दो
पत्नी बोली
जानते हो तुम्हारे चक्कर में मैं कितना लेट हो गई
हर रोज़ 6 बजे उठती हूं
आज 6 को तुमने उल्टा
सब तुम्हारी गलती है
तुम्हें पता है ना मां कहती है
चाय नहीं बनी, नाश्ता नहीं बना, खाना कब बनाओगी
क्या बिस्तर में पड़ी सोती ही रहोगी
काम की ना काज की नौ मन अनाज की
पति बेचारा पहले ही काम के बोझ का मारा
पत्नि से एक बार फिर सकुचा कर बोला
जानू वो हमारी मां है, और वो जो खाट पर बैठे हैं वो हमारे बाप हैं
क्या इनकी बातें तुम्हें ताने सी लगती हैं
सोचो इन्होंने तो तुम्हारे पति को पाला है
इन्हीं के पास अपनी किस्मत का ताला है
पत्नी बोली
चलो बातें न बनाओ आज संडे है काम करने दो
खुद तो देर से सोकर उठते हैं मेरी भी आदत खराब करते हैं
इतने में दरवाज़े पर दस्तक हुई
पत्नी ने अपने बिखरे बालों को पीछे समेटने की कोशिश की
और पहुंच गई दरवाज़े तक
गोपाल आज तुम भी बहुत लेट आए हो ?
क्या दूध में पानी मिलाकर लाये हो
अरे नहीं बीबीजी आज देर से सोकर उठा था
संडे था ना इसलिए
वैसे आज हिसाब हो जाता तो ठीक रहता
कुल महीने के 700 रुपए होते हैं
चलो ठीक है, अगर दूध पनीला हुआ तो पैसे न दूंगी
अरे बीबीजी गरीब के पेट पर लात काहे मारती हैं
चलो चलो अच्छा ठीक है आती हूं पैसे लेकर
इधर पति दैनिक क्रिया से निवृत्त होने के लिए अटैच बाथरुम में चला गया था
अखबार अपने साथ ले गया था
पत्नी बोली
अरे क्या आज संडे के दिन अखबार नहीं आया
बाथरुम से गूंजती हुई एक आवाज़ आई
आया है मेरी रुपमती मेरे पास है
हां हां और कोई जगह नहीं मिली अखबार पढ़ने के लिए
तुम कहो तो तुम्हारा नाश्ता भी वहीं भिजवा दूं
खाते रहना, निकालते रहना
डार्लिंग तुम तो मसखरी करती है
देखो !
खून न जलाओ मेरा
एक तो वैसे भी इतना काम पड़ा है
बाहर दूध वाला पैसे लेने पर अड़ा है
मेरी जेब से निकाल कर दे दो ना कल ही तो सेलरी अकाउंट में आई थी
पत्नी ने जेब से 700 रुपए निकाले
और दूध वाले की ओर बढ़ा दिये
दूध वाला शुक्रिया अदा करते हुए आगे बढ़ गया
अरे सुनते हो, दस बज गया है
क्या वहीं बैठे रहोगे या हमारी सौतन से गप्पें लड़ा रहे हो
पति बोला
सौतन से गप्पें लड़ानी होंगी
तो पखाने के बजाय पार्क नहीं जाऊंगा
फालतू में शक करती हो
कल बताया नहीं था कब्ज़ियत हो गई है
चलो चलो जल्दी निकलो मुझे भी जाना है
उसके बाद ससुर के लिए दलिया, सास के लिए साबूदाना
और तुम्हारा लिए सिंगट्टा पकाना है
डार्लिंग तुम तो हमेशा झगड़ती रहती हो
काम कौन सा ढंग का करते हो झगड़ूं नहीं तो क्या करुं
तौलिया से सिर को पोछता हुआ पति बाहर आया
तो पत्नी अटैच बाथरुम के भीतर चली गई
जाते हुए पति को आदेश दे गई
एक काम करना 15 मिनट बाद चाय चढ़ा देना
मम्मी पापा के लिए बिना चीनी की
और बाकी तो तुम समझदार होना डार्लिंग
करीब डेढ़ घंटे बाद जब पति ने पत्नी के मुख से डार्लिंग सुना
तो उसका दिल भर आया
उसने प्रेम रस में भीगे शब्दों से कहा
ठीक है जान
निकल कर तो आओ तुम्हारे लिए चाय क्या नाश्ता भी बना दूंगा
हां हां ठीक है ठीक है
बाथरुम से निकलकर ताने की एक लहर पति के कानों तक पहुंची
हां पता है कितना बना लोगे नाश्ता
चाय ही बना लो तो बड़ी बात है
याद है ना पिछले संडे का शक्कर के बूरे की जगह नमक डाल दिया था
अरे जान उस दिन तो किचन में अंधेरा था
कुछ समझ ही नहीं आ रहा था
खैर पति ने गैस पर कुछ देर बाद चाय को चढ़ाया
और उस चाय को अपने बूढ़े मां बाप तक पहुंचाया
चाय की गर्मी पहुंचते ही जैसे बूढ़े दंपति के सीने को कुछ राहत मिली
वो अपनी रजाई में अब दुबके हुए थे
इस इंतज़ार में कि कब दलिया आएगा, कब साबूदाना आएगा
पति ने पत्नी के हिस्से की चाय केटली में रख दी
इस आस में कि पत्नी जब नहा धोकर निकलेगी तो चाय देखकर खुश हो जाएगी
लेकिन नहाकर निकली पत्नी के तेवर बदले हुए थे
बोली
गीजर में गर्म पानी क्यों नहीं बचाया था
पता है ठंडे पानी से नहाकर मेरी हालत खराब है
और तुम हो कि तुम्हें अखबार पढ़ने से फुर्सत नहीं
बहुत ठंड लग रही है
जल्दी से चाय बनाओ
पति फिर प्रेम से बोला
चाय हाज़िर है मेरी बेगम
ज्यादा होशियार न बनो
केटली में रखी चाय देते हो जाओ ताजी बनाकर लाओ
पति पत्नी के इस झगड़े में 12 बज गए
गुनगुनी धूप अब कुछ ज्यादा उबल रही थी
इसलिए बेटे ने मां और पिता जी की खाट को बाहर धूप में डाल दिया
जाड़े की ये दोपहर बुज़ुर्ग दंपति के लिए बड़ी सुहानी थी
इधर कमरे में नहा धोकर ताजी चाय पीकर पत्नी तैयार हो चुकी थी
अब उसे नाश्ते और खाने की ड्यूटी निभानी थी
बोली एजी सुनते हो
चूंकि पति अपने मां बाप के पास बैठे अखबार पढ़ रहा था
इसलिए पत्नि की आवाज़ को सुन न सका
पत्नी फिर बोली
एजी सुनते हो
पड़ोस के जेनरेटर की आवाज़ में ये आवाज़ फिर सुनाई न दी
इसलिए इस बार बेगम साहिबा का सुर बदल गया
एजी सुनते हो कहां मर गए
अरे आया आया कहो क्या कह रही हो
कितनी देर से बुलाती हूं
क्या तुमको समझ नहीं आता
बारह बज गए अभी तक नाश्ता नहीं बना
हाए रे फूटी किस्मत ऐसा पति मिला
शास्त्री जी ठीक ही कहते थे
कि तुम्हारा पति निठल्ला होगा
न नाश्ते की सुध, न खाने की सुध
चलो एक काम करो ये मैने लिस्ट बना दी है
जाओ बाज़ार से हफ्ते भर का राशन लेकर आओ
और हां ज़रा जल्दी आना
खाना बनाने में मेरी मदद करनी है, मैं तब तक नाश्ता बनाती हूं
ठीक है डार्लिंग मैं यूं गया और यूं आया
अब पत्नी किचन में जाती है
दो छोटे कूकर में बुज़ुर्गों का नाश्ता बनाती है
एक में दलिया, एक में साबू दाना है
दोनों के पकने का इंतज़ार करती है
करीब दस मिनट बाद ये नाश्ता उन बुज़ुर्गों को परोसा जाता है।
जाड़े की धूप में करीब साढ़े बारह बजे मिला ये नाश्ता
जन्नत सा अहसास कराता है
दोनों बिना दांतों के जबड़ों से नाश्ते की जुगाली करते हैं
सुबह 6 बजे के उठे ये बूढ़े दोपहर साढ़े बारह बजे नाश्ता करते हैं
पड़ोस के बनिये से हफ्ते भर का राशन लेकर पति घर आ गया था
पत्नी उस वक्त नाश्ता कर रही थी
इसलिए पति ने किचन में खुद जाकर सामान को रखा
पत्नी बोली
नाश्ता रखा है कढ़ाई में ले लेना अब मैं कहां किचन में आऊंगी
आजाओ बाहर ही लॉन में बैठकर साथ खाते हैं
नहीं मैं मम्मी पापा के पास बैठकर कर लूंगा
तुम उधर ही कर लो नाश्ता
हफ्ते भर बाद तो वक्त मिलता है इनके पास बैठने का
चलो ठीक है और हां उनसे पूछ लेना कि अगर और दलिया चाहिए तो किचन में रखा है
परोस देना
ठीक है।
करीब दस मिनट बाद पत्नी आवाज़ लगाती है
अतुल एक काम करना
तनिक सब्ज़ी काटने में मेरी मदद करना
कल दफ्तर से आते वक्त मेरे पैर में कांच चुभ गया था तो अब तक दर्द हो रहा है
हाए दईया मर गई
पत्नी ने शनिवार को चुभी उस कांच की वेदना प्रकट की
तो पति का गला भर आया
क्या हो गया मेरी जान
तुमने कल तो कुछ नहीं बताया
क्या बताती
तुम बेकार ही परेशान होते
आखिर मैं पति हूं तुम्हारा
तुम्हारे दुख दर्द का साथी हूं
मुझे नहीं तो किसे बताओगी
क्या यूं ही हर तकलीफ मुझसे छिपाओगी
पति के ये इमोशनल सवाल पत्नी के गले उतर गए
उसने कहा नहीं बस ऐसा कुछ नहीं
मैं तो बस मजाक कर रही थी
मैने सोचा इसी बहाने कुछ काम में हाथ बंट जाएगा
तुम और मैं कुछ देर साथ रहेंगे सब्ज़ी काटने के बहाने
अगर ऐसा ही था
तो ये चोट का नाटक क्यों ?
पत्नी बोली
तुम्हें सब्ज़ी काटनी है तो काटो वरना चलते बनो
सारा काम मैं ही कर लूंगी
पत्नी ने गुस्से से चाकू उठाया
और तेजी से सब्ज़ी पर चलाने लगी
मानो नाज़ियों की सेना यहूदियों का संहार कर रही हो
चाकू और सब्ज़ी के बीच हुई इस जंग में चाकू जीत गया
चित्रलेखा की उंगली कट गई
खून बेतरतीबी से बहा जा रहा था
और चित्रलेखा की आंखों से अश्रुओं का सैलाब बह रहा था
अतुल की नज़र जैसे ही चित्रलेखा की कटी उंगली पर पड़ी
उसने फौरन उस उंगली को अपने मुंह में रख लिया।
मानो वो उस खून को बहने न देना चाहता हो
अतुल को यूं देख चित्रलेखा बोली
क्या तुम मुझसे बहुत प्यार करते हो
पति आंखों में आंखें डालकर मसखरे अंदाज़ में बोला
नहीं तुम्हारी सौतन को बहुत प्यार करता हूं
ये मसखरा अंदाज़ पत्नी भांप न सकी
और बोली
तो जाओ जाते क्यों नहीं उस मीना कुमारी मधुबाला के पास
उसी की काटना उसी की चूसना
अब घर आए तो बताए देती हूं
पति अपनी पत्नी के तेवर देखकर बोला
अरे मैने तो मज़ाक में कहा था
तो मैं कौन सा सीरियस हूं
डार्लिंग तुम भी ना
पति के सॉफ्ट कॉर्नर का पत्नी ने फायदा उठाया
और बोली अच्छा एक काम करना
मैने सब्ज़ी काट दी है
अब तुम इसे गैस पर चढ़ा देना
आटा माढ़ दिया है रोटी बना देना
चावल भिगो दिये हैं
कूकर में पका लेना
मैं सोने जा रही हूं, दो घंटे बाद उठा लेना
मेरे तो बहुत दर्द हो रहा है
आज संडे के दिन बहुत काम हो जाता है
चाय बनाओ
नाश्ता बनाओ
खाना बनाओ
क्या क्या करें ???
अब थोड़ा काम तुम कर लो मैं सोने जा रही हूं प्लीज़
रविवार, 15 जनवरी 2012
अंधों में काना आर्यभट्ट
समाज में हमारे इर्द गिर्द कहावतों का दौर कुछ यूं पसरा हुआ है, जैसे भारत के कई हिस्सों में फैला 42 फीसदी कुपोषण। लेकिन हम अक्सर इन कहावतों को एक दम सटीक सच की तरह नहीं देख पाते। कहीं न कहीं कोई कमी जरुर रहती है। अंधों में काना राजा एक ऐसी ही कहावत है। क्या वाकई जहां सारे अंधे होते हैं वहां काना श्रेष्ठ होता है? ऐसी कहावतें जब सच की चादर ओढ़ती हैं, तो एक सामाजिक व्यंग भी होता है, और कई बड़े सवाल भी इसी व्यंग से जन्म लेते हैं। इसी कहावत की सच्चाई को मैने बड़े करीब से देखा है।
तीन जनवरी 2012 की बात है । जब मैं बिना आरक्षण शाहजहांपुर की अकस्मात यात्रा पर निकला था। हाड़ कंपाती सर्दी में मैं रात बारह बजे स्टेशन पहुंचा। अनारक्षित श्रेणी के टिकट के लिए लाइन में लगा तो देखते ही देखते लाइन काफी लंबी हो गई। लेकिन टिकट खिड़की नहीं खुली। मेरी बारह चालीस की ट्रेन थी। करीब तीस मिनट खड़े रहने के बाद जब खिड़की खुली तो मेरा टिकट लेने का तीसरा नंबर था। मेरी बारी आई तो मैने अपनी जेब से टूटे नब्बे रुपए निकालकर टिकट खिड़की की ओर आगे बढ़ा दिए, और ये सूचना दी कि मेरा शाहजहांपुर तक का टिकट कर दो। अंदर से आई किर्र किर्र की आवाज़ से साफ इंगित हो रहा था कि शाहजहांपुर के टिकट की एक प्रति मेरे हाथ आने वाली है। कुछ सेकेंडों में टिकट तो मेरे हाथ था, लेकिन नब्बे रुपए में से बची हुई धनराशि मुझे वापस नहीं की गई। वो शायद रेलवे कर्मचारी ने बतौर मेहनताना अपनी जेब में रख ली थी। मैने भी इस बात को ज्यादा तूल देना उचित न समझा, क्योंकि मैं अपनी ट्रेन पकड़ने के लिए लेट हो रहा था। अगर ये ट्रेन छूट जाती फिर मेरे पास शाहजहांपुर के लिए कोई सीधी ट्रेन नहीं थी। ऐसी स्थिति में मुझे टुकड़ों में ही जाना पड़ता।
मैं प्लेटफॉर्म नंबर ग्यारह पर पहुंच गया। जहां ट्रेन खड़ी शायद मेरा ही इंतज़ार कर रही थी, क्योंकि उस वक्त रेलवे की घड़ी में 12:42 AM हो चुका था, जबकि उस ट्रेन का दिल्ली से चलने का टाइम 12:40 था। मैं अनारक्षित श्रेणी के एक डिब्बे में चढ़ गया जो बाहर से देखने पर बिल्कुल खाली दिखाई दे रहा था। इस डिब्बे में जैसे ही मैं आगे बढ़ा, एक कर्णभेदी हूटर के साथ ट्रेन आगे की ओर चल दी। अब बोगी में मैं अपना बिस्तर लगाने की जुगत भिड़ा रहा था, क्योंकि मुझे ठंड भी लगी रही थी, और मैं उस दिन सुबह काफी जल्दी भी उठ गया था, जबकि अमूमन ऐसा होता नहीं कि किसी दिन सोकर मैं जल्दी उठा हूं। कूपा आशा से परे 95 फीसदी खाली था। इसलिए मुझे अपनी जगह तलाशने के लिए कुछ ज्यादा ही दिक्कत का सामना करना पड़ रहा था। कहां सोऊं, कहां बैठूं, कहां से बाहर के दृश्य बेहतर दिखेंगे, कहां से ठंडी हवा कम लगेगी, आदि अनादि कुछ ऐसे ही प्रश्न मेरे दिमाग में कौंध रहे थे। दस मिनट बाद मैं ये तय कर पाया कि अब मुझे फलां जगह तशरीफ टिका देनी चाहिए। मैने सीट पर चादर बिछाई और खिड़की के बगल से सटकर बैठ गया। कुछ देर खिड़की खोली रखी ताकि बाहर के मौसम का आनंद उठा सकूं, चूंकि हवा बेहद सर्द थी, इसलिए ज्यादा देर मौसम का मज़ा लेने का विचार मेरी नाक बहाने के लिए काफी था। इस तरह की किसी भी रिस्क से बचने हेतु मैने खिड़की का पहले शेटर बंद किया उसके बाद शीशा भी बंद कर दिया। अब मैं उस बेरहम हवा से पूरी तरह सुरक्षित था, जो मेरे बुखार और नज़ले का सामान अपने साथ लिए ट्रेन से बाहर बह रही थी। ट्रेन रफ्तार पकड़ चुकी थी, लेकिन काफी थकान के बावजूद मुझे उस दिन नींद नहीं आ रही थी। इसलिए मैने अपने बैग से शरद जोशी के व्यंगों पर आधारित एक किताब ‘यथा समय’ निकाली और उसके पढ़ने लगा। आंखे बोझिल हो रही थीं, लेकिन ‘यथा समय’ की कहानियों के सामने आंखे मूंदने का अब मन नहीं हो रहा था। वक्त बीतता जा रहा था, और मैं किताब के पन्ने पलटता जा रहा था। गाज़ियाबाद, पिलखुआ, और हापुड़ को ट्रेन पीछे छोड़ चुकी थी, मुझे इस बात का इसलिए पता था, क्योंकि इन तीन जगहों पर जब ट्रेन रुकी तो कुछ चाय वाले मेरी बोगी में अपनी ना पी सकी जाने वाली चाय पर ताज़गी का ठप्पा लगाये उसे बेंचने आ गये थे। इस दौरान कुछ पूड़ी सब्जी वाले भी आये थे, जिनकी पूड़ियों की शक्ल देखकर अंदाज़ा लगाया जा सकता था, कि उन्हें दोपहर में बनाया गया होगा, लेकिन वो जब बिक नहीं सकीं, तो रात को उन्हें दोबारा मिलावटी घी में गर्म करके ताजगी का नाट्य रूपांतरण कर बेचा जा रहा था। इसी बीच अमरोहा स्टेशन भी पार हो गया। ट्रेन बड़ी बेफिक्री के साथ हूटर पर हूटर मारे अपनी ही पहले से तय पटरियों पर आगे की ओर बढ़ती जा रही थी। मैं भी ट्रेन की बेफिक्री से सीख लेकर किताब पढ़ने में तल्लीन था। कि इसी बीच ट्रेन द्वारा पटरियां बदलने की ध्वनि मेरे कानों में पड़ने लगी थी, और ट्रेन अपनी रफ्तार को धीमा कर रही थी। ये किसी स्टेशन के आने के संकेत थे। मेरा कयास जल्द ही सच निकला, जब मैने खिड़की से बाहर झांका तो ट्रेन मुरादाबाद के आउटर में प्रवेश कर चुकी थी। अब तक जो ट्रेन सत्तर अस्सी की स्पीड में चल रही थी, उसकी रफ्तार चार पांच किलोमीटर प्रतिघंटा हो गई थी। शायद कोई ट्रेन पहले से उसके लिए निर्धारित प्लेट फॉर्म पर खड़ी थी, जिसके वहां से निकलने के बाद तक के लिए इस ट्रेन को धीमे ही चलना था। ट्रेन ने अचानक कुछ तेज़ रफ्तार पकड़ी, और मुरादाबाद स्टेशन के दो नंबर प्लेट फॉर्म पर जाकर खड़ी हो गई। इस वक्त प्लेट फॉर्म की घड़ी का छोटा कांटा चार पर था, जबकि बड़ा कांटा बारह पर जाने की अथक कोशिश कर रहा था, मानों बड़ा कांटा इशारा कर रहा हो कि उसे उसकी मंज़िल बारह पर आकर मिल जाएगी। ये घड़ी में सुबह के चार बजने के संकेत थे। गाड़ी स्टेशन पर जैसे ही लगी, वैसे ही कुछ लोग पूर्व की भांति ट्रेन में दाखिल हुए, और अपनी चाय को श्रेष्ठ बताने के लिए मिथ्या वर्णन का सहारा लेने लगे। लेकिन उस जाड़े में महज़ पांच रुपए हासिल करने हेतु किया जा रहा ये मिथ्या वर्णन किसी कड़वे सच जैसा था, जिसका एक घूंट मैने भी पांच रुपए देकर खरीद लिया था, क्योंकि बाहर ठंड कुछ ज्यादा ही पड़ रही थी, जिस ठंड का अनुभव मुझे दिल्ली में नहीं हुआ था, उससे कहीं ज्यादा ठंड को मैं मुरादाबाद स्टेशन पर महसूस कर रहा था, हमेशा की तरह चंद मिनटों में ही मैने उस ना पसंद आने वाली चाय को खत्म कर दिया था। बाहर कोहरा बहुत ज्यादा होने की वजह से विज़िबिलटी बेहद कम हो गई थी। मुरादाबाद बड़ा स्टेशन है इसलिए यहां लगभग हर ट्रेन का स्टॉप दस मिनट से कुछ ज्यादा है। लेकिन उस दिन ट्रेन करीब तीस मिनट तक स्टेशन पर ही खड़ी रही। मुझे ठंड बहुत ज्यादा लगने लगी थी। सोच रहा था कि कैसे भी एक अदरक वाली चाय मेरे गले को नसीब हो जाती, तो दिल आनंद-आनंद तृप्त- तृप्त हो जाता। लेकिन बदनसीबों की बस्ती में नसीब कहां जागते हैं। ऐसे ही मुझे एक प्याला अच्छी चाय नसीब नहीं हुई। और मजबूरन ही मुझे मिथ्या वर्णन वाली उस चाय के तीन प्यालों को पीना पड़ा।
ट्रेन शायद जब चलने ही वाली थी, कि इसी दौरान पांच लोग भागते हुए ट्रेन में चढ़े, हर कोई एक दूसरे को अपना बैग थमाकर ट्रेन के अंदर दाखिल होने की कोशिश कर रहा था, ऐसा लग रहा था कि जैसे वे पांचों काफी दूर से भागकर आ रहे हैं। और ट्रेन की हरी बत्ती देखकर बहुत घबरा गए हैं कि कहीं उनकी ये ट्रेन छूट न जाए। खैर वो पांचो ट्रेन के भीतर जैसे तैसे दाखिल हुए क्योंकि ट्रेन हलके हलके रेंगने लगी थी। जान हथेली पर लेकर सफर तय करने की ये नीति साफ बता रही थी, कि वे मजदूर वर्ग से ताल्लुक रखते हैं, और हर रोज़ ऐसे ही ट्रेनों में सफर तय करते हैं। मेरा ये कयास भी पूर्व की भांति एक दम ठीक था। पहले किताब बैग में रख लूं उसके बाद बताऊंगा कि आखिर मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं।
ये पांचों लोग आपस में ठेठ देहाती भाषा में बातें कर रहे थे, ये भाषा अवधी भी थी, मैथली भी थी, और भोजपुरी भी थी। कुल मिलाकर इनकी भाषा का अंतिम उत्पादन कबीरदास की सधुक्कड़ी भाषा जैसा था। इन लोगों की वार्ता के कुछ अंश मुझे बड़ी ही मुश्किल से समझ आ रहे थे। लेकिन कहा जाता है कि मुश्किल पंक्तियों से अपने लिए कुछ सरल निकाल लेने वाला ही जिज्ञासू है। सो इसी तर्ज पर मैं उन पांचों की रोमांचक बातों का स्वाद लेने लगा। इस दौरान मुझे ज्ञात हो गया था, कि वो पांचों लोग दिहाड़ी मजदूर थे, जो दिन भर काम करने के बाद दिल्ली से अपने घरों की ओर लौट रहे थे, लेकिन मुरादाबाद में ट्रेन छूट जाने की वजह से वो मुरादाबाद स्टेशन पर ही काफी देर से सोये हुए थे। पर जब मेरी ट्रेन वहां पहुंची तो अचानक खुली नींद ने उन्हें मेरी ट्रेन में दाखिल होने को मजबूर कर दिया। इन्हीं आशंकाओं के बीच मैं उनकी बातों को आराम से सुनता जा रहा था, कि मुझे एक और बात पता चली कि उनमें से एक व्यक्ति उनका नेता है। जिसका नाम संभवत: छन्नू रखा गया था। क्योंकि सभी लोग बार बार उसे छन्नू भइया के नाम से ही पुकार रहे थे। उन पांचों लोगों में छन्नू ही एक मात्र दल का ऐसा सदस्य था, जिसने अपनी ज़िंदगी में या तो कभी पढ़ाई को महत्व दिया होगा, या फिर घर में पिता की डांट का उसे ख्याल रहा होगा। मुझे नहीं पता था कि छन्नू कितना पढ़ा लिखा था, लेकिन उसकी काबलियत का अंदाज़ा उसके चार साथियों ने भलीभांति लगा लिया था, क्योंकि उनकी नज़र में छन्नू उनका नेता था। छन्नू के शारीरिक ढांचे की एक और खास बात थी, कि वो एक आंख से देख नहीं सकता था। उसकी आंखों में लगा पत्थर इस बात की ओर साफ इशारा कर रहा था, कि बचपन में किसी दुर्घटना की वजह से उसकी एक आंख जाती रही होगी, या फिर मोतियाबिंद का सही वक्त पर इलाज न करवा पाना उसकी आंख के लिए प्राणघातक साबित हुआ होगा। जो भी हुआ हो लेकिन एक आंख से देख सकने वाला ये शख्स उन दो दो आंखें रखने वाले लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहा था।
छन्नू के हाथों में सौ सौ के कुछ नोट थे, जिनका हिसाब छन्नू को ही करना था। उसे उन चारों में तो नोट बांटने ही थे। साथ ही अपने काम का हिसाब भी तय करना था। इसलिए छन्नू ने 675 रुपए प्रति व्यक्ति का हिसाब करने के लिए अपनी उंगलियों का सहारा लेना शुरु कर दिया था। गणित के तमाम फॉर्मूले फिट कर लेने के बावजूद भी जब छन्नू पैसों का सही हिसाब नहीं लगा सका। तो उसने अपनी जेब से भारत के एक पड़ोसी कम्यूनिस्ट देश से आया एक मोबाइल निकाल लिया। और उसके साथ खुड़पैंच करने लगा। अंदाज़ा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं था कि जब उसके दिमाग की गणित फेल हो गई तो उसने कंप्यूटरीकृत गणनांक का इस्तेमाल करना शुरु कर दिया होगा। यकीनन ऐसा ही था। छन्नू अब मोबाइल में मौजूद कैलकुलेटर के सहारे उस हिसाब के अंकेक्षण में जुट गया था। उन चारों की आंखें बरबस ही छन्नू की काबलियत पर टिकटिकी लगाये देख रही थीं। उनकी नज़र में छन्नू शिक्षित भी था, तकनीकी जानकार भी, वैज्ञानिक भी, और सबसे समझदार भी। क्योंकि वो चारों आंखों ही आंखों में छन्नू द्वारा किये गये प्रयासों को सराहने की चेष्टा में लगे हुए थे। लेकिन इस बात से छन्नू एक दम अंजान था। क्योंकि उसका पूरा ध्यान अपने चाइनीज़ मोबाइल की स्क्रीन पर था। उसके सराहनीय प्रयासों की दृढ़ता देखकर सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि वो आज अपने पास मौजूद धनराशि में से 675 रुपए के उस अबूझ हिसाब का हल निकाल ही लेगा।
माहौल इस वक्त बेहद शांत था। उन चारों की नज़रें छन्नू पर टिकी थीं, तो मेरी नज़रें उन पांचों के क्रिया कलापों पर । लेकिन इसी बीच उन चारों में से चिल्ला नाम के एक शख्स ने अपने भारी से दिखने वाले मोबाइल में गाना बजा दिया। प्यार से लिखा गया वो गाना उस मोबाइल में जाकर इस कदर कर्णभेदी हो गया था, कि मजबूरन छन्नू को हस्तक्षेप कर कहना पड़ा...अरे बंद करऊ भोंसड़ी के...चिल्ला की इस हरकत से छन्नू इस कदर आहत हो गया था, कि एक मिनट के भीतर उसने चिल्ला को उसके अनपढ़ होने के सैकड़ों नुकसान गिना दिये थे। शायद चिल्ला को भी अपने अनपढ़ होने का जितना अफसोस पहले न हुआ होगा। उतना आज हो रहा था, क्योंकि छन्नू ने तो सीधे उसके स्वाभिमान को ही ललकार दिया था।
अब तक जो तस्वीर थोड़ी शांत दिखाई दे रही थी, उसमें अब तनाव नज़र आने लगा था। चिल्ला से हुई बकझक के बाद छन्नू अपनी कंसर्ट्रेशन खो बैठा था। छन्नू की शक्ल देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे अब वो 675 रुपए की उस पहेली को सुलझा ही न सकेगा। लेकिन छन्नू तो छन्नू था, उसे ये साबित करना था कि उसकी प्राइमरी तक की पढ़ाई उसके काम आई है। चिल्ला की उस शांति भंग करने वाली हरकत ने कुछ घंटों से हिसाब लगा रहे छन्नू के चेहरे पर बारह बजा दिये थे। लेकिन फिर भी मामले को आन पर लेते हुए छन्नू 675 के कुल योग वाली बैलेंस शीट को बनाने में पिला हुआ था। ये छन्नू का अपने हिसाब के प्रति समर्पण ही था, जो उसने चिल्ला द्वारा किये गये उस गाना बजाने के अपराध को नज़रअंदाज़ कर हिसाब में ही ध्यान लगाये रखा। अगर और कोई होता तो वो चिल्ला की गुटखौसी दांतों वाली मुस्कान से खीज कर हिसाब किताब को बंद करता, और पहले चिल्ला के दांत तोड़ता।
ट्रेन अब रामपुर स्टेशन पहुंच चुकी थी। लेकिन छन्नू वहीं का वहीं था। शायद उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके पास मौजूद रुपयों में से 75 रुपए के उचंत खाते के पैसे आखिर गये तो गए कहां ? इस बात का पता भी मुझे तभी लगा जब उसने एक गाली के साथ कहा भोंसड़ीं के जई 75 रुपिया कहां चले गए, इस दौरान ये पहला ऐसा मौका मैने पाया था जब छन्नू ने प्रश्नवाचक अवस्था में चारों के चेहरे पर बारी बारी से अपनी एक आंख के द्वारा बड़ी ज़ोर देकर देखा था। क्योंकि अब से पहले तक तो छन्नू की सारा ध्यान उस हिसाब ने खींच लिया था, या फिर चिल्ला की उस हरकत ने जिसकी वजह से चिल्ला को अपमान के सैकड़ों घूंट चंद मिनटों में ही पीने पड़ गए थे।
ट्रेन रामपुर स्टेशन पर बिना किसी सूचना के रुकी हुई थी, लेकिन छन्नू के हिसाब की गाड़ी जापान की विकास दर की तरह आगे की ओर जा रही थी, ये बात अलग थी, कि अब तक छन्नू के हिसाब को उसकी मंजिल नहीं मिल सकी थी। लेकिन कहा जाता है कि किसी की शक्ल पर उसकी होशियारी के बारे में नहीं लिखा होता। ऐसा ही छन्नू के साथ भी था। उसके चेहरे की उड़ चुकी रंगत साफ बता रही थी कि रामपुर से चलकर जैसे ही ये ट्रेन बरेली पहुंचने वाली होगी, तो उसके हिसाब का तलपट भी मेल खा जाएगा। क्योंकि जिस तरीके से उसकी भावभंगिमाओं को मैं भांप पा रहा था, तो मुझे लगने लगा था कि छन्नू हिसाब के बेहद करीब है। हां एक बात और याद आ रही है कि रामपुर से ट्रेन रवाना होने से पहले उन पांचों ने न पी सकी जाने वाली पांच प्यालियां चाय भी खरीदी थी। और इसके पैसे उसने चुकाये थे, जिसे अब से कुछ वक्त पहले एक छोटी सी गलती के एवज़ में बड़ी सी फटकार छन्नू द्वारा लगाई गई थी। इस दौरान चाय पीते वक्त शेष चार तो आपस में अपने हरदोई स्थित किसी गांव की बातें कर रहे थे, लेकिन छन्नू चाय की चुस्कियों के साथ ही गणित की उस अबूझ पहेली को सुलझाने में लगा हुआ था। छन्नू की चाय का प्याला खत्म हो चुका था, लेकिन हिसाब अब तक नहीं लगाया जा सका था।
ये विडंबना ही थी कि बरेली रेलवे क्रॉसिंग के कुछ पहले ही छन्नू उन चार लोगों की भीड़ को संबोधित करने की मुद्रा में आ गया। उसकी एक आंख में साफ पढ़ा जा सकने वाला आत्मविश्वास बताने के लिए काफी था, कि वो हिसाब की बहियों का हिसाब कर चुका है। उसने 75 रुपए के उस सस्पेंस अकाउंट का पर्दाफाश कर दिया है। जिसने उसकी नाक में दम कर दिया था। जो छन्नू अब तक बेहद शांति से हिसाब लगा रहा था, वही अब चिल्ला समेत उन चारों को 675 के मूल का रहस्य समझाने लगा था। छन्नू को पता चल गया था कि जिन 75 रुपए की बदौलत उसके हिसाब का चिट्ठा मेल नहीं खा रहा था, उसी 75 रुपए के खर्चे को उसने खोज निकाला था। और ये 75 रुपए वही थे जो उन पांचों ने आपसी सहयोग से कच्ची दारु की भट्टी पर खर्च कर दिये थे। लेकिन नशा ज्यादा होने की वजह से किसी को याद नहीं था कि पैसे आखिर गए तो गए कहां। ये सब संभव हो पाया था तो बस छन्नू के द्वारा। क्योंकि छन्नू ने प्राइमरी की पढ़ाई में एक से लेकर सौ तक की गिनतियों के बड़े ही मन से पढ़ा था। और इस पढ़ाई के ही बूते उसने ये साबित कर दिखाया था, कि अंधों में काना राजा ही नहीं बल्कि आर्यभट्ट भी हो सकता है।
सुबह के दस बजे हैं। बरेली आ गया है । और मुझे इसी स्टेशन पर उतरकर शाहजहांपुर के लिए ट्रेन पकड़नी है, क्योंकि जिस ट्रेन से मैं आया हूं वो ट्रेन बरेली से सीधे लखनऊ जाती है, शाहजहांपुर उस ट्रेन का स्टॉप नहीं है। और हां छन्नू ने अपने हाथों में मौजूद सौ रुपए के सभी कड़क नोटों का हिसाब उन चारों में कर दिया है। आगे का रास्ता वो कैसे तय करेंगे मुझे नहीं पता, क्योंकि मेरे देखे जाने तक वो बरेली स्टेशन पर उतरे नहीं थे। और हरदोई नामक जिस ज़िले में उन्हें जाना था, ये ट्रेन वहां भी नहीं रुकती थी। शायद ये पांचों लखनऊ पहुंच जाएंगे, या फिर चेनपुलिंग कर हरदोई उतरेंगे।
तीन जनवरी 2012 की बात है । जब मैं बिना आरक्षण शाहजहांपुर की अकस्मात यात्रा पर निकला था। हाड़ कंपाती सर्दी में मैं रात बारह बजे स्टेशन पहुंचा। अनारक्षित श्रेणी के टिकट के लिए लाइन में लगा तो देखते ही देखते लाइन काफी लंबी हो गई। लेकिन टिकट खिड़की नहीं खुली। मेरी बारह चालीस की ट्रेन थी। करीब तीस मिनट खड़े रहने के बाद जब खिड़की खुली तो मेरा टिकट लेने का तीसरा नंबर था। मेरी बारी आई तो मैने अपनी जेब से टूटे नब्बे रुपए निकालकर टिकट खिड़की की ओर आगे बढ़ा दिए, और ये सूचना दी कि मेरा शाहजहांपुर तक का टिकट कर दो। अंदर से आई किर्र किर्र की आवाज़ से साफ इंगित हो रहा था कि शाहजहांपुर के टिकट की एक प्रति मेरे हाथ आने वाली है। कुछ सेकेंडों में टिकट तो मेरे हाथ था, लेकिन नब्बे रुपए में से बची हुई धनराशि मुझे वापस नहीं की गई। वो शायद रेलवे कर्मचारी ने बतौर मेहनताना अपनी जेब में रख ली थी। मैने भी इस बात को ज्यादा तूल देना उचित न समझा, क्योंकि मैं अपनी ट्रेन पकड़ने के लिए लेट हो रहा था। अगर ये ट्रेन छूट जाती फिर मेरे पास शाहजहांपुर के लिए कोई सीधी ट्रेन नहीं थी। ऐसी स्थिति में मुझे टुकड़ों में ही जाना पड़ता।
मैं प्लेटफॉर्म नंबर ग्यारह पर पहुंच गया। जहां ट्रेन खड़ी शायद मेरा ही इंतज़ार कर रही थी, क्योंकि उस वक्त रेलवे की घड़ी में 12:42 AM हो चुका था, जबकि उस ट्रेन का दिल्ली से चलने का टाइम 12:40 था। मैं अनारक्षित श्रेणी के एक डिब्बे में चढ़ गया जो बाहर से देखने पर बिल्कुल खाली दिखाई दे रहा था। इस डिब्बे में जैसे ही मैं आगे बढ़ा, एक कर्णभेदी हूटर के साथ ट्रेन आगे की ओर चल दी। अब बोगी में मैं अपना बिस्तर लगाने की जुगत भिड़ा रहा था, क्योंकि मुझे ठंड भी लगी रही थी, और मैं उस दिन सुबह काफी जल्दी भी उठ गया था, जबकि अमूमन ऐसा होता नहीं कि किसी दिन सोकर मैं जल्दी उठा हूं। कूपा आशा से परे 95 फीसदी खाली था। इसलिए मुझे अपनी जगह तलाशने के लिए कुछ ज्यादा ही दिक्कत का सामना करना पड़ रहा था। कहां सोऊं, कहां बैठूं, कहां से बाहर के दृश्य बेहतर दिखेंगे, कहां से ठंडी हवा कम लगेगी, आदि अनादि कुछ ऐसे ही प्रश्न मेरे दिमाग में कौंध रहे थे। दस मिनट बाद मैं ये तय कर पाया कि अब मुझे फलां जगह तशरीफ टिका देनी चाहिए। मैने सीट पर चादर बिछाई और खिड़की के बगल से सटकर बैठ गया। कुछ देर खिड़की खोली रखी ताकि बाहर के मौसम का आनंद उठा सकूं, चूंकि हवा बेहद सर्द थी, इसलिए ज्यादा देर मौसम का मज़ा लेने का विचार मेरी नाक बहाने के लिए काफी था। इस तरह की किसी भी रिस्क से बचने हेतु मैने खिड़की का पहले शेटर बंद किया उसके बाद शीशा भी बंद कर दिया। अब मैं उस बेरहम हवा से पूरी तरह सुरक्षित था, जो मेरे बुखार और नज़ले का सामान अपने साथ लिए ट्रेन से बाहर बह रही थी। ट्रेन रफ्तार पकड़ चुकी थी, लेकिन काफी थकान के बावजूद मुझे उस दिन नींद नहीं आ रही थी। इसलिए मैने अपने बैग से शरद जोशी के व्यंगों पर आधारित एक किताब ‘यथा समय’ निकाली और उसके पढ़ने लगा। आंखे बोझिल हो रही थीं, लेकिन ‘यथा समय’ की कहानियों के सामने आंखे मूंदने का अब मन नहीं हो रहा था। वक्त बीतता जा रहा था, और मैं किताब के पन्ने पलटता जा रहा था। गाज़ियाबाद, पिलखुआ, और हापुड़ को ट्रेन पीछे छोड़ चुकी थी, मुझे इस बात का इसलिए पता था, क्योंकि इन तीन जगहों पर जब ट्रेन रुकी तो कुछ चाय वाले मेरी बोगी में अपनी ना पी सकी जाने वाली चाय पर ताज़गी का ठप्पा लगाये उसे बेंचने आ गये थे। इस दौरान कुछ पूड़ी सब्जी वाले भी आये थे, जिनकी पूड़ियों की शक्ल देखकर अंदाज़ा लगाया जा सकता था, कि उन्हें दोपहर में बनाया गया होगा, लेकिन वो जब बिक नहीं सकीं, तो रात को उन्हें दोबारा मिलावटी घी में गर्म करके ताजगी का नाट्य रूपांतरण कर बेचा जा रहा था। इसी बीच अमरोहा स्टेशन भी पार हो गया। ट्रेन बड़ी बेफिक्री के साथ हूटर पर हूटर मारे अपनी ही पहले से तय पटरियों पर आगे की ओर बढ़ती जा रही थी। मैं भी ट्रेन की बेफिक्री से सीख लेकर किताब पढ़ने में तल्लीन था। कि इसी बीच ट्रेन द्वारा पटरियां बदलने की ध्वनि मेरे कानों में पड़ने लगी थी, और ट्रेन अपनी रफ्तार को धीमा कर रही थी। ये किसी स्टेशन के आने के संकेत थे। मेरा कयास जल्द ही सच निकला, जब मैने खिड़की से बाहर झांका तो ट्रेन मुरादाबाद के आउटर में प्रवेश कर चुकी थी। अब तक जो ट्रेन सत्तर अस्सी की स्पीड में चल रही थी, उसकी रफ्तार चार पांच किलोमीटर प्रतिघंटा हो गई थी। शायद कोई ट्रेन पहले से उसके लिए निर्धारित प्लेट फॉर्म पर खड़ी थी, जिसके वहां से निकलने के बाद तक के लिए इस ट्रेन को धीमे ही चलना था। ट्रेन ने अचानक कुछ तेज़ रफ्तार पकड़ी, और मुरादाबाद स्टेशन के दो नंबर प्लेट फॉर्म पर जाकर खड़ी हो गई। इस वक्त प्लेट फॉर्म की घड़ी का छोटा कांटा चार पर था, जबकि बड़ा कांटा बारह पर जाने की अथक कोशिश कर रहा था, मानों बड़ा कांटा इशारा कर रहा हो कि उसे उसकी मंज़िल बारह पर आकर मिल जाएगी। ये घड़ी में सुबह के चार बजने के संकेत थे। गाड़ी स्टेशन पर जैसे ही लगी, वैसे ही कुछ लोग पूर्व की भांति ट्रेन में दाखिल हुए, और अपनी चाय को श्रेष्ठ बताने के लिए मिथ्या वर्णन का सहारा लेने लगे। लेकिन उस जाड़े में महज़ पांच रुपए हासिल करने हेतु किया जा रहा ये मिथ्या वर्णन किसी कड़वे सच जैसा था, जिसका एक घूंट मैने भी पांच रुपए देकर खरीद लिया था, क्योंकि बाहर ठंड कुछ ज्यादा ही पड़ रही थी, जिस ठंड का अनुभव मुझे दिल्ली में नहीं हुआ था, उससे कहीं ज्यादा ठंड को मैं मुरादाबाद स्टेशन पर महसूस कर रहा था, हमेशा की तरह चंद मिनटों में ही मैने उस ना पसंद आने वाली चाय को खत्म कर दिया था। बाहर कोहरा बहुत ज्यादा होने की वजह से विज़िबिलटी बेहद कम हो गई थी। मुरादाबाद बड़ा स्टेशन है इसलिए यहां लगभग हर ट्रेन का स्टॉप दस मिनट से कुछ ज्यादा है। लेकिन उस दिन ट्रेन करीब तीस मिनट तक स्टेशन पर ही खड़ी रही। मुझे ठंड बहुत ज्यादा लगने लगी थी। सोच रहा था कि कैसे भी एक अदरक वाली चाय मेरे गले को नसीब हो जाती, तो दिल आनंद-आनंद तृप्त- तृप्त हो जाता। लेकिन बदनसीबों की बस्ती में नसीब कहां जागते हैं। ऐसे ही मुझे एक प्याला अच्छी चाय नसीब नहीं हुई। और मजबूरन ही मुझे मिथ्या वर्णन वाली उस चाय के तीन प्यालों को पीना पड़ा।
ट्रेन शायद जब चलने ही वाली थी, कि इसी दौरान पांच लोग भागते हुए ट्रेन में चढ़े, हर कोई एक दूसरे को अपना बैग थमाकर ट्रेन के अंदर दाखिल होने की कोशिश कर रहा था, ऐसा लग रहा था कि जैसे वे पांचों काफी दूर से भागकर आ रहे हैं। और ट्रेन की हरी बत्ती देखकर बहुत घबरा गए हैं कि कहीं उनकी ये ट्रेन छूट न जाए। खैर वो पांचो ट्रेन के भीतर जैसे तैसे दाखिल हुए क्योंकि ट्रेन हलके हलके रेंगने लगी थी। जान हथेली पर लेकर सफर तय करने की ये नीति साफ बता रही थी, कि वे मजदूर वर्ग से ताल्लुक रखते हैं, और हर रोज़ ऐसे ही ट्रेनों में सफर तय करते हैं। मेरा ये कयास भी पूर्व की भांति एक दम ठीक था। पहले किताब बैग में रख लूं उसके बाद बताऊंगा कि आखिर मैं ऐसा क्यों कह रहा हूं।
ये पांचों लोग आपस में ठेठ देहाती भाषा में बातें कर रहे थे, ये भाषा अवधी भी थी, मैथली भी थी, और भोजपुरी भी थी। कुल मिलाकर इनकी भाषा का अंतिम उत्पादन कबीरदास की सधुक्कड़ी भाषा जैसा था। इन लोगों की वार्ता के कुछ अंश मुझे बड़ी ही मुश्किल से समझ आ रहे थे। लेकिन कहा जाता है कि मुश्किल पंक्तियों से अपने लिए कुछ सरल निकाल लेने वाला ही जिज्ञासू है। सो इसी तर्ज पर मैं उन पांचों की रोमांचक बातों का स्वाद लेने लगा। इस दौरान मुझे ज्ञात हो गया था, कि वो पांचों लोग दिहाड़ी मजदूर थे, जो दिन भर काम करने के बाद दिल्ली से अपने घरों की ओर लौट रहे थे, लेकिन मुरादाबाद में ट्रेन छूट जाने की वजह से वो मुरादाबाद स्टेशन पर ही काफी देर से सोये हुए थे। पर जब मेरी ट्रेन वहां पहुंची तो अचानक खुली नींद ने उन्हें मेरी ट्रेन में दाखिल होने को मजबूर कर दिया। इन्हीं आशंकाओं के बीच मैं उनकी बातों को आराम से सुनता जा रहा था, कि मुझे एक और बात पता चली कि उनमें से एक व्यक्ति उनका नेता है। जिसका नाम संभवत: छन्नू रखा गया था। क्योंकि सभी लोग बार बार उसे छन्नू भइया के नाम से ही पुकार रहे थे। उन पांचों लोगों में छन्नू ही एक मात्र दल का ऐसा सदस्य था, जिसने अपनी ज़िंदगी में या तो कभी पढ़ाई को महत्व दिया होगा, या फिर घर में पिता की डांट का उसे ख्याल रहा होगा। मुझे नहीं पता था कि छन्नू कितना पढ़ा लिखा था, लेकिन उसकी काबलियत का अंदाज़ा उसके चार साथियों ने भलीभांति लगा लिया था, क्योंकि उनकी नज़र में छन्नू उनका नेता था। छन्नू के शारीरिक ढांचे की एक और खास बात थी, कि वो एक आंख से देख नहीं सकता था। उसकी आंखों में लगा पत्थर इस बात की ओर साफ इशारा कर रहा था, कि बचपन में किसी दुर्घटना की वजह से उसकी एक आंख जाती रही होगी, या फिर मोतियाबिंद का सही वक्त पर इलाज न करवा पाना उसकी आंख के लिए प्राणघातक साबित हुआ होगा। जो भी हुआ हो लेकिन एक आंख से देख सकने वाला ये शख्स उन दो दो आंखें रखने वाले लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहा था।
छन्नू के हाथों में सौ सौ के कुछ नोट थे, जिनका हिसाब छन्नू को ही करना था। उसे उन चारों में तो नोट बांटने ही थे। साथ ही अपने काम का हिसाब भी तय करना था। इसलिए छन्नू ने 675 रुपए प्रति व्यक्ति का हिसाब करने के लिए अपनी उंगलियों का सहारा लेना शुरु कर दिया था। गणित के तमाम फॉर्मूले फिट कर लेने के बावजूद भी जब छन्नू पैसों का सही हिसाब नहीं लगा सका। तो उसने अपनी जेब से भारत के एक पड़ोसी कम्यूनिस्ट देश से आया एक मोबाइल निकाल लिया। और उसके साथ खुड़पैंच करने लगा। अंदाज़ा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं था कि जब उसके दिमाग की गणित फेल हो गई तो उसने कंप्यूटरीकृत गणनांक का इस्तेमाल करना शुरु कर दिया होगा। यकीनन ऐसा ही था। छन्नू अब मोबाइल में मौजूद कैलकुलेटर के सहारे उस हिसाब के अंकेक्षण में जुट गया था। उन चारों की आंखें बरबस ही छन्नू की काबलियत पर टिकटिकी लगाये देख रही थीं। उनकी नज़र में छन्नू शिक्षित भी था, तकनीकी जानकार भी, वैज्ञानिक भी, और सबसे समझदार भी। क्योंकि वो चारों आंखों ही आंखों में छन्नू द्वारा किये गये प्रयासों को सराहने की चेष्टा में लगे हुए थे। लेकिन इस बात से छन्नू एक दम अंजान था। क्योंकि उसका पूरा ध्यान अपने चाइनीज़ मोबाइल की स्क्रीन पर था। उसके सराहनीय प्रयासों की दृढ़ता देखकर सहज ही अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि वो आज अपने पास मौजूद धनराशि में से 675 रुपए के उस अबूझ हिसाब का हल निकाल ही लेगा।
माहौल इस वक्त बेहद शांत था। उन चारों की नज़रें छन्नू पर टिकी थीं, तो मेरी नज़रें उन पांचों के क्रिया कलापों पर । लेकिन इसी बीच उन चारों में से चिल्ला नाम के एक शख्स ने अपने भारी से दिखने वाले मोबाइल में गाना बजा दिया। प्यार से लिखा गया वो गाना उस मोबाइल में जाकर इस कदर कर्णभेदी हो गया था, कि मजबूरन छन्नू को हस्तक्षेप कर कहना पड़ा...अरे बंद करऊ भोंसड़ी के...चिल्ला की इस हरकत से छन्नू इस कदर आहत हो गया था, कि एक मिनट के भीतर उसने चिल्ला को उसके अनपढ़ होने के सैकड़ों नुकसान गिना दिये थे। शायद चिल्ला को भी अपने अनपढ़ होने का जितना अफसोस पहले न हुआ होगा। उतना आज हो रहा था, क्योंकि छन्नू ने तो सीधे उसके स्वाभिमान को ही ललकार दिया था।
अब तक जो तस्वीर थोड़ी शांत दिखाई दे रही थी, उसमें अब तनाव नज़र आने लगा था। चिल्ला से हुई बकझक के बाद छन्नू अपनी कंसर्ट्रेशन खो बैठा था। छन्नू की शक्ल देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे अब वो 675 रुपए की उस पहेली को सुलझा ही न सकेगा। लेकिन छन्नू तो छन्नू था, उसे ये साबित करना था कि उसकी प्राइमरी तक की पढ़ाई उसके काम आई है। चिल्ला की उस शांति भंग करने वाली हरकत ने कुछ घंटों से हिसाब लगा रहे छन्नू के चेहरे पर बारह बजा दिये थे। लेकिन फिर भी मामले को आन पर लेते हुए छन्नू 675 के कुल योग वाली बैलेंस शीट को बनाने में पिला हुआ था। ये छन्नू का अपने हिसाब के प्रति समर्पण ही था, जो उसने चिल्ला द्वारा किये गये उस गाना बजाने के अपराध को नज़रअंदाज़ कर हिसाब में ही ध्यान लगाये रखा। अगर और कोई होता तो वो चिल्ला की गुटखौसी दांतों वाली मुस्कान से खीज कर हिसाब किताब को बंद करता, और पहले चिल्ला के दांत तोड़ता।
ट्रेन अब रामपुर स्टेशन पहुंच चुकी थी। लेकिन छन्नू वहीं का वहीं था। शायद उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके पास मौजूद रुपयों में से 75 रुपए के उचंत खाते के पैसे आखिर गये तो गए कहां ? इस बात का पता भी मुझे तभी लगा जब उसने एक गाली के साथ कहा भोंसड़ीं के जई 75 रुपिया कहां चले गए, इस दौरान ये पहला ऐसा मौका मैने पाया था जब छन्नू ने प्रश्नवाचक अवस्था में चारों के चेहरे पर बारी बारी से अपनी एक आंख के द्वारा बड़ी ज़ोर देकर देखा था। क्योंकि अब से पहले तक तो छन्नू की सारा ध्यान उस हिसाब ने खींच लिया था, या फिर चिल्ला की उस हरकत ने जिसकी वजह से चिल्ला को अपमान के सैकड़ों घूंट चंद मिनटों में ही पीने पड़ गए थे।
ट्रेन रामपुर स्टेशन पर बिना किसी सूचना के रुकी हुई थी, लेकिन छन्नू के हिसाब की गाड़ी जापान की विकास दर की तरह आगे की ओर जा रही थी, ये बात अलग थी, कि अब तक छन्नू के हिसाब को उसकी मंजिल नहीं मिल सकी थी। लेकिन कहा जाता है कि किसी की शक्ल पर उसकी होशियारी के बारे में नहीं लिखा होता। ऐसा ही छन्नू के साथ भी था। उसके चेहरे की उड़ चुकी रंगत साफ बता रही थी कि रामपुर से चलकर जैसे ही ये ट्रेन बरेली पहुंचने वाली होगी, तो उसके हिसाब का तलपट भी मेल खा जाएगा। क्योंकि जिस तरीके से उसकी भावभंगिमाओं को मैं भांप पा रहा था, तो मुझे लगने लगा था कि छन्नू हिसाब के बेहद करीब है। हां एक बात और याद आ रही है कि रामपुर से ट्रेन रवाना होने से पहले उन पांचों ने न पी सकी जाने वाली पांच प्यालियां चाय भी खरीदी थी। और इसके पैसे उसने चुकाये थे, जिसे अब से कुछ वक्त पहले एक छोटी सी गलती के एवज़ में बड़ी सी फटकार छन्नू द्वारा लगाई गई थी। इस दौरान चाय पीते वक्त शेष चार तो आपस में अपने हरदोई स्थित किसी गांव की बातें कर रहे थे, लेकिन छन्नू चाय की चुस्कियों के साथ ही गणित की उस अबूझ पहेली को सुलझाने में लगा हुआ था। छन्नू की चाय का प्याला खत्म हो चुका था, लेकिन हिसाब अब तक नहीं लगाया जा सका था।
ये विडंबना ही थी कि बरेली रेलवे क्रॉसिंग के कुछ पहले ही छन्नू उन चार लोगों की भीड़ को संबोधित करने की मुद्रा में आ गया। उसकी एक आंख में साफ पढ़ा जा सकने वाला आत्मविश्वास बताने के लिए काफी था, कि वो हिसाब की बहियों का हिसाब कर चुका है। उसने 75 रुपए के उस सस्पेंस अकाउंट का पर्दाफाश कर दिया है। जिसने उसकी नाक में दम कर दिया था। जो छन्नू अब तक बेहद शांति से हिसाब लगा रहा था, वही अब चिल्ला समेत उन चारों को 675 के मूल का रहस्य समझाने लगा था। छन्नू को पता चल गया था कि जिन 75 रुपए की बदौलत उसके हिसाब का चिट्ठा मेल नहीं खा रहा था, उसी 75 रुपए के खर्चे को उसने खोज निकाला था। और ये 75 रुपए वही थे जो उन पांचों ने आपसी सहयोग से कच्ची दारु की भट्टी पर खर्च कर दिये थे। लेकिन नशा ज्यादा होने की वजह से किसी को याद नहीं था कि पैसे आखिर गए तो गए कहां। ये सब संभव हो पाया था तो बस छन्नू के द्वारा। क्योंकि छन्नू ने प्राइमरी की पढ़ाई में एक से लेकर सौ तक की गिनतियों के बड़े ही मन से पढ़ा था। और इस पढ़ाई के ही बूते उसने ये साबित कर दिखाया था, कि अंधों में काना राजा ही नहीं बल्कि आर्यभट्ट भी हो सकता है।
सुबह के दस बजे हैं। बरेली आ गया है । और मुझे इसी स्टेशन पर उतरकर शाहजहांपुर के लिए ट्रेन पकड़नी है, क्योंकि जिस ट्रेन से मैं आया हूं वो ट्रेन बरेली से सीधे लखनऊ जाती है, शाहजहांपुर उस ट्रेन का स्टॉप नहीं है। और हां छन्नू ने अपने हाथों में मौजूद सौ रुपए के सभी कड़क नोटों का हिसाब उन चारों में कर दिया है। आगे का रास्ता वो कैसे तय करेंगे मुझे नहीं पता, क्योंकि मेरे देखे जाने तक वो बरेली स्टेशन पर उतरे नहीं थे। और हरदोई नामक जिस ज़िले में उन्हें जाना था, ये ट्रेन वहां भी नहीं रुकती थी। शायद ये पांचों लखनऊ पहुंच जाएंगे, या फिर चेनपुलिंग कर हरदोई उतरेंगे।
मंगलवार, 27 दिसंबर 2011
राम रचि राखा...
मैं बहुत छोटा सा था, मुझे इतना सा याद है बस। सामाजिक तानेबाने से दूर लोगों की अपेक्षाओं से कहीं ज्यादा दूऱ। मैं उस वक्त अकेला था, एक दम अकेला। कई बार आपके साथ बहुत सारे लोग खड़े होते हैं, लेकिन उनकी वैचारिक अभिव्यक्ति आपसे मेल नहीं खाती। बस इतना ही समझिए मुझसे मेरे अपनों के विचार मेल नहीं खाते। ऐसा नहीं कि मैं उनको या वो मुझको समझते नहीं। ये सिर्फ विचारों को समझने का बस एक इंच का अंतर है । जो वक्त के साथ एक एक इंच का नहीं बल्कि एक मीटर का हो जाता है। सोच का यही अंतर मेरी आने वाली ज़िंदगी पर भी प्रभाव डालने वाला था। इस बात का मुझे अनुमान नहीं था। क्योंकि मेरा हर चीज़ को आंकने का तरीका अलग था।
एक रोज़ की बात है, जब मैं मीडिया के एक बड़े से संस्थान में कार्यरत् था। संस्थान में बहुत सारे लोग ऐसे थे, जो अपने आप को बहुत ज्यादा ज्ञान परक होने का अक्सर दावा किया करते थे। मैं तो उनके अनुभवों के सामने एक अदने सिपाही जैसा था। जिसका न तो रसूख था, न कोई धाक थी, और न ही कोई साख थी,। इस परिस्थिति को सिर्फ ऐसे ही देख सकते थे जैसे हमारे समाज में सवर्ण दलित को देखते हैं। हीन भावना की ऐसी तस्वीर थी ये जिसे मैं कभी बना तो न सका, लेकिन मेरे ह्रदय से ये छवि कभी गायब न हो सकी। ज़िंदगी के हर एक पहलू को अपने हाथों में समेटे मैं आगे बढ़ने की ख्वाहिश पाले हुए था। लेकिन क्या वो ख्वाहिश पूरी होनी थी, ये बात मेरे ज़हन में अक्सर सवाल बनकर घूम जाया करतीं।
संगठन में करीब पैंतालीस की तादाद में कर्मचारी हुआ करते थे। उन पैंतालिस कर्मचारियों में मैं सिर्फ अकेला ऐसा व्यक्ति था । जिसे लोग बतौर हिंदी मीडियम संबोधित किया करते थे, ऐसा नहीं था कि वो मेरी हिंदी को बेज्जत करने की कोशिश किया करते थे। बस उन्हें ये पता था कि मैं एक ऐसे स्कूल से आता हूं जिसमें पढ़ने की आखिरी कीमत मैने सिर्फ डेढ़ रुपया माहवार चुकाई थी। असल में तो सच्चाई को स्वीकारने के बाद हिंदी की हमारे पास यही कीमत रह जाती है। महज़ डेढ़ रुपया। खैर आगे बढ़ते हैं। इन पैतालिस लोगों में करीब पैंतीस लोग ऐसे थे जो मुझे प्रत्यक्ष रुप से जानते थे। इन कर्मचारियों में गार्ड भी शामिल थे, और वो लोग भी शामिल थे जो गार्ड के वेतन को उनकी ड्यूटी के हिसाब से तय किया करते थे। इसके अलावा वो लोग भी थे, जो लोग गार्ड की ड्यूटी तय करने के साथ ही उन लोगों की भी दिहाड़ी पर निगरानी रखते थे, जो लोग दफ्तर में मौजूद बॉस प्रणाली के एकदम करीब हुआ करते ।
इस संगठन में 6 माह तक दिहाड़ी करने के बाद मुझे मासिक वेतनभोगी कर्मचारी के रुप में नियुक्त कर लिया गया। इन 6 महीनों में मैने मजदूरी के हर गुण और अवगुण को शिरोधार्य किया। दफ्तर के शुरुआती वक्त में मैं अपने आप को ‘ऑन एक विंटर्स नाइट’ (पूस की रात) का हलकू समझता था। जो कर्ज के बोझ से इतना दबा था, कि उस बोझ से छुटकारा पाने की उसके पास सिर्फ एक ही युक्ति होती, और वो थी इस लोक से इहि लोग में सिधार जाना। यहां मेरी हालत की तुलना हलकू से की जा सकती है। क्योंकि हलकू भी तकलीफों में जीने का आदी था, और मैं भी तकलीफों को आराम से बर्दाश्त करने का आदी हो गया था। वक्त का हकीम हर किसी को काढ़ा पिला सकता है। तो मेरी क्या बिसात थी।
इस निजी संस्थान में काम करने का हर किसी का अपना सरकारी ढर्रा था। मसलन कोई काम करता था, तो कोई जी हुजूरी का काम करता था। इस मामले में कई लोग अपने आप को मैनेजमेंट गुरु मान लिया करते । ये बात अलग है कि उन्हें प्रबंधन का आशय भी न पता हो। लेकिन उन्हें एक बात का बड़े अच्छे से पता था, कि बड़े साहब के आते ही अपनी कमर को कितनी डिग्री तक झुकाना है, और जुड़े हुए हाथों को अपने चेहरे से कितनी दूरी पर रखना था। ये मुद्रा बताने के लिए काफी थी, कि उक्त कर्मचारी के मन में बॉस के प्रति श्रद्धा नामक परी कैसे कत्थक कर रही है। ये तस्वीर तो जैसे हमारे निजी संस्थानों की तकिया कलाम बन गई है।
जैसे तैसे शुरुआती 6 महीनों को मैने संघर्ष की अवस्था में काट ही लिया। और अब आगे का वक्त काटने को तैयार हो गया था। इस दौरान जितनी तेजी से दफ्तर में मेरा वक्त गुज़र रहा था, उतनी ही तेज़ी से बॉस बदलने का सिलसिला भी चल निकला था। निजी संस्थानों में अक्सर बह निकलने वाली इस्तीफों की बयार ऐसी ही होती है। यहां नौकरी ऐसे बदलती है, जैसे किसी गर्भवती महिला की ज़ुबान का स्वाद।
संस्थान में मुझे आठ महीने हो चुके थे। अब शनय शनय दफ्तर की कठिन स्थितियां मेरे इतिहास भूगोल से मेल खाने लगी थीं। आंकड़ों और आंखों का मेलमिलाप ऐसा हुआ कि लोग मेरे कायल और मैं उनका कायल हो गया। इस दौरान बिना कमर को किसी डिग्री पर झुकाए मेरे काम करने के तरीके ने कई लोगों के पैजामे ढीले कर दिये थे। दफ्तर में ऐसी ही स्थितियां मृत प्राय मुसीबतों में प्राण फूंकती हैं। कम उम्र में अपनों से छोटों की शोहरत नाते रिश्तेदारों को भी बर्दाश्त नहीं होती। तो ये तो वो लोग थे, जो किसी अजनबी शहर में मुझे मिले थे। लेकिन मनुष्य की फितरत में विश्वास का वास होता है। इसलिए अगर मेरे भीतर किसी के लिए विश्वास था तो कुछ गलत नहीं था।
खैर वक्त गुज़रता रहा, और मैं अपने कार्यों को तल्लीनता से करता रहा। चूंकि चपरासी से लेकर दफ्तर के सीनियर सिटीजन तक मेरी पहुंच अच्छी खासी हो गई थी। इसलिए साज़िशी तंत्र को भी मेरे खिलाफ ब्यूह रचना में मशक्कत करनी पड़ रही थी। इस बात का पता मुझे अक्सर लग भी जाया करता, लेकिन हमेशा की तरह ये दफ्तरी कठिनाई मेरे भीतर ज्यादा स्ट्रेस नहीं डाल पाई। मैने साजिशी तंत्र को भगवान भरोसे कर दिया। होइहे वही जो राम रचि राखा। अक्सर ऐसी बातें बड़ी सटीक साबित होती हैं। भगवान को जो मंजूर था वही हुआ। जो हमारी तरक्की में रोड़े अटकाने के लिए दिन रात एक कर रहे थे, उन्हीं के घर मंदी का ऐसा तूफान आया, कि वो नौकरी बचाने के लिए मेरे उसी मित्र के पास पहुंचे, जिससे मेरी तरक्की को रोकने के लिए उन्होंने सिफारिश लगाई थी।
सार यही कहता है कि अगर पक्के मन से और सच्ची लगन से अगर आप से आप अपने कार्यों को अंजाम देते हैं। तो फिरकापरस्त ताकतें आपके पतन के बारे में सोच तो सकती हैं, लेकिन आपको कभी डिगा नहीं सकतीं।
एक रोज़ की बात है, जब मैं मीडिया के एक बड़े से संस्थान में कार्यरत् था। संस्थान में बहुत सारे लोग ऐसे थे, जो अपने आप को बहुत ज्यादा ज्ञान परक होने का अक्सर दावा किया करते थे। मैं तो उनके अनुभवों के सामने एक अदने सिपाही जैसा था। जिसका न तो रसूख था, न कोई धाक थी, और न ही कोई साख थी,। इस परिस्थिति को सिर्फ ऐसे ही देख सकते थे जैसे हमारे समाज में सवर्ण दलित को देखते हैं। हीन भावना की ऐसी तस्वीर थी ये जिसे मैं कभी बना तो न सका, लेकिन मेरे ह्रदय से ये छवि कभी गायब न हो सकी। ज़िंदगी के हर एक पहलू को अपने हाथों में समेटे मैं आगे बढ़ने की ख्वाहिश पाले हुए था। लेकिन क्या वो ख्वाहिश पूरी होनी थी, ये बात मेरे ज़हन में अक्सर सवाल बनकर घूम जाया करतीं।
संगठन में करीब पैंतालीस की तादाद में कर्मचारी हुआ करते थे। उन पैंतालिस कर्मचारियों में मैं सिर्फ अकेला ऐसा व्यक्ति था । जिसे लोग बतौर हिंदी मीडियम संबोधित किया करते थे, ऐसा नहीं था कि वो मेरी हिंदी को बेज्जत करने की कोशिश किया करते थे। बस उन्हें ये पता था कि मैं एक ऐसे स्कूल से आता हूं जिसमें पढ़ने की आखिरी कीमत मैने सिर्फ डेढ़ रुपया माहवार चुकाई थी। असल में तो सच्चाई को स्वीकारने के बाद हिंदी की हमारे पास यही कीमत रह जाती है। महज़ डेढ़ रुपया। खैर आगे बढ़ते हैं। इन पैतालिस लोगों में करीब पैंतीस लोग ऐसे थे जो मुझे प्रत्यक्ष रुप से जानते थे। इन कर्मचारियों में गार्ड भी शामिल थे, और वो लोग भी शामिल थे जो गार्ड के वेतन को उनकी ड्यूटी के हिसाब से तय किया करते थे। इसके अलावा वो लोग भी थे, जो लोग गार्ड की ड्यूटी तय करने के साथ ही उन लोगों की भी दिहाड़ी पर निगरानी रखते थे, जो लोग दफ्तर में मौजूद बॉस प्रणाली के एकदम करीब हुआ करते ।
इस संगठन में 6 माह तक दिहाड़ी करने के बाद मुझे मासिक वेतनभोगी कर्मचारी के रुप में नियुक्त कर लिया गया। इन 6 महीनों में मैने मजदूरी के हर गुण और अवगुण को शिरोधार्य किया। दफ्तर के शुरुआती वक्त में मैं अपने आप को ‘ऑन एक विंटर्स नाइट’ (पूस की रात) का हलकू समझता था। जो कर्ज के बोझ से इतना दबा था, कि उस बोझ से छुटकारा पाने की उसके पास सिर्फ एक ही युक्ति होती, और वो थी इस लोक से इहि लोग में सिधार जाना। यहां मेरी हालत की तुलना हलकू से की जा सकती है। क्योंकि हलकू भी तकलीफों में जीने का आदी था, और मैं भी तकलीफों को आराम से बर्दाश्त करने का आदी हो गया था। वक्त का हकीम हर किसी को काढ़ा पिला सकता है। तो मेरी क्या बिसात थी।
इस निजी संस्थान में काम करने का हर किसी का अपना सरकारी ढर्रा था। मसलन कोई काम करता था, तो कोई जी हुजूरी का काम करता था। इस मामले में कई लोग अपने आप को मैनेजमेंट गुरु मान लिया करते । ये बात अलग है कि उन्हें प्रबंधन का आशय भी न पता हो। लेकिन उन्हें एक बात का बड़े अच्छे से पता था, कि बड़े साहब के आते ही अपनी कमर को कितनी डिग्री तक झुकाना है, और जुड़े हुए हाथों को अपने चेहरे से कितनी दूरी पर रखना था। ये मुद्रा बताने के लिए काफी थी, कि उक्त कर्मचारी के मन में बॉस के प्रति श्रद्धा नामक परी कैसे कत्थक कर रही है। ये तस्वीर तो जैसे हमारे निजी संस्थानों की तकिया कलाम बन गई है।
जैसे तैसे शुरुआती 6 महीनों को मैने संघर्ष की अवस्था में काट ही लिया। और अब आगे का वक्त काटने को तैयार हो गया था। इस दौरान जितनी तेजी से दफ्तर में मेरा वक्त गुज़र रहा था, उतनी ही तेज़ी से बॉस बदलने का सिलसिला भी चल निकला था। निजी संस्थानों में अक्सर बह निकलने वाली इस्तीफों की बयार ऐसी ही होती है। यहां नौकरी ऐसे बदलती है, जैसे किसी गर्भवती महिला की ज़ुबान का स्वाद।
संस्थान में मुझे आठ महीने हो चुके थे। अब शनय शनय दफ्तर की कठिन स्थितियां मेरे इतिहास भूगोल से मेल खाने लगी थीं। आंकड़ों और आंखों का मेलमिलाप ऐसा हुआ कि लोग मेरे कायल और मैं उनका कायल हो गया। इस दौरान बिना कमर को किसी डिग्री पर झुकाए मेरे काम करने के तरीके ने कई लोगों के पैजामे ढीले कर दिये थे। दफ्तर में ऐसी ही स्थितियां मृत प्राय मुसीबतों में प्राण फूंकती हैं। कम उम्र में अपनों से छोटों की शोहरत नाते रिश्तेदारों को भी बर्दाश्त नहीं होती। तो ये तो वो लोग थे, जो किसी अजनबी शहर में मुझे मिले थे। लेकिन मनुष्य की फितरत में विश्वास का वास होता है। इसलिए अगर मेरे भीतर किसी के लिए विश्वास था तो कुछ गलत नहीं था।
खैर वक्त गुज़रता रहा, और मैं अपने कार्यों को तल्लीनता से करता रहा। चूंकि चपरासी से लेकर दफ्तर के सीनियर सिटीजन तक मेरी पहुंच अच्छी खासी हो गई थी। इसलिए साज़िशी तंत्र को भी मेरे खिलाफ ब्यूह रचना में मशक्कत करनी पड़ रही थी। इस बात का पता मुझे अक्सर लग भी जाया करता, लेकिन हमेशा की तरह ये दफ्तरी कठिनाई मेरे भीतर ज्यादा स्ट्रेस नहीं डाल पाई। मैने साजिशी तंत्र को भगवान भरोसे कर दिया। होइहे वही जो राम रचि राखा। अक्सर ऐसी बातें बड़ी सटीक साबित होती हैं। भगवान को जो मंजूर था वही हुआ। जो हमारी तरक्की में रोड़े अटकाने के लिए दिन रात एक कर रहे थे, उन्हीं के घर मंदी का ऐसा तूफान आया, कि वो नौकरी बचाने के लिए मेरे उसी मित्र के पास पहुंचे, जिससे मेरी तरक्की को रोकने के लिए उन्होंने सिफारिश लगाई थी।
सार यही कहता है कि अगर पक्के मन से और सच्ची लगन से अगर आप से आप अपने कार्यों को अंजाम देते हैं। तो फिरकापरस्त ताकतें आपके पतन के बारे में सोच तो सकती हैं, लेकिन आपको कभी डिगा नहीं सकतीं।
गुरुवार, 22 दिसंबर 2011
रजाई के भीतर से रईसी के दर्शन
रात के ढाई बज चुके हैं। मुझे नहीं पता कि कैलाश कॉलोनी में बाहर का तापमान क्या है । लेकिन इतना पता है कि मेरी रजाई के भीतर का तापमान मेरे शरीर को गुनगुना रखने के लिए काफी है। मेरे बारह बाई चौहद के रुम के पड़ोस में दो और युवक भी रहते हैं। वो इस वक्त सो चुके हैं। सिर्फ कुत्तों के भौंकने की आवाज़ और ऑफिस से मिली एक सस्ती दीवार घड़ी की नामालूम सी टिक-टिक को तो मैं सुन पा रहा हूं।
मैं दिल्ली के जिस इलाके में रहता हूं उसे यहां की पॉश कॉलोनियों में शुमार किया जाता है। मैने जिस दिल्ली को दूसरे इलाकों में देखा है उसे यहां महसूस नहीं कर पाता । क्योंकि जब भी मैं ग्याहर बजे के आस पास ऑफिस से लौट कर आता हूं। सांझा चूल्हा रेस्टोरेंट के समीप एक ऐसी भीड़ देखता हूं। जो मुझे दुनिया की हर फिक्र से बेफिक्र दिखाई देती है। ये उन लोगों की भीड़ है जो बीएमडब्ल्यू, फरारी, और दूसरी अति आरामदेह गाड़ियों से अपना सफर तय करते हैं। मुझे हर रोज़ ये चेहरे अलग अलग गाड़ियों में ठीक उसी स्थान पर दिखाई देते हैं जहां मैने इन्हें पूर्व में देखा था। रेस्टोरेंट के समीप इन्होंने अपनी गाड़ी टिकाने के लिए एक निश्चित जगह भी बना रखी है। अमूमन हर बार गाड़ियां बदली ही होती हैं, लेकिन चेहरे नहीं बदले होते। ये सभी सांझा चूल्हा से आने वाले महंगे खाने का इंतज़ार करते हैं। वेटर इनकी गाड़ियों तक खाना लेकर आते हैं। खाना वक्त पर नहीं पहुंचता तो सामाजिक रीतियों को दुत्कारते हुए गाड़ी के भीतर से ही वेटरों को अपशब्दों से नवाज़ने लगते हैं। रेस्टोरेंट और गाड़ी के बीच का फासला भले ही कितना हो, लेकिन इनकी जेब की गर्मी दिमाग में ऐसी चढ़ती है, कि ज़ुबान से निकले अपशब्दों का घनत्व रेस्टोरेंट के दरवाज़ों को बेखौफी से चीरता हुआ उस शख्स तक पहुंच जाता है, जिस शख्स को खाने का ऑर्डर दिया गया है। घने कोहरे में गाड़ियों के नंबर तलाशता हुआ वेटर जब गाड़ी के करीब तक पहुंचता है। तो कई बार गाड़ियों के भीतर जमी महफिल से एक जाम फूटकर वेटर के मुंह पर आ गिरता है। इसे गरीबों की बदकिस्मती नहीं, बल्कि रईसी का रुआब कहते हैं।
कई बार तो ऐसा भी हुआ कि मैं जब उनकी गाड़ियों के करीब से गुज़रता तो गाड़ियों के भीतर से ही एक गिलास मेरी ओर फेंक दिया जाता। और बोल दिया जाता सॉरी भाई। टीचर्स के नशे से ज्यादा इन लोगों पर रईसी की खुमारी होती है। खुलेआम ये लोग एक बेहद संवेदनशील इलाके में शराब पीकर माहौल को बिगाड़ने की कोशिश करते हैं। इन रईसज़ादों से उलझना अपनी शामत बुलाने के समान है। क्योंकि इनकी रईसी के रुआब के आगे तो पुलिस भी सलाम ठोकती है।
यूं तो मैं करीब आठ साल बाद उसी बिल्डिंग में लौटा हूं जिस बिल्डिंग में मैं पहले रहता था। मैं जब यहां से गया तो मैने दिल्ली में दर ब दर ठोकरें खाई। हर जगह माहौल को देखा लेकिन लौटकर जब वापस कैलाश कॉलोनी आया । तो यहां कुछ नहीं बदला था। ठीक वही सांझा चूल्हा और अपनी उम्र से आठ साल बड़े वो चेहरे जिनको मैं काफी पहले से देखता आ रहा था। वक्त के साथ बहुत कुछ बदल जाता है। लेकिन यहां आज तक कुछ नहीं बदला। वही गाड़ियों के भीतर से वेटर को चीखकर बुलाना। शराब के नशे में उन्हें गालियां सुनाना । वेटरों का उनके रौद्र के आगे कंपकंपाना। कुछ भी तो नहीं बदला। समाज की सुरक्षा की ज़िम्मेवार पुलिस भी इन लोगों से शायद कमीशन खाती है। मैने कैलाश कॉलोनी की ए ब्लॉक वाली इस गली में कई बार पुलिस की गाड़ियों को रात में गश्त करते देखा है। लेकिन इन पुलिस वालों की नज़र उन पर शायद कभी नहीं पड़ी, जिनके हाथ में रात गहराते ही सड़कों पर जाम छलक आता है। खुलेआम नशे की इस आदत ने प्रशासन द्वारा बनाए तमाम कायदे कानूनों को घुटने पर मजबूर कर दिया है।
एक सच्चाई यहां ये भी है कि जाड़े के मौसम में आज मैने जिस रईसी के रुआब को महसूस किया है। उस रुआब की धमक कई बार पड़ोस में मौजूद एक सियासतदांन की कोठी तक भी जाती है। लेकिन उस कोठी से सफेदपोश काले शीशे की कार से एक बार निकलता है, तो फिर दोबारा कब आता है किसी को पता नहीं चलता। लेकिन उसे अपने आस पास में होने वाली गतिविधियों के बारे में तो पता होता ही होगा। कि कैसे उसकी चौखट से चंद फीट की दूरी में रईसों के इशारों पर रात बहकने लगती है। सोच कर भी मेरी रुह कांप जाती है कि कैसे यहां रात के बारह बजे सर्द रातों में तमाम लड़कियां अपने अधखुले शरीरों को अपने प्रेमियों के हवाले कर देती हैं। सड़क पर ही ये लड़कियां कथित पुरुष मित्रों के साथ अपने आप को दिल्ली की बिंदास बालाएं होने का प्रमाण देती फिरती हैं। नशे की आदी हो चुकी इन लड़कियों को सामाजिक तानेबाने से कोई सरोकार नहीं। इनके लिए नशे की दुनिया ही जन्नत जैसी है। फोरव्हीलर में नहीं चल सकने वाला हर व्यक्ति इनके लिए एक सामाजिक पाप जैसा है। जिसे ये जब चाहो तब दुत्कार सकती हैं। ये सब रईसी के रुआब की ही देन है, जिसने इनके चरित्र में ही खोंट पैदा कर दी है। घर के बाहर मां बाप से कुछ कहकर निकलती हैं, और बाहर जाकर अपने पुरुष मित्रों की बाहों में कपड़े बदलती हैं।
क्या वाकई बिंदास लड़कियां ऐसी ही होती हैं। खैर जैसी भी होती हों। मैने आपको उस दिल्ली के दर्शन कराने की कोशिश की है। जिसे मैं कैलाश कॉलोनी में सांझा चूल्हा के करीब पिछले आठ सालों से देखता आ रहा हूं। ऐसा नहीं कि मैने रईस नहीं देखे। लेकिन दौलत की ऐसी खुमारी को मैने दिल्ली में कहीं महसूस नहीं किया। इन नज़ारों को देखने के बाद कई बार मुझे लगता है कि इनसे तो भला गांव में घुचड़ू मदारी था। जो भले ही अपनी ज़िंदगी में कुछ न कर सका हो। लेकिन उसने कभी किसी की इज्जत को सड़क पर नहीं उछाला। लेकिन यहां तो हर रोज़ स्ट्रीट लाइट के नीचे खुले आम इज्जत नीलाम होती है। ये बात और है कि रईसों के द्वारा जिन गरीबों की इज्जत का घर लुटता है वो प्रतिरोध नहीं कर पाते। घुट घुट कर कोहरे से भरी रातों में गाड़ियों के नंबर तलाशते रहते हैं। तीन बज गए अब मैं प्रशासन की तरह सो रहा हूं।
मैं दिल्ली के जिस इलाके में रहता हूं उसे यहां की पॉश कॉलोनियों में शुमार किया जाता है। मैने जिस दिल्ली को दूसरे इलाकों में देखा है उसे यहां महसूस नहीं कर पाता । क्योंकि जब भी मैं ग्याहर बजे के आस पास ऑफिस से लौट कर आता हूं। सांझा चूल्हा रेस्टोरेंट के समीप एक ऐसी भीड़ देखता हूं। जो मुझे दुनिया की हर फिक्र से बेफिक्र दिखाई देती है। ये उन लोगों की भीड़ है जो बीएमडब्ल्यू, फरारी, और दूसरी अति आरामदेह गाड़ियों से अपना सफर तय करते हैं। मुझे हर रोज़ ये चेहरे अलग अलग गाड़ियों में ठीक उसी स्थान पर दिखाई देते हैं जहां मैने इन्हें पूर्व में देखा था। रेस्टोरेंट के समीप इन्होंने अपनी गाड़ी टिकाने के लिए एक निश्चित जगह भी बना रखी है। अमूमन हर बार गाड़ियां बदली ही होती हैं, लेकिन चेहरे नहीं बदले होते। ये सभी सांझा चूल्हा से आने वाले महंगे खाने का इंतज़ार करते हैं। वेटर इनकी गाड़ियों तक खाना लेकर आते हैं। खाना वक्त पर नहीं पहुंचता तो सामाजिक रीतियों को दुत्कारते हुए गाड़ी के भीतर से ही वेटरों को अपशब्दों से नवाज़ने लगते हैं। रेस्टोरेंट और गाड़ी के बीच का फासला भले ही कितना हो, लेकिन इनकी जेब की गर्मी दिमाग में ऐसी चढ़ती है, कि ज़ुबान से निकले अपशब्दों का घनत्व रेस्टोरेंट के दरवाज़ों को बेखौफी से चीरता हुआ उस शख्स तक पहुंच जाता है, जिस शख्स को खाने का ऑर्डर दिया गया है। घने कोहरे में गाड़ियों के नंबर तलाशता हुआ वेटर जब गाड़ी के करीब तक पहुंचता है। तो कई बार गाड़ियों के भीतर जमी महफिल से एक जाम फूटकर वेटर के मुंह पर आ गिरता है। इसे गरीबों की बदकिस्मती नहीं, बल्कि रईसी का रुआब कहते हैं।
कई बार तो ऐसा भी हुआ कि मैं जब उनकी गाड़ियों के करीब से गुज़रता तो गाड़ियों के भीतर से ही एक गिलास मेरी ओर फेंक दिया जाता। और बोल दिया जाता सॉरी भाई। टीचर्स के नशे से ज्यादा इन लोगों पर रईसी की खुमारी होती है। खुलेआम ये लोग एक बेहद संवेदनशील इलाके में शराब पीकर माहौल को बिगाड़ने की कोशिश करते हैं। इन रईसज़ादों से उलझना अपनी शामत बुलाने के समान है। क्योंकि इनकी रईसी के रुआब के आगे तो पुलिस भी सलाम ठोकती है।
यूं तो मैं करीब आठ साल बाद उसी बिल्डिंग में लौटा हूं जिस बिल्डिंग में मैं पहले रहता था। मैं जब यहां से गया तो मैने दिल्ली में दर ब दर ठोकरें खाई। हर जगह माहौल को देखा लेकिन लौटकर जब वापस कैलाश कॉलोनी आया । तो यहां कुछ नहीं बदला था। ठीक वही सांझा चूल्हा और अपनी उम्र से आठ साल बड़े वो चेहरे जिनको मैं काफी पहले से देखता आ रहा था। वक्त के साथ बहुत कुछ बदल जाता है। लेकिन यहां आज तक कुछ नहीं बदला। वही गाड़ियों के भीतर से वेटर को चीखकर बुलाना। शराब के नशे में उन्हें गालियां सुनाना । वेटरों का उनके रौद्र के आगे कंपकंपाना। कुछ भी तो नहीं बदला। समाज की सुरक्षा की ज़िम्मेवार पुलिस भी इन लोगों से शायद कमीशन खाती है। मैने कैलाश कॉलोनी की ए ब्लॉक वाली इस गली में कई बार पुलिस की गाड़ियों को रात में गश्त करते देखा है। लेकिन इन पुलिस वालों की नज़र उन पर शायद कभी नहीं पड़ी, जिनके हाथ में रात गहराते ही सड़कों पर जाम छलक आता है। खुलेआम नशे की इस आदत ने प्रशासन द्वारा बनाए तमाम कायदे कानूनों को घुटने पर मजबूर कर दिया है।
एक सच्चाई यहां ये भी है कि जाड़े के मौसम में आज मैने जिस रईसी के रुआब को महसूस किया है। उस रुआब की धमक कई बार पड़ोस में मौजूद एक सियासतदांन की कोठी तक भी जाती है। लेकिन उस कोठी से सफेदपोश काले शीशे की कार से एक बार निकलता है, तो फिर दोबारा कब आता है किसी को पता नहीं चलता। लेकिन उसे अपने आस पास में होने वाली गतिविधियों के बारे में तो पता होता ही होगा। कि कैसे उसकी चौखट से चंद फीट की दूरी में रईसों के इशारों पर रात बहकने लगती है। सोच कर भी मेरी रुह कांप जाती है कि कैसे यहां रात के बारह बजे सर्द रातों में तमाम लड़कियां अपने अधखुले शरीरों को अपने प्रेमियों के हवाले कर देती हैं। सड़क पर ही ये लड़कियां कथित पुरुष मित्रों के साथ अपने आप को दिल्ली की बिंदास बालाएं होने का प्रमाण देती फिरती हैं। नशे की आदी हो चुकी इन लड़कियों को सामाजिक तानेबाने से कोई सरोकार नहीं। इनके लिए नशे की दुनिया ही जन्नत जैसी है। फोरव्हीलर में नहीं चल सकने वाला हर व्यक्ति इनके लिए एक सामाजिक पाप जैसा है। जिसे ये जब चाहो तब दुत्कार सकती हैं। ये सब रईसी के रुआब की ही देन है, जिसने इनके चरित्र में ही खोंट पैदा कर दी है। घर के बाहर मां बाप से कुछ कहकर निकलती हैं, और बाहर जाकर अपने पुरुष मित्रों की बाहों में कपड़े बदलती हैं।
क्या वाकई बिंदास लड़कियां ऐसी ही होती हैं। खैर जैसी भी होती हों। मैने आपको उस दिल्ली के दर्शन कराने की कोशिश की है। जिसे मैं कैलाश कॉलोनी में सांझा चूल्हा के करीब पिछले आठ सालों से देखता आ रहा हूं। ऐसा नहीं कि मैने रईस नहीं देखे। लेकिन दौलत की ऐसी खुमारी को मैने दिल्ली में कहीं महसूस नहीं किया। इन नज़ारों को देखने के बाद कई बार मुझे लगता है कि इनसे तो भला गांव में घुचड़ू मदारी था। जो भले ही अपनी ज़िंदगी में कुछ न कर सका हो। लेकिन उसने कभी किसी की इज्जत को सड़क पर नहीं उछाला। लेकिन यहां तो हर रोज़ स्ट्रीट लाइट के नीचे खुले आम इज्जत नीलाम होती है। ये बात और है कि रईसों के द्वारा जिन गरीबों की इज्जत का घर लुटता है वो प्रतिरोध नहीं कर पाते। घुट घुट कर कोहरे से भरी रातों में गाड़ियों के नंबर तलाशते रहते हैं। तीन बज गए अब मैं प्रशासन की तरह सो रहा हूं।
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