शनिवार, 30 जनवरी 2010

उनकी आज़ादी का कारण थी संडास-ए-नाजी

काम जो बेहतर लगे। वो करो। ऐसा कतई न करो जो दूसरे के मन का हो। या यूं कहें कि जो हमने सोचा वही बेहतर है। अपनी बेहतरी से गद्दारी न करो। दरअसल नाजियों की जिस सेना ने यहूदियों समेत कइयों को अपने अत्याचार का शिकार बनाया । उस सेना को कई यहूदियों ने अपनी बेहतरी साबित करके ठेंगा दिखाया । और इसका अहसास उन्हें कतई नहीं हुआ। कुछ यहूदी उनके बंदी तो थे। लेकिन उनके अत्याचारों से मुक्त थे। ये उनके दिमाग का ही कौशल था। कि हिटलर की सेना उनका तियां पांचा नहीं कर पाई। क्यों और कैसे ये सवाल आपके दिमाग में जरुर आरती कर रहा होगा।
तो सुनिए अत्याचारी होने की सुरती खा बैठे हिटलर ने बंदी खाने में सैकड़ों संडासों का गठन कराया था। उन संडासों के लिए कई कर्मचारियों की नियुक्ति की गई थी। ये नियुक्ति गुलाम लोगों में से ही की गई थी। करे कोई भरे कोई की तर्ज पर हिटलर चाहता था। कि उसकी और उसकी सेना की करनी का खामियाजा कोई और ही भुगते। यानि उनके बंदी। उस सामूहिकत संडास में कई बंदियों को अलग-अलग काम सौंपा गया था। जैसे किसी को बटोरने का। किसी को पानी डालने का तो किसी को राख डालने का। उन संडासों को जो आकार दिया गया था। वो प्राचीन कमोड का एहसास कराता था।
सीमेंट की बैंचों में पिछवाड़े के आकारानुसार होल हुआ करते थे। कई फिट लंबी बैंचों में कई सारे होल। जिन पर कई लोग एक साथ अपना पिछवाड़ा टिका सकते थे। इस बगैर पैसे की नौकरी का शुरुआती दौर ही था। कुछ लोगों को काम में मजा आया तो कुछ को नहीं। जिन लोगों को काम पसंद नहीं आया । उन्होंने नाजियों के संगठन में दूसरी बिन पैसे की नौकरी ढूंढ ली। जैसे बाल साफ करने की । बढ़ई गिरी की । बंदूक के लिए कारतूस तैयार करने की। लेकिन जिन बेचारों ने अपना डिपार्टमेंट चेंज किया। उन्हें दिनभर एक गलती के लिए दस कोड़ों की सजा दी जाती थी। ऐसे में मौज उनकी थी। जो बदबू सूंघ कर भी अपने कार्य को तल्लीनता से किया करते थे। हिटलर उन्हें कोई सजा नहीं देता था। जो संडास साफ किया करते थे। फिर चाहे वो अपने काम को सफाई से करें या नहीं। संडास साफ करते-करते। इस दौरान एक जमादार यूनियन का गठन भी हो गया। जिसका आभास हिटलर के कानों तक नहीं पहुंचा। वो सामूहिक संडास विरोध के विचारों का अड्डा बन गई। क्योंकि जो लोग दूसरे डिपार्टमेंट में नौकरीशुदा थे। उन्हें हिटलर के हंटरों से ही फुरसत नहीं मिल पाती थी। जबकि जो संडास की सफाई करते थे। उनके पास अपने कार्य को निपटाने के बाद काफी समय बच जाता था।
क्रांतिकारी विचार ही किसी मुल्क की आज़ादी का सबब बनते हैं। और लाखों का हत्यारा हिटलर इस बात को महसूस नहीं कर पाया। संडास में विचारों का पनपना जारी रहा। और एक समय वो आया जब हिटलर की योजनाओं के खिलाफ जमादार यूनियन एक ताकत बनकर उभरी। उस यूनियन के कई बुद्धिजीवियों ने प्रतिस्पर्धा के एक युग की शुरुआत कर दी। तानाशाही के माहौल में ये कदम वैचारिक आज़ादी से कम न था। ज़रा सोचिए ये विचार उन लोगों के दिमाग में कौंधे । जो पेशे से संडास की सफाई करते थे। उनका काम जरुर गंदा था। लेकिन विचार उनकी ताकत थे। इससे ये बात भी चरितार्थ होती है, कि कमल दलदल में ही खिलता है। खैर हिटलर के उस जेलखाने में अब लोग संडास की नौकरी को ही तरजीह देने लगे। और धीरे धीरे संडास के सफाई कर्मियों की तादात भी अच्छी खासी हो गई। जैसे-जैसे लोगों की तादात बढ़ती गई वैसे-वैसे योजनाओं का विस्तार भी होने लगा। विचारों का विस्तार भी उज्ज्वल भविष्य की ओर ही संकेत करता था।
इस बीच हेयर कटिंग डिपार्टमेंट से कई लोगों ने अपना ट्रांसफर घूस को आधार बनाकर संडास डिपार्डमेंट में करा लिया था। ये लोग उन लोगों की चांद मूड़ा करते थे जिन्हें हिटलर मार दिया करता था। हिटलर दूरदर्शी था। वो उन बालों का इस्तेमाल कपड़ों इत्यादि की बुनाई में करवाता था। लेकिन उसकी दूरदर्शिता इतनी नहीं थी। कि इस आधार पर विश्व विजेता बन जाता । अगर ऐसा होता तो महज संडास में पैदा होने वाली क्रांतिकारी योजनाएं। उसकी हार का कारण न बनतीं। और यही हुआ भी। एक रोज़ उस जेल खाने में विद्रोह की ऐसी आग फूटी जिसके सामने हिटलर बेबस हो गया। और संडास-ए-नाजी से निकल आया उनकी आज़ादी का रास्ता। ये संडास में पैदा हुए बेहतर विचारों का ही नतीजा था। ये वो विचार थे जो उनके अपने थे। यानि संडास में काम करो तो सजा नहीं मिलेगी। सजा नहीं मिलेगी। तो वक्त मिलेगा क्रांतिकारी विचारों का। और जब विचारों में क्रांति आएगी तो आज़ादी मिलेगी।

रविवार, 10 जनवरी 2010

हवा हो लिए फौजी बाबा

उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर ज़िले की बात है। कभी मां फूलमती, बाबा चौकसी नाथ के मंदिर के करीब एक फौजी का निवास हुआ करता था। निवास के नाम पर कोई सरकारी आवास नहीं था। बल्कि एक 16 फुट लंबे और दस फिट चौड़ा कमरा ही उनके नाम आवंटित था। सरकार की रिहायश उनसे मुंह फेरे थी। ये भी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि सच यही था कि नाम फौजी होने से कोई फौजी नहीं होता। इस बात का न तो उन्हें मलाल ही था। और न ही मुगालता भी। क्योंकि न तो उन्होंने कभी बंदूक ही उठाई। न समाज के खिलाफ आवाज़। और न ही किसी सीमा की पहरेदारी की। आतंकियों से मुठभेड़ भी उनके लिए दूर की ही कौड़ी थी। लेकिन चौक में आने वाले लोगों के लिए वो फौजी ही थे। इस बात पर वो भी इतराया करते।
काम नहीं नाम ही सही की तर्ज पर फौजी बाबा को मैने कोई काम नहीं करते देखा। ऐसा नहीं था कि वो किसी सरकारी बाबू की तरह काम नहीं करना चाहते थे। असमर्थ थे बेचारे। शारीरिक मजबूरी कहें । या बूढ़ी हो चुकी हड्डियों में कैल्सियम की कमी । जो उनकी शारीरिक अक्षमता उनके कर्मशील व्यक्तित्व पर हावी होती रही। मैं लगभग तीस बसंत देखने वाला हूं। चूंकि मैं बचपन से लेकर और युवावस्था तक मोहल्ला चौकसी में ही भड़ैंती फाने था। इसलिए फौजी बाबा के बारे में अच्छा खासा शोध कर चुका था।
विश्व पटल पर फौजियों की तस्वीर लड़ाकों के साथ-साथ, खाने पीने की रही है। लेकिन फौजी बाबा को न मदिरा का शौक। न सिगरेट का । न गुटखे का । शौक था तो बस, संगीत और खाने का । छप्पन प्रकार के भोगों के लिए खास लालायित रहते थे फौजी बाबा। ऐसा नहीं था, कि उनके सोलह बाई दस के दड़बे में एक सुंदर किचन था। जिसमें वो अपने शौक पूरे कर सकते। उनके लिए तो लोगों की व्यवस्था ही रसोई थी। दिन भर कमरे के सामने वाले चबूतरे पर बैठकर वो लोगों का गीत-संगीत से मनोरंजन किया करते । और जब उदर छुदा लगती, तो जहांपना लोगों को एक आदेश जारी किया करते । ये आदेश भोजन की अभिलाषा में होता। कुछ लोग तो उनके आदेश आने से पहले ही नित नए व्यंजन मौका-ए-वारदात पर पहुंचा देते । तो कुछ उनके आदेश का इंतज़ार किया करते। और ऐसे ही रोज़ाना बाबा के सामने दस तरीके के पकवानों की थाली होती। चूंकि उनकी उम्र, उनकी उदर छुदा पर हावी थी। इसलिए वो उन दस तरीके के पकवानों से अच्छे माल का चुनाव भी करते थे। चुनाव का तरीका बेहद आसान था। बारी बारी से सारे पकवानों का जायजा नाक के माध्यम और जीभ के अग्र भाग से लिया जाता। जो पसंद आया वो साइड में, और जो न पसंद आया वो भी साइड में। ये सब उनकी दिनचर्या का ही हिस्सा था।
शाम के वक्त बाबा के लिए दड़बे से बाहर निकलने का होता। जैसा कि सभी जानते हैं, कि मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक। वैसे ही लोग ये भी जानते थे। कि फौजी बाबा दिहाड़ी मजदूरी पर तय किए गए रिक्शे के माध्यम से चौक क्षेत्र की सर्राफा मार्केट जाने की तैयारी में हैं। रिक्शा इसलिए किया जाता था। क्योंकि टांगें काफी सालों पहले से ही जवाब दे चुकी थीं। रही बात सर्राफा बाज़ार से उनके लगाव की । तो कुछ बड़े व्यापारियों दुकाने ही उनका अड्डा थी। जहां वो गप्पें लड़ाया करते थे। अपनों से । और जो अपने नहीं थे उनसे भी। आते जाते लोगों से पैसे का एकतरफा विनिमय करना भी उनकी आदत का ही एक हिस्सा था। सबको पता था। कि फौजी बाबा एक समय के धनाड्य हुआ करते थे। लेकिन समय के बदलते स्वरुप के साथ ही उनका पैसा भी तेल लेने चला गया। वो कंगाली में, बदहाली में ज़िंदगी गुजारने को मजबूर थे। हालांकि मांगने की आदत ने उनका खूंट इतना तो गरम कर ही दिया था। कि वो अपना खर्च भर चला सकते थे।
अपने आदेश और आदतों की वजह से फौजी बाबा को चौक से लेकर घंटाघर तक काफी रसूखदार लोग जानते थे। उनका सम्मान करते थे। और कभी भी उनकी किसी भी फरमाइश को मना नहीं किया जाता था। मना करते तो उनकी सुनते ! उनकी आदतों में एक और आदत भी थी। मंदिर पर मिलने वाले प्रसाद को इकट्ठा करने की। खास कर मंगलवार का दिन उनके लिए बेहद मंगलकारी होता। इस दिन उन्हें सब कुछ बिन मांगे ही मिल जाया करता था। खासकर प्रसाद। महिलाएं हों, बच्चे हों, बूढे़ हों, जवान हों, कोई हो । उनके सामने जो आ जाता वो बगैर झिझक, एक आदेश के माध्यम से प्रसाद मांग लिया करते। उनका ये रुप देखकर ऐसा लगता था। कि अगर ओबामा भी आ जाए तो वो उन्हें भी डपट कर प्रसाद हासिल कर लें। ये व्यक्तित्व बताता था कि जवानी के दिनों में उन्होंने किसी की नहीं सुनी होगी।
उम्र बीत चुकी थी। लेकिन रंग नहीं ढला था। उजली काया उस समय भी उजली ही थी। ये अनुमान लगाना कठिन न था। कि जवानी के दिनों में बाबा मैदा की भेंड़ रहे होंगे। वो अपने शरीर को ज्यादा संजो नहीं सके । लेकिन उनका रंग चीख चीख कर इस बात की गवाही देता था। कि उन्हें कभी फेयर एंड लवली की जरुरत नहीं पढ़ी। बढ़ी हुई दाढ़ी जब यदा कदा शहीद हो जाती । तो उनके चेहरे का कंट्रास्ट और ब्राइटनेस देखते ही बनती थी।
मंदिर में आरती के घंटे बजने के बाद ही उनका सोने का समय होता। वो बगैर भगवान को सुलाए कभी नहीं सोए। उनका सोने का वक्त तकरीबन दस से साढ़े दस बजे का रहता होगा। उनके दड़बे में पढ़ी चारपाई में एक होल हुआ करता था। जो हुआ नहीं था। बल्कि किया गया था। किसी खास प्रायोजन के लिए। ये प्रायोजन था जब कभी हाजमें की मुसीबत हो, और हाजमें का हूटर बजने वाला हो। तो बाबा को कहीं जाने की जरुरत न पढ़े। उस होल को आधुनिक कमोड का आकार दे दिया गया था। लेकिन निसंदेह ये बाबा की मजबूरी थी। उनकी काहिलता नहीं। क्योंकि उनके साथ कोई अपना नहीं था। जो कभी अपने थे। उनके रिश्ते अब भारत और पाकिस्तान सरीखे थे।
लेकिन एक बात का मुझे हमेशा अफसोस रहेगा। मेरा घर उनके दड़बे से चंद कदम की दूरी पर था। लेकिन जब वो सदा के लिए हवा हुए, तो मुझे हवा तक न लगी। पता तब चला जब वे शमशान पहुंच चुके थे। किसी ने बताया कि अभी-अभी जिसका राम नाम सत्य हुआ है। वो और कोई नहीं मुहल्ले के फौजी बाबा थे। जो अब नहीं रहे। अब जहां भी रहें। अच्छे रहें। स्वस्थ रहें। चंगे रहें। भले रहें। लेकिन ऐसे न रहें।

रविवार, 27 दिसंबर 2009

ठोकर लाएगी रंगत

मुझे उम्मीद है।
एक रोज़,
ठोकर लाएगी रंगत।
उसका रंग उस दिन,
उस खूं सा लाल नहीं होगा।
जो खूं जमा हुआ है,
कुछ ठोकरों की बदौलत।
गिरेबां में झांककर देखूंगा उस दिन,
कि ठोकर क्यों लगी थी।
लेकिन अब तक,
हर ठोकर जवाब सवाल पूछती है मुझसे?
कि क्यों मुझे हर बार,
इसी पैर में लगना था।
मैं उस सवाल की उलझन में इतना उलझा जाता हूं।
कि अक्सर खुद सवाल करता हूं?
कि क्यों मेरा पैर पत्थर से टकराता है?
मैं कोई राम तो नहीं!
जो अहिल्या मेरी ठोकर से आएगी।
लेकिन उम्मीद है मुझे।
हर ठोकर रंग लाएगी।

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

गुटखा नॉट अलाउड

हाल ही की बात है हमारे खबरनबीसों के दफ्तर में गुटखा, पान, सुपारी खाने पर पाबंदी लगा दी गई है। यानि कार्यालय परिसर में जो गुटखा खाता दिखाई दिया उस पर औकातानुसार कार्यवाही की जाएगी। दफ्तर में अंदर से लेकर बाहर तक इस हिदायती फरमान की चिट्ठियों को चिपकाया गया है। लेकिन इतिहास गवाही देता है कि जब-जब क्रांतिकारियों के खिलाफ तुगलगी फरमान जारी किए गए । वो और आगबबूला हो गए। एक बार फिर वैसा ही हुआ और किसी ने दफ्तरी प्रशासन को ललकार लगाते हुए उस नोटिस पर ही गुटखे की पीक से फाइन आर्ट बना दी ।
ये बताना जरुरी है कि ये फरमान आखिर क्यों दफ्तर में जारी किया गया। दरअसल हमारे ऑफिस में गुटखोरों की खासी तादात है । ज्यादातर के मुंह में गुटखा दबा ही रहता है। अगर इस दौरान कोई उनसे बात करता है तो ये उनके दिन का सबसे बुरा वक्त होता है। क्योंकि बात करने के लिए या तो उन्हें गुटखा थूकना पड़ता है। या फिर लीलना पड़ता है। और अगर थूकना पड़ता तो जाते कहां? या तो दफ्तर के शौचालय में या किसी कोने को शिकार बनाना पड़ता । शौचालय तो बेचारा वैसे ही लोगों की शूशू का शिकार बनता है अब उस पर पीक मार- मार कर लोगों ने और दुर्दशा कर दी थी। रही बात कोने-छातर की तो उस पर लोगों की कुछ ज्यादा ही कृपा रहती थी। खास कर वहां पर जहां सीढ़ी से चढ़ते हुए न्यूज़ रुम में दाखिल हुआ जाता है। उस कोने पर तो जैसे लोगों को प्राइमरी अधिकार मिला हुआ था कि न्यूज़ रुम में घुसने से पहले यहां पर एक बार पिच्च-पिच्च जरुर करें। पीक के कीर्तिमान स्थापित करता दीवार का वो कोना गुटखोरों का शिकार बन चुका था। पीक की दिन-ब-दिन बढ़ती परतें तमाम पेंट कंपनियों को मुंह चिढ़ाती सी नज़र आती थी। क्योंकि अब वहां से पेंट नदारद था। और रंगीन मिजाज गुटखा दीवार के उस हिस्से को अपने आगोश में ले चुका था। गुटखे की आड़ में छिपती दीवार अब दफ्तरी प्रशासन के लिए भी चुनौती बन चुकी थी। लिहाज़ा गुटखा नॉट अलाउट इन ऑफिस प्रीमिसेस नाम का बोर्ड जरुरी हो चला था।
ऑफिस का ये फरमान तमाम गुटखोरों के लिए एक बड़ी परेशानी का सबब था। क्योंकि कई लोगों को दिल और दिमाग की बत्ती इसी के बल पर जलती है। अब भला जब दिल और दिमाग में ही अंधेरा होगा तो काम क्या होगा खाक ! चूंकि मैं गुटखा नहीं खाता इसलिए इसका आनंद भी नहीं बखान कर सकता । इसलिए इस विषय पर शोध हेतु मैने कुछ लोगों की जाने-अनजाने बाइट ली। तो लोगों का कुछ यूं कहना था।
सबसे पहले पीसीआर में ऑनलाइन ग्राफिक्स डिपार्टमेंट ले चलते हैं। जहां मौजूद एक किशोर से मैने बात की तो उनका कहना था। कि जब तक ससुरा ई (गुटखा) मूं में न भरा हो सब ऑनलाइन ऑफलाइन नज़र आता है। दिल ही नहीं लगता है भाई। दिन पूरा गुम सुम सा बीतता है। हमारा तो सुसरा जीना ही हराम हो गया। एकाग्रता ही नहीं बनती है क्या करें ? पीसीआर के किशोर से बात करने के बाद रुख करते हैं न्यूज़ रुम का, जहां गुटखोरों का असली जमावड़ा लगता है। ट्रेनी से लेकर अधिकारी वर्ग सभी गुटखे के बेहद शौकीन हैं। लोगों की कॉपी पर कैंची चलाने वाले एक एडिटर महोदय का इस मामले में दर्शन ही अलग नज़र आया। हनुमान सरीखा मुंह लिए बैठे एडिटर महोदय अपनी बाइट देने से पहले दो तीन बार सोचते नज़र आए कि बोला जाए या नहीं । हालांकि बाइट ऑफ द कैमरा थी इसलिए कोई दिक्कत भी नहीं थी। लेकिन गुटखा जो मुंह में था। और थूकने कहीं जा नहीं सकते। खैर सारी खुशी लीलते हुए बोले भई ये जो गुटखा है न कमाल का आइटम है। दो रुपए में जन्नत की सैर से कम नहीं। जब गुटखा हो मुंह में तो कमाल का हाथ चलता है कीबोर्ड पर। गुटखा खाने में चौदह साल का अनुभव रखे एक जनाब(जो सीएनबीसी आवाज़ से जुड़े हैं) भी इसके बगैर सबकुछ अधूरा सा महसूस करते हैं। महोदय अर्थजगत से जुड़ी खबरें देखते हैं। और गुटखे की करामात से सेंसेक्स को उठाते गिराते है। हालांकि बाज़ार दो दिन बंद रहता है। लेकिन इनका मुंह गुटखा खाने के लिए सातों दिन खुला रहता है।
अब मिलवाते हैं आजाद न्यूज़ के अनोखे राम ड्रैगन शर्मा से । अपने जीवन का ज्यादातर समय इन्होंने गुटखा खाने और पीकने में व्यतीत किया है । इसलिए इनका अनुभव मेरे लिए मायने रखता है। वैसे तो ये बेहद गुस्सैल प्रवर्ति के हैं जैसा कि नाम से पता लग रहा होगा। लेकिन जब ये गुटखा खाते हैं तो काफी घंटों तक न्यूज़ रुम में शांति होती है। इस दौरान इन्हें किसी का खलल पसंद नहीं। इन्होंने भी ऊपर वालों की ही तरह गुटखे की अद्भुत महिमा का विशद वर्णन किया। लेकिन इन्होंने एक ऐसे व्यक्ति के बारे में भी बताया, जो गुटखा खाने के मामले में लौहपुरुष है। ड्रैगन के मुताबिक अमुक शख्स ने कभी गुटखा थूका ही नहीं। हाजमा इतना दुरुस्त की कि बगैर हाजमोला ईंट तक चबा जाएं। शर्मा जी ने मुझे नाम तो बताया लेकिन ये भी हिदायत दी कि इनके नाम का इश्तेहार न किया जाए। यही कारण रहा कि मैने इन महान विभूति के नाम का ज़िक्र नहीं किया।
खैर विदाउट गुटखा लोग हलकान हैं। लेकिन मैं पहले ही कह चुका हूं गुटखे की क्रांति लाने वालों को कब तक रोकोगे। मौका लगते ही वो आंदोलन कर देंगे। बंदिश-ए- थूथ कब तक चलेगी। और वैसे भी लोगों ने सुस्त प्रशासन की तरह पुराने ढर्रे पर चलना शुरु कर दिया है। अब दफ्तरी प्रशासन के लिए एक और चुनौती है। छुपे हुए आंदोलन कारियों से निपटने की ।

शनिवार, 14 नवंबर 2009

बुढ़ापे की संवेदना

बूढ़ा होता है हर कोई
ढलती हुई उम्र के साथ
ऐसा बूढ़ा न हो कोई
उस बूढ़े, बुढ़िया के जैसा
न खाना है
न दाना है
साथ नहीं है अपनों का
एक सहारा बस बाकी है
लाठी और अकेलेपन का
सावन भी अब बूढ़ा सा है
पतझड़ से सारे मौसम हैं
एक अकेली कोंपल को
बस तरसे विचलित सा उनका मन है
बचपन को पाल बुढ़ापे में
सब छोड़ चले अब उनको
उम्मीदों की बुझती लौ
तरस रहे तिनके-तिनके को
तन की सिलवट
सिमट रही है
कलयुग के उजियारे में
जीवन अपना काट रहे बस
थोड़े से अंधियारे में

सोमवार, 9 नवंबर 2009

कचरा-कचरा “यम की बहना”

ज़रा विचारिए कि जब हमारे सामने यमराज की खौफजदा कल्पना होती है। तो चित्र में भैंसे पर सवार एक बेहद ही बेडौल और खाए-पिए खानदान से ताल्लुक रखने वाले मनुष्य की छवि अकस्मात ही सामने आ जाती है। हाथ में कांटेदार गदा और अपने मन में मौत सरीखा भय लिए यमराज की ये तस्वीर बेहद भयावह है। लेकिन इस बार जब नोएडा से कालिंदी कुंज होते हुए जब मैं दिल्ली जा रहा था। तो मेरी मुलाकात यमराज की बहना से हो गई। फेस-टू-फेस तो नहीं, लेकिन कल्पनाओं के घोड़े दौड़े तो एक छवि उनकी भी मैने उकेर ही ली। इन बहना रानी का स्कूल का नाम उनके पिताजी ने यमुना रखा था । बड़े ही लाड़ और प्यार से पाला गया था यमुना जी को। पश्चिमी हिमालय पर एक फ्लैट भी यमुना जी को दिया गया। जहां से निकल कर निश्चित मार्गों से होकर वे कहीं भी सैरसपाटा कर सकती है। अब यमुना जी की तो चांदी ही चांदी थी। और हां एक बात और समझाई गई थी यमुना जी को, कि आपकी दो सहेलियां गंगा और सरस्वती आपको इलाहाबाद में मिलेंगी। जिनसे मिलकर आपका नाम भारत में बड़ी श्रद्धा से लिया जाएगा। अपने पिता की असीम अनुकंपा से यमुना रानी निकल पड़ीं सैर सपाटे को । शायद ऐसा ही सफरनाम रहा होगा अपनी यम की बहना का।
पुराणों की मानें तो यमुना जी को बेहद पवित्र और कई संस्कृतियों से सराबोर माना गया। लेकिन यहां तो मैने यमुना का उस दिन दूसरा ही चेहरा देखा। अब तक तो लोगों के मुंह से ही सुना था। कि अपने अंदर जीवन दायिनी जल समेटे यमुना अब मैली हो चुकी है। और उस दिन देख भी लिया। कालिंदी कुंज के करीब से बहने वाली यमुना फैक्ट्रियों से निकले रसायन की बदौलत साबुन सरीखी झाग से नहा रही थी। वो झाग इतनी सफेद थी कि मुझे अलास्का की बर्फ याद आ गई । सोचा कि वाह यमुना जी के तो वारे-न्यारे हो गए। बड़ा ही सुंदर स्नान कर रही हैं मैडम। और कमाल की बात तो ये यमुना को भी नहाने की जरुरत पड़ गई। दरअसल वो अलास्का की बर्फ मेरा भ्रम थी। मेरे साथ में ही मौजूद जब मेरे एक मित्र कलीम खान जी ने मुझे प्रदूषण की परिभाषा समझाई तो समझ आया, कि ये डव की झाग नहीं, बल्कि फैक्ट्रियो से निकला वो रसायन है, जो यमुना के जल को जहरीला बना रहा। खैर अब भ्रम का टाटी उड़ चुकी थी। और हकीकत सामने थी। यमुना जी का जल जलजला बन चुका था। ऐसा लग रहा था मानों हजारों मछलियों की मौत का टेण्डर यमुना जी ने ले लिया हो। यमुना जी का पुश्तैनी धंधा एक बार फिर फलीभूत होता जान पड़ रहा था। खैर कसैली गंध लिए यम की बहना का रंग भी उस झाग के नीचे अब काला पड़ चुका था। जिस सूर्य पुत्री यमुना की कल्पना मैं सुंदर कर बैठा था। वो निहायत ही बदसूरत हो चुकी है। अगर मैं कुछ कर सकता तो शायद फेयर-एंड-लवली मुहैया करा सकता था। जिससे वो सात दिनों में ही निखर जातीं। लेकिन फेयर-एंड-लवली से काम न होने वाला था। क्योंकि हजारों कुंटल के मेरे पास तो पैसे भी नहीं थे। बेचारी कचरा-कचरा “यम की बहना” का वो बेनूर चेहरा वाकई आघात पहुंचा रहा था।
जिसके शरीर पर गहनों की कल्पना मैने की थी। उसका शरीर फैक्ट्रियों और मिलों की गंदगी, अधजली लाशों, मरे हुए जानवरों, की गंदगी से सराबोर था। वाकई यम की बहना दुर्दशा के दौर से गुजर रही है। मेरे बस में उसका कोई उपचार नहीं था। शायद सरकार के पास हो। अगर है तो जल्द कुछ करे। वरना ये यम की बहना जीते जी कालकल्वित हो जाएगी।

मंगलवार, 3 नवंबर 2009

घासीराम का आतंक

(बीबीसी हिंदी डॉट काम की खबर से प्रेरित होकर लिखा गया है, जिसमें ये कहा गया था कि हाल ही में एक भारतीय टिड्डा ब्रिटेन जा पहुंचा है।)
यूं तो हमारे एक मित्रवर हैं जिनका राशि का नाम घासीराम है। लेकिन न तो वो आतंकी हैं। और न ही घासखोर। उनके अंदर कोई भी ऐसी आदत नहीं कि वो दिन में भोजन करते हों, और रात को समाज की नज़रों से बचकर घास ही चरते हों। लेकिन फिर भी वो घासीराम है। हालांकि उनका शुभनाम कुछ और ही है। खैर यहां हम उनकी किसी कला का वर्णन नहीं कर रहे हम तो आज आपको एक नए घासीराम से मिलवाना चाहते हैं। जो घासखोर भी हैं। और एक प्रशिक्षित आतंकी भी। विलायती लोगों की भाषा में उन्हे ग्रासहोपर कहा जाता है तो हिंदी में उसे घासखोर की संज्ञा दी जा सकती है। कमाल के ढांचाबदर ये घासखोर अपने रंगीन बदन के लिए भी जाने जाते हैं। सतरंगी छटाओं से लैस इनके बदन हर एक पार्ट खुदा की नियामत से बड़े ही अजीबो-गरीब ढंग से सजाया गया है। इनको देखकर ऐसा लगता है कि बड़ा ही गुमान होगा इन्हें अपनी इस विस्मय काया पर। और जब ये घासखोर महाराज उड़ान पर निकलते हैं तो ऐसा लगता है कि कोई अमेरिकी ड्रोन विमान शिकार पर निकला हो। लेकिन इनके लिए एक बात मैने बहुत पहले पढ़ी थी The Ant and the Grasshopper नामक अध्याय में। पाठ इनके चरित्र को बखूबी बयां करता था। कि एडम और ईव के समय की पैदाइश ये घासखोर निहायत ही हरामखोर प्रवर्ति के हैं। पाठ में हमें बताया गया था कि ये घासखोर टिड्डे के नाम से जाना जाता है। लेकिन यहां इनका एक और चरित्र भी आज मैंने खोजा है। वो है बगैर वीसा और पासपोर्ट के विदेश यात्रा करने का। यानि ये घासखोर कबूतरबाजी में भी माहिर हैं। फर्जीवाड़ा करके ये विदेशों की सैर भी कर लेते हैं। हाल ही में ये भारत से चलकर ब्रिटेन के दौरे पर हैं। राजनेताओं की तरह इनके इस गुपचुप दौरे को लेकर ब्रिटेन का खाद्य एवं पर्यावरण संस्थान यानी फ़ेरा हलकान है। सबसे पहले इसी संस्था को पता चला कि इनके देश में कोई घासीराम नाम का घुसपैठिया घुस आया है। न तो उसके पास वीसा है और न ही पासपोर्ट। ब्रिटेन की भी चिंता वाजिव है, क्योंकि घासीराम घास खाने में पारंगत हैं। इन्हें हरियाली कतई बर्दाश्त नहीं। इस मामले में इनके पेटूपन का भी कोई सानी नहीं । जहां इन्हें अपने मन का खाना दिखता है। वहीं इनका आतंक शुरु हो जाता है। और पल भर में ये हजारों एकड़ फसल अपने मासूम से उदर में पचा लेते हैं। नियति का खेल तो देखिए हमारी नुमाइंदगी करने वाले कुछ लोग इन्हीं से प्रेरित जान पड़ते हैं। और कई एकड़ घास घोटाला उनके खाते में चढ़ चुका है। टिड्डा एक कीट है लेकिन वो एक इंसान हैं। लेकिन मैने कई बार सुना है कि इंसान के जीवन में कोई भी उसका आदर्श बन सकता है। पर पहली बार ये सुना है कि कोई इंसान किसी कीट को अपना आदर्श मानता हो। खैर टिड्डे की इसी महामाया ने इसको तालिबानी लड़ाकों जैसा बना दिया है। कई बार ये आत्मघाती का काम करते हैं। क्योंकि इनकी ज्यादातर मौत स्वाभाविक नहीं बल्कि अपनी उदर छुदा मिटाने की खातिर होती है। मतलब साफ है ये जान हथेली पर लेकर शिकार को निकलते हैं। भारत से लेकर पाकिस्तान तक घासीराम का आतंक कई बार देखा गया। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि कुछ छोटे देशों की फसल चट कर इन्होंने वहां की अर्थव्यवस्था का सूरत ए हाल ही बिगाड़ दिया। बचपन से ही उड़ान में दक्ष इनकी सेना का हर सिपाही एक कुशल पायलट और कुशल आतंकी है। क्योंकि इनको मारने के सारे प्रयास धरे के धरे रह चुके हैं। और इस बार ये घासखोर ब्रिटेन पहुंच चुका है। इस पर फ़ेरा के कीटविज्ञानी क्रिस मैलंफ़ी ने कहा, “ये सैलानी टिड्डा इतना पेटू है कि जब इसे अलग ले जाकर प्रयोगशाला में रखा गया तो इसने बंदगोभी पर ऐसा हमला बोला कि उसे खाते हुए बंदगोभी के अंदर पहुंच गया.” देखा आपने कितना भयावह दृश्य रहा होगा। घासी राम हैं या ड्रिलमशीन। ऐसा लगता है ये कहीं भी सेंध लगा सकते है। हालांकि ब्रिटेन की फेरा संस्था इस बात से ज्यादा चिंतित नहीं है कि कोई घुसपैठिया उनके दर पर आ चुका है। क्योंकि ब्रिटेन ऐसा मानता है कि मौसम उसके माकूल नहीं है लिहाज़ा वो यहां पर अपनी पलाटून पैदा नहीं कर पाएगा । इसलिए घबराने की जरुरत नहीं। लेकिन आतंकी तो आतंकी होता है। और फिर जब वो एशियाई देश से आया हो । तो मुसीबत का सबब होता ही है। लिहाज़ा घासीराम के आतंक से सावधान। क्योंकि पिछले कई बर्षों से इन्होंने हमारा जीना हराम कर रखा है।